लोकसभा चुनाव 2024 रिजल्ट: अयोध्या में बीजेपी से क्या गलती हुई?

भले ही भाजपा अपने दम पर बहुमत हासिल करने में विफल रही और तीसरे कार्यकाल के लिए अपने सहयोगियों पर निर्भर रही, फैजाबाद में पार्टी की आश्चर्यजनक हार सुर्खियों में आ गई है और एक बहस छिड़ गई है। दरअसल, बीजेपी की हार अयोध्या में भव्य मंदिर में रामलला की नई मूर्ति के प्राण प्रतिष्ठा समारोह के ठीक चार महीने बाद हुई। समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद ने बीजेपी के लल्लू सिंह को 54,500 वोटों से हराया।

टेम्पल टाउन में भाजपा को मिली करारी हार के लिए कई कारण बताए जा रहे हैं। ओबीसी और दलितों का बीजेपी से अलगाव, ठोस जातीय समीकरण साधने की अखिलेश यादव की चाल, अयोध्या के विकास के लिए ली गई जमीन का मुआवजा न मिलने से स्थानीय लोगों में नाराजगी कुछ ऐसे कारण हैं। एक वर्ग ने भाजपा की हार को पार्टी की दिल्ली और लखनऊ इकाइयों के बीच तनाव से भी जोड़ा।

कैसे बीजेपी का ‘400 पार’ नारा उल्टा पड़ गया?

फैजाबाद भी उन सीटों में से एक है जहां समाजवादी पार्टी के वोट बैंक के पक्ष में सबसे मजबूत जातीय समीकरण है। इसके अलावा, समाजवादी पार्टी के लिए जो बात कारगर साबित हुई, वह यह थी कि अगर भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला तो वह संविधान बदल देगी।

दरअसल, बीजेपी के लल्लू सिंह ने सबसे पहले अयोध्या में कहा था कि अगर बीजेपी को 400 से ज्यादा सीटें मिलेंगी तो संविधान बदल दिया जाएगा। इसके बाद समाजवादी पार्टी ने इस मुद्दे पर बयानबाजी करते हुए आरोप लगाया कि बीजेपी संविधान में बदलाव कर पिछड़ों, दलितों, अल्पसंख्यकों को मिले आरक्षण को खत्म करना चाहती है।

इस मामले ने इतना तूल पकड़ लिया कि बीजेपी पूरे चुनाव में इस पर सफाई देती रही और अपना सिक्का ज़माने की कोशिश की।

1984 के बाद से समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने फैजाबाद सीट दो-दो बार जीती है। 1991 के बाद बीजेपी को अयोध्या में प्रमुखता मिली।

भाजपा के कुर्मी और हिंदुत्ववादी चेहरे विनय कटियार ने इस सीट से तीन बार जीत हासिल की, जबकि समाजवादी पार्टी के मित्र सेन यादव 1989, 1998 और 2004 में यहां से चुने गए।

2004 में बीजेपी ने अपने ओबीसी चेहरे कटियार को हटाकर लल्लू सिंह को उम्मीदवार बनाया। सिंह ने 2014 और 2019 में लगातार दो बार सीट जीती। भाजपा ने पिछले दो चुनाव “मोदी लहर” पर सवार होकर जीते, लेकिन जैसे ही जाति मुख्य मुद्दा बन गई, पार्टी हार गई।

जातिगत समीकरण में अखिलेश यादव को मिला स्थान-

फैजाबाद में जातीय समीकरण को बीजेपी की हार के पीछे बड़ी वजह के तौर पर देखा जा रहा है। अयोध्या में ओबीसी मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक है, जिनमें कुर्मी और यादव सबसे बड़ा हिस्सा हैं।

मतदाताओं में ओबीसी 22% और दलित 21% हैं। दलितों में पासी समुदाय के सबसे ज्यादा वोटर हैं। विजयी उम्मीदवार अवधेश प्रसाद पासी समुदाय से आते हैं।

मतदाताओं में 18% मुस्लिम भी शामिल हैं। ये तीनों समुदाय मिलकर 50% मतदाता बनाते हैं। इस बार, तीन समुदाय – ओबीसी, दलित, मुस्लिम – समाजवादी पार्टी को फैजाबाद में एक यादगार जीत दिलाने के लिए एक साथ आए।

इसके अलावा, अयोध्या के विकास के लिए उनकी जमीनें लिए जाने के बाद मुआवजा न मिलने से स्थानीय लोगों में व्यापक नाराजगी थी।

ऐसी सुगबुगाहट थी कि जब अयोध्या का विकास हो रहा था और राम मंदिर का निर्माण हो रहा था, तो दूरदराज के गांवों के लोगों को कोई लाभ नहीं मिल रहा था। स्थानीय लोगों के बीच यह भी चर्चा थी कि बाहर से आने वाले व्यापारियों को फायदा हो रहा है, जबकि अयोध्या के लोग बड़ी परियोजनाओं के कारण अपनी जमीन खो रहे हैं।

भाजपा न केवल अयोध्या हार गई, बल्कि मंदिर शहर से सटे सभी सीटें – बस्ती, अंबेडकरनगर, बाराबंकी भी हार गई। अयोध्या नतीजे को न सिर्फ बीजेपी की हार के तौर पर देखा जा रहा है, बल्कि उनके हिंदुत्व दृष्टिकोण की हार के तौर पर भी देखा जा रहा है।

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