मुजफ्फरनगर किसान महापंचायत के सबक- केंद्र की पेशानी पर बल

विगत 5 सितम्बर 2021 को रविवार के दिन और शिक्षक दिवस के अवसर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर  में किसानों की जो पंचायत हुई उसने देश के सबसे बड़े राज्य उत्तार प्रदेश को ही नहीं बल्कि पूरे देश को एक बड़ा राजनीतिक सन्देश दिया है। किसानों के इसी राजनीतिक सन्देश की वजह से भाजपा और उसके सहयोगी राजनीतिक दलों को यह कहने  पर विवश होना पड़ा कि मुजफ्फरनगर की यह महापंचायत कोई किसान रैली न होकर एक राजनैतिक रैली है। इसमें दो राय भी नहीं है कि यह आयोजन किसी तरह का राजनीतिक आयोजन नहीं है।

इसके विपरीत यह कहना ज्यादा सही होगा कि मुजफ्फरनगर की किसान महापंचायत पूरी तरह से एक राजनीतिक रैली है। अगर ऐसा न होता तो भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष और इस महापंचायत के आयोजक राकेश टिकैत अपने संबोधन में यह नहीं कहते कि केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में अगर केन्द्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह किसान समस्याओं को हल करने की दिशा में बातचीत की पहल करें तो दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति  बनने और किसी निर्णायक फैसले पर पहुँचने की उम्मीद की जा सकती है। कहने का मतलब यह कि  किसानों को राजनाथ सिंह की मध्यस्थता स्वीकार है।
किसान महापंचायत से इस तरह का सन्देश जाना राजनीतिक दृष्टि से काफी कुछ साफ़ भी कर देता है। किसी भी केन्द्रीय सरकार को कोई भी आंदोलनकारी संगठन इससे साफ़ राजनीतिक सन्देश और क्या देगा ? किसानों को किसी तरह का कोई संदेह नहीं है कि केंद्र की भाजपा सरकार में कौन व्यक्ति ऐसा है जो किसानों की समस्याओं को समझता है और उनका समाधान करना भी  चाहता है।ऐसे व्यक्ति की पहचान करने के साथ ही किसान संगठनों ने उस पर भरोसा भी किया।
 यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है किपार्टी और सरकार के नेतृत्व में राजनाथ सिंह का किसके साथ छत्तीस का आंकड़ा चल रहा है। राजनाथ को किसानों का हमदर्द भी माना जाता है और उनके तार दिल्ली के झंडेवालान से लेकर नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेतृत्व के साथ कितनी मजबूती से जुड़ें हुए हैं। कहना गलत नहीं होगा कि सत्तारूढ़ गठबंधन के नितिन गडकरी सरीखे नेता भी किसान समस्या के हल के सन्दर्भ में राजनाथ सिंह के संपर्क में हैं। राजनाथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लोकसभा के भाजपा सांसद भी रह चुके हैं लिहाजा इस क्षेत्र के लोग उन्हें अपने करीब पाते हैं। किसान महापंचायत राजनीतिक है इसीलिए उत्तर प्रदेश की पीलीभीत लोकसभा सीट से भाजपा सांसद वरुण गांधी ने  भी किसानों के साथ हमदर्दी जताते हुए  अपनी सरकार से उनकी समस्याओं पर गंभीरता पूर्वक विचार करने की अपील भी की है। लोग माने या ना माने भाजपा में एक तबका बड़ी तेजी से यह महसूस करने लगा है कि बहुत अधिक समय तक किसान आन्दोलन की अनदेखी नहीं की जा सकती।  ऐसा करना अब भाजपा को चुनाव में नुकसानदायक साबित हो सकता है। भाजपा में इस तरह की राय रखने वालों का यह भी मानना है कि 2019के बाद अभी तक जितने भी राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए हैं वो दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से काफी दूरी पर स्थित हैं और इन राज्यों के चुनाव पर दिल्ली की सीमाओं पर धरना – प्रदर्शन कर रहे पंजाब , हरियाणा , पश्चिमी उत्तर प्रदेश , उत्तराखण्ड और राजस्थान  के  किसानों की सक्रियता का असर नहीं देखा गया था। पर समय के साथ अब हालात भी बदलते जा रहे हैं और किसान आन्दोलन प्रभाव करने की स्थिति में आता हुआ दिखाई देने लगा है। इसका असर अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड विधानसभा के चुनाव पर देखने को मिल भी सकता है।
