सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। वर्मा के घर से इस महीने की शुरुआत में भारी मात्रा में नकदी बरामद हुई थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश द्वारा गठित न्यायाधीशों का एक पैनल मामले की जांच कर रहा है और जांच पूरी होने के बाद एफआईआर दर्ज करने पर फैसला लिया जाएगा।
न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा, “आंतरिक जांच जारी है। यदि रिपोर्ट में कुछ गलत पाया जाता है तो एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया जा सकता है या मामले को संसद को भेजा जा सकता है। इस समय इस रिट याचिका पर विचार करना उचित नहीं होगा।”
याचिकाकर्ता व अधिवक्ता नेदुम्परा ने कहा कि एक कॉमन मैन की तरह इस मामले में भी जांच होनी चाहिए। जस्टिस यशवंत वर्मा के यहां से जो कैश मिला है उसके बारे में सभी जानना चाहते है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि सभी मीडियाकर्मी और आम लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की गई? सुप्रीम कोर्ट ने उसी दिन घटना के बारे में क्यों नहीं बताया?
याचिका में मांग की गई थी कि पुलिस को जस्टिस वर्मा के खिलाफ केस दर्ज करने का निर्देश दिया जाए। इसके साथ ही याचिका में कहा गया है कि सीजेआई संजीव खन्ना की ओर से 22 मार्च को गठित तीन सदस्यीय इन-हाउस कमेटी को जस्टिस वर्मा के आवास पर आग लगने की घटना की जांच करने का कोई अधिकार नहीं है। वो घटना भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत विभिन्न संज्ञेय अपराधों के दायरे में आती है।
जल्द मामले कि सुनवाई के दौरान सह याचिकाकर्ता ने कहा कि अगर ऐसा मामला किसी आम नागरिक के खिलाफ होता तो सीबीआई, ईडी और आयकर विभाग जैसी एजेंसियां उस व्यक्ति के पीछे लग जाती। इस पर सीजेआई ने कहा कि याचिका पर सुनवाई होगी। वकील की यह भी दलील थी कि सुप्रीम कोर्ट ने सराहनीय काम किया है, लेकिन एफआईआर दर्ज करने की जरूरत है। इसपर सीजेआई ने याचिकाकर्ता से कहा था कि सार्वजनिक बयान न दें।
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता मैथ्यूज जे नेदुम्परा और तीन अन्य ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर के. वीरास्वामी मामले में 1991 के फैसले को भी चुनौती दी है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि भारत के मुख्य न्यायाधीश की पूर्व अनुमति के बिना हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के किसी जस्टिस के खिलाफ कोई आपराधिक कार्यवाही शुरु नहीं कि जा सकती है।
याचिका में कहा गया था कि न्यायाधीशों को दी गई छूट कानून के समक्ष समानता के संवैधानिक सिद्धांत का उल्लंघन है तथा इससे न्यायिक जवाबदेही और कानून के शासन के बारे में चिंताएं पैदा होती है। अदालत में दाखिल याचिका में जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास से अग्निशमन बल/पुलिस द्वारा भारी मात्रा में धन बरामद किए जाने की घटना को भारतीय न्याय संहिता (बीएमएस)के विभिन्न प्रावधानों के तहत दंडनीय संज्ञेय अपराध घोषित करने की मांग की गई है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की जनहित याचिका समय से पहले ही दायर की गई है, क्योंकि आंतरिक जांच चल रही है। अगर आंतरिक जांच में उन्हें दोषी पाया जाता है, तो सीजेआई संजीव खन्ना के पास एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने या सरकार को उन्हें हटाने की सिफारिश करने का विकल्प होगा।
पीठ ने कहा कि अगर आंतरिक जांच में उन्हें (जस्टिस यशवंत वर्मा) दोषी पाया जाता है, तो सीजेआई के पास एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने या सरकार को उन्हें हटाने की सिफारिश करने का विकल्प होगा। आज इस मामले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है। वर्तमान में एक आंतरिक जांच चल रही है। रिपोर्ट आने के बाद कई विकल्प हो सकते हैं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया।
इससे पहले 22 मार्च को सीजेआई ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ आरोपों की आंतरिक जांच करने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था।
न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने वकीलों से सलाह ली
सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त तीन सदस्यीय इन-हाउस समिति इस सप्ताह न्यायमूर्ति वर्मा से मुलाकात कर सकती है। सूत्रों ने बताया कि बैठक से पहले यशवंत वर्मा ने वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल, मेनका गुरुस्वामी, अरुंधति काटजू और अधिवक्ता तारा नरूला से कानूनी सलाह मांगी, जो उनके लुटियंस दिल्ली स्थित आवास पर आए थे।
रिपोर्ट के अनुसार, समिति ने मंगलवार को न्यायमूर्ति वर्मा के 30, तुगलक क्रीसेंट स्थित आवास का दौरा किया, क्योंकि उनके खिलाफ आरोपों की जांच शुरू कर दी गई है। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शील नागू, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जी एस संधावालिया और कर्नाटक उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति अनु शिवरामन करीब 30-35 मिनट तक न्यायमूर्ति वर्मा के आवास के अंदर रहे।
सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम ने न्यायमूर्ति वर्मा को उनके मूल इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वापस भेजने की सिफारिश की थी, जिन्हें भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना के निर्देश के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने पदच्युत कर दिया था।
