UPSC में लेटरल एंट्री को लेकर बहस छिड़ने के बीच मंगलवार को केंद्र सरकार ने लेटरल एंट्री के विज्ञापन पर रोक लगाने का आदेश दिया है। विपक्ष के साथ-साथ एनडीए सहयोगियों के विरोध के बीच केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) से केंद्रीय मंत्रालयों में शीर्ष पदों पर लेटरल एंट्री के लिए अपना विज्ञापन रद्द करने को कहा। जितेंद्र सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देशों का हवाला देते हुए यूपीएससी चेयरपर्सन प्रीति सूदन को पत्र लिखा।
अपने पत्र में, सिंह ने कहा कि संविधान में निहित समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप लेटरल एंट्री की आवश्यकता है, खासकर आरक्षण के प्रावधान के संबंध में। सिंह ने कहा कि पीएम मोदी के लिए, सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण “हमारे सामाजिक न्याय ढांचे की आधारशिला है जिसका उद्देश्य ऐतिहासिक अन्याय को संबोधित करना और समावेशिता को बढ़ावा देना है”।
पत्र में कहा गया है, “चूंकि इन पदों को विशिष्ट माना गया है और एकल-कैडर पदों के रूप में नामित किया गया है, इसलिए इन नियुक्तियों में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं किया गया है।”
कांग्रेस, जिसने “दलितों, ओबीसी और आदिवासियों पर हमला” के रूप में विज्ञापन की कड़ी आलोचना की थी, ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पोस्ट किया, “गैर-जैविक प्रधानमंत्री के अधीन काम करने वाले एक केंद्रीय मंत्री का एक संवैधानिक प्राधिकारी को बिना तारीख का पत्र। यह कितना दयनीय शासन है।”
कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने पोस्ट कर कहा, “संविधान और आरक्षण व्यवस्था की हम हर कीमत पर रक्षा करेंगे। भाजपा की ‘लेटरल एंट्री’ जैसी साजिशों को हम हर हाल में नाकाम कर के दिखाएंगे। मैं एक बार फिर कह रहा हूं – 50% आरक्षण सीमा को तोड़ कर हम जातिगत गिनती के आधार पर सामाजिक न्याय सुनिश्चित करेंगे। जय हिन्द।”
वहीं सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पोस्ट कर कहा, “यूपीएससी में लेटरल एन्ट्री के पिछले दरवाज़े से आरक्षण को नकारते हुए नियुक्तियों की साज़िश आख़िरकार पीडीए की एकता के आगे झुक गयी है। सरकार को अब अपना ये फ़ैसला भी वापस लेना पड़ा है। भाजपा के षड्यंत्र अब कामयाब नहीं हो पा रहे हैं, ये PDA में आए जागरण और चेतना की बहुत बड़ी जीत है। इन परिस्थितियों में समाजवादी पार्टी ‘लेटरल भर्ती’ के ख़िलाफ़ 2 अक्टूबर से शुरू होनेवाले आंदोलन के आह्वान को स्थगित करती है, साथ ही ये संकल्प लेती है कि भविष्य में भी ऐसी किसी चाल को कामयाब नहीं होने देगी व पुरज़ोर तरीके से इसका निर्णायक विरोध करेगी। जिस तरह से जनता ने हमारे 2 अक्टूबर के आंदोलन के लिए जुड़ना शुरू कर दिया था, ये उस एकजुटता की भी जीत है। लेटरल एंट्री ने भाजपा का आरक्षण विरोधी चेहरा उजागर कर दिया है।”
45 पदों को भरने के लिए लेटरल एंट्री विज्ञापन हुआ था जारी-
दरअसल, 17 अगस्त को जारी विज्ञापन में जॉइंट सेक्रेटरी, डिप्टी सेक्रेटरी और डायरेक्टर जैसे बड़े सरकारी पदों पर भर्ती की जानी थी। इसका उद्देश्य केंद्र सरकार के विभागों में निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों सहित विशेषज्ञों की नियुक्ति करना था। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि लेटरल एंट्री के जरिए सरकार खुलेआम SC, ST और OBC समुदाय का हक छीन रही है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने पलटवार करते हुए कहा है कि UPSC में लेटरल एंट्री का कॉन्सेप्ट कांग्रेस सरकार का है।
