विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने संसद की स्थायी समिति को बताया कि भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम कराने में अमेरिका की कोई भूमिका नहीं थी। सूत्रों ने बताया कि सैन्य कार्रवाई रोकने का फैसला दोनों पड़ोसी देशों के बीच द्विपक्षीय स्तर पर लिया गया था। मिस्री की यह टिप्पणी तब आई है जब कुछ विपक्षी सदस्यों ने संघर्ष रोकने में अपने प्रशासन की भूमिका के बारे में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बार-बार किए गए दावों पर सवाल उठाए।
पैनल के एक सदस्य ने पूछा, “ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कम से कम सात बार दावा किया कि उन्होंने युद्ध विराम में मदद की। भारत चुप क्यों रहा?” दूसरे ने स्पष्ट रूप से सवाल किया कि भारत ने “ट्रंप को बार-बार इस कथानक पर कब्ज़ा करने की अनुमति क्यों दी”, खासकर तब जब वह अपने बयानों में कश्मीर का ज़िक्र करते रहे।
सूत्रों ने बताया कि विदेश सचिव ने इन दावों का खंडन करते हुए कहा कि भारत-पाकिस्तान युद्ध विराम एक द्विपक्षीय निर्णय था जिसमें किसी तीसरे पक्ष की कोई भागीदारी नहीं थी। मिसरी ने पैनल को बताया, “युद्ध विराम समझौते में अमेरिका की कोई भूमिका नहीं थी।”
उन्होंने कहा, “डोनाल्ड ट्रंप ने केंद्रीय मंच पर आने के लिए हमारी अनुमति नहीं ली। वह केंद्रीय मंच पर आना चाहते थे, इसलिए आए।”
इसके अलावा, विदेश सचिव ने यह भी दोहराया कि भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष पारंपरिक युद्ध की सीमा के भीतर ही है, तथा इस्लामाबाद द्वारा किसी भी प्रकार के परमाणु हमले या संकेत का कोई सबूत नहीं है।
दोनों देशों के सैन्य संचालन महानिदेशकों (DGMO) के बीच 10 मई को सभी सैन्य कार्रवाइयों को रोकने पर सहमति बनी।
जब विपक्षी सदस्यों ने पाकिस्तान द्वारा चीनी मूल के सैन्य हार्डवेयर के इस्तेमाल पर चिंता जताई, तो विक्रम मिसरी ने कथित तौर पर कहा, “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्होंने क्या इस्तेमाल किया; महत्वपूर्ण बात यह है कि हमने उनके एयरबेसों पर जोरदार हमला किया”।
युद्ध के दौरान खोए गए भारतीय विमानों की संख्या के बारे में पूछे जाने पर, विदेश सचिव ने राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।
विदेश मंत्री एस जयशंकर के बयान पर सवालों का जवाब देते हुए मिसरी ने सदस्यों से आग्रह किया कि वे मंत्री के शब्दों को गलत न समझें। उन्होंने स्पष्ट किया कि जयशंकर ने कहा था कि नई दिल्ली ने ऑपरेशन सिंदूर के पहले चरण के बाद इस्लामाबाद को सूचित किया था कि केवल पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में आतंकी ठिकानों पर हमला किया गया था।
इस बीच बैठक के बाद कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा, “कोई विशेष प्रस्ताव पारित नहीं हुआ। कई सदस्यों की इच्छा थी कि विदेश सचिव के साथ एकजुटता व्यक्त करते हुए प्रस्ताव पारित किया जाए। विदेश मंत्रालय और विदेश सचिव खुद ऐसा प्रस्ताव नहीं लाना चाहते थे। हम उनके विचार का सम्मान करते हैं, लेकिन हम सभी सदस्यों की ओर से विदेश सचिव के प्रति समर्थन और एकजुटता की भावना से आपको अवगत कराते हैं। विदेश सचिव और विदेश मंत्रालय के साथ हमारी बहुत लंबी चर्चा हुई। सभी सदस्य विदेश सचिव के साथ एकजुटता की घोषणा करना चाहते थे। हम यह भी कहना चाहते हैं कि उन्होंने(विदेश सचिव) देश की बहुत अच्छी सेवा की है, हम सभी उनके आभारी हैं। 3 घंटे की चर्चा में कई सवाल उठाए गए, जिनके हमें जवाब मिले। हमें सभी जवाब मिले, यह एक अच्छी बैठक थी।”
वहीं तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने कहा, “यह राजनीति का समय नहीं है, जब देश की बात आती है तो राजनीति नहीं होनी चाहिए। TMC अपने सदस्य जरूर भेजेगी लेकिन पहले हमसे पूछें तो…किसी से संपर्क नहीं किया गया, मैं पार्टी का महासचिव हूं, क्या उन्होंने मुझसे संपर्क किया, क्या उन्होंने पार्टी अध्यक्ष से संपर्क किया? आप 5 नाम मांगिए, हम आपको देंगे…मेरी पार्टी से कौन जाएगा यह पार्टी तय करेगी, भाजपा नहीं…अगर वे हमसे नाम मांगेंगे तो मैं एक घंटे में दे दूंगा। यह नाम वापस लेने (यूसुफ पठान का नाम वापस लेने) की बात नहीं है, यूसुफ पठान जा सकते हैं, नहीं भी जा सकते हैं, मैं इस दृष्टिकोण की बात कर रहा हूं कि आप यह तय नहीं कर सकते कि हमारी पार्टी से कौन जाएगा।”
कांग्रेस सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता में विदेश मामलों पर संसद की स्थायी समिति की बैठक में तृणमूल के अभिषेक बनर्जी, कांग्रेस के राजीव शुक्ला और दीपेंद्र हुड्डा, एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी और अरुण गोविल सहित कई नेताओं ने भाग लिया।
मालूम हो कि यह बैठक पहलगाम हमले के प्रति भारत की सैन्य प्रतिक्रिया, ऑपरेशन सिंदूर, तथा दो परमाणु-सशस्त्र पड़ोसियों के बीच बढ़े तनाव के मद्देनजर हुई।