गौरतलब है की इन दोनों राज्यों में जब 2017 में विधानसभा चुनाव हुए थे तब हरियाणा और दिल्ली  से लगे  पश्चिमी उत्तर उत्तर प्रदेश  के जिलों में जाट मतदाता हिन्दू बनाम मुस्लिम के साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण में विभाजित हो गए थे। इस बार किसानों के बीच ऐसी कोई खाई पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड के इन इलाकों में देखने को नहीं मिल रही है। मुजफ्फरनगर किसान महापंचायत में तो किसान नेता राकेश टिकैत ने  किसानों का आह्वान ही .”हर –  हर  महादेव ” और ,” अल्लाहू अकबर ” जैसे  दो नारों से किया और अपने संबोधन में यह भी साफ़ कर दिया कि अपनी जायज मांगों को पूरा करवाने के लिए किसानों को अब वोट की चोट भी करनी पड़ेगी। मतलब साफ़ है कि अगले विधानसभा चुनाव में किसानों को  केंद् और विधानसभा चुनाव में जाने वाले राज्यों में सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ कोई निर्णायक फैसला तो लेना ही होगा। मुजफ्फरनगर महापंचायत ने  पिछले 9 -10 महीने से दिल्ली  के टीकरी , सिंघु और गाजीपुर बॉर्डर पर चल रहे किसानों के धरने को लेकर किए जा रहे इस दुष्प्रचार को भी ख़त्म किया है कि केवल पंजाब के किसान ही धरना दे रहे हैं। किसान नेता  राकेश टिकैत ने अपने इलाके ( पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 36 किसान पंचायतों के साथ ही दिल्ली , हरियाणा , पंजाब , राजस्थान , उत्तराखण्ड  और अन्य राज्यों के किसानों की भागीदारी का प्रदर्शन कर यह साबित कर दिया कि केंद्र सरकार द्वारा पिछले साल  लागू किये गये तीन किसान विरोधी कानूनों के खिलाफ पूरे देश के किसान संगठित हैं। इस महापंचायत से राकेश टिकैत ने एक सन्देश यह भी देने की कोशिश की है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले का सिसौली इलाका किसान आन्दोलन में हमेशा ही अग्रणी रहा है और इसमें उनके परिवार की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
प्रसंगवश यह तथ्य किसी से भी छिपा नहीं है कि राकेश टिकैत और उनके भाई नरेश टिकैत के पिता स्वर्गीय महेंद्र सिंह टिकैत ने कई अवसरों पर दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों में बहुत बड़े किसान सममेलनोंके आयोजन किए हैं। इनमें दिल्ली के बोट क्लब मैदान का किसान आन्दोलन काफी चर्चित भी रहा . कई दिन तक चले इस आन्दोलन के दौरान किसान बोट क्लब पर ही रैली  करते थे , वही सोते भी थे और खाना – पीना , दिशा – मैदान तक सारे काम भी वहीं करते थे इसी तरह मेरठ में भी कचहरी मैदान में कई दिन तक महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में चला आन्दोलन भी यादगार बन गया था। सिसौली तो टिकैत परिवार का घर ही है इसलिए मुजफ्फरनगर जिला मुख्यालय में उनके नेतृत्व में किसानों का आंदोलन एक आम बात ही थी। इन्हीं किसान आन्दोलनों की वजह से महेंद्र सिंह टिकैत को किसान नेता के रूप में राष्ट्रीय पहचान भी मिली थी। उस जमाने में महाराष्ट्र की शेतकरी कामगार परिषद नामक किसान और मजदूरों की एक संस्था का बहुत नाम हुआ करता था और इस संस्था के अध्यक्ष शरद जोशी की किसान और मजदूर नेता के रूप में अंतरराष्ट्रीय पहचान हुआ करती थी। दिल्ली और आसपास के इलाकों में इस तरह के ऐसे अनेक कार्यक्रमों का आयोजन कर महेंद्र सिंह टिकैत ने राष्ट्रीय स्तर के किसान नेता के रूप में अपना एक नया मुकाम बनाया था।
आज की तारीख में कुछ ऐसी ही कोशिश उनके दोनों बेटे राकेश टिकैत और नरेश टिकैत भी कर रहे हैं। इन्हीं तमाम चीजों को ध्यान में रखते हुए ही राकेश टिकैत  के  नेतृत्व में आयोजित साल 20 21 की किसान महापंचायत ने राष्ट्रीय स्तर किसान आन्दोलन की झांकी दिखाने की गरज से 27 सितंबर को भारत बंद का आह्वान भी किया है।

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