यूपीएससी की घोषणा ने राजनीतिक हलचल पैदा कर दी। कम से कम दो एनडीए साझेदार – जनता दल (यूनाइटेड) और चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) – ने सरकार के इस कदम का विरोध किया। उनके मुताबिक, किसी भी सरकारी भर्ती में आरक्षण से जुड़े प्रावधान होने ही चाहिए। हालांकि, ब्यूरोक्रेसी में ‘लेटरल एंट्री’ पर चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी (TDP) समर्थन में रही।
LJP (रामविलास) के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने कहा कि वह केंद्र के सामने यह मुद्दा उठाएंगे। पासवान ने कहा, ‘किसी भी सरकारी नियुक्ति में आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए। इसमें कोई किंतु-परंतु नहीं है। निजी क्षेत्र में आरक्षण नहीं है और अगर सरकारी पदों पर भी इसे लागू नहीं किया जाता है। यह जानकारी रविवार को मेरे सामने आई और यह मेरे लिए चिंता का विषय है।’
मालूम हो कि पासवान की पार्टी केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA का हिस्सा है। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जहां तक उनकी पार्टी का सवाल है, वह इस तरह के कदम के बिल्कुल समर्थन में नहीं है।
जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता केसी त्यागी ने कहा, ‘हम ऐसी पार्टी हैं जो शुरू से ही सरकारों से आरक्षण भरने की मांग करती रही है। हम राम मनोहर लोहिया के अनुयायी हैं। जब सदियों से लोग सामाजिक रूप से वंचित रहे हैं, तो आप योग्यता क्यों मांग रहे हैं? सरकार का यह आदेश हमारे लिए गंभीर चिंता का विषय है। ऐसा करके सरकार विपक्ष को मुद्दा थमा रही है। एनडीए का विरोध करने वाले लोग इस विज्ञापन का दुरुपयोग करेंगे। राहुल गांधी सामाजिक रूप से वंचितों के हिमायती बन जाएंगे। हमें विपक्ष के हाथों में हथियार नहीं देना चाहिए।’
वहीं टीडीपी महासचिव नारा लोकेश ने कहा, “हमें लेटरल एंट्री को लेकर खुशी है क्योंकि कई मंत्रालयों को विशेषज्ञों की जरूरत है। हम हमेशा प्राइवेट सेक्टर से जानकारों को शामिल करने का समर्थन करते हैं।”
केंद्र ने कड़ा बचाव करते हुए कहा था कि नौकरशाही में लेटरल एंट्री 1970 के दशक से कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकारों के दौरान हो रहा है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि इस कदम से सेवाओं में एससी/एसटी की भर्ती पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कांग्रेस को याद दिलाया कि 1976 में लैटरल एंट्री रूट के जरिए मनमोहन सिंह को वित्त सचिव बनाया गया था। उन्होंने कहा, ”आपने लेटरल एंट्री शुरू की। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे व्यवस्थित बनाया।”
कांग्रेस सरकार में किस-किसकी हुई लेटरल एंट्री?
-साल 1971 में मनमोहन सिंह लेटरल एंट्री के जरिए ही विदेश व्यापार मंत्रालय में सलाहकार के रूप में सरकार में शामिल हुए थे। वे वित्त मंत्री और फिर देश के प्रधानमंत्री बने।
-रघुराम राजन ने भी लेटरल एंट्री के जरिए ही मुख्य आर्थिक सलाहकार के रूप में काम किया। बाद में 2013 से 2016 तक वह RBI के गवर्नर रहे।
-बिमल जालन ने भी लेटरल एंट्री के जरिए कांग्रेस सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार के तौर पर काम किया। फिर वह RBI के गवर्नर बने।
-सैम पित्रौदा, कौशिक बसु, वी कृष्णमूर्ति, अरविंद विरमानी भी लेटरल एंट्री के जरिए सरकार में शामिल हो चुके हैं।
