‘सरकार को नागरिकों की भूमि का लुटेरा नहीं होना चाहिए’ – कर्नाटक उच्च न्यायालय

कर्नाटक औद्योगिक क्षेत्र विकास बोर्ड (केआईएडीबी) के आचरण पर आपत्ति जताते हुए, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कहा है कि सरकार “लुटेरों के रूप में कार्य नहीं कर सकती”। सेंट ऑगस्टाइन की 5वीं शताब्दी की पुस्तक ‘द सिटी ऑफ गॉड’ का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा, “न्याय के बिना, राज्य लुटेरों के एक बड़े गिरोह के अलावा और क्या है?”

हाई कोर्ट ने कहा कि राज्य ने 5 जून 2014 को याचिकाकर्ताओं के नामों का उल्लेख करते हुए एक शुद्धिपत्र अधिसूचना जारी की थी, जिसमे वे मुआवजे के हकदार थे। हालांकि, मुआवजे का भुगतान आज तक नहीं किया गया है। न्यायमूर्ति कृष्णा एस दीक्षित ने अपने फैसले में कहा, “इस बात की कोई विश्वसनीय व्याख्या नहीं है कि डेढ़ दशक से मुआवजे का भुगतान क्यों रोका जा रहा है।”

हालांकि भूमि अधिग्रहण की चुनौती को कोर्ट ने खारिज कर दिया, लेकिन आदेश दिया कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 के तहत मुआवजा 50 फीसदी की दर से फिर से तय किया जाना चाहिए। KIADB को याचिकाकर्ताओं को प्रति एकड़ 25,000 रुपये की लागत का भुगतान करने का भी निर्देश दिया गया।

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा, “सरकार नागरिकों की भूमि के लुटेरे के रूप में कार्य नहीं कर सकती है। इस तरह का आचरण एक सामंती रवैये की बेड़ियों को मजबूत करता है जिससे हमारे संविधान का परिवर्तनकारी चरित्र मुक्त होना चाहता है। कथित सार्वजनिक उद्देश्य के लिए निजी भूमि को बिना मुआवजे के लेना अनुच्छेद 300ए के तहत अधिनियमित संवैधानिक गारंटी की भावना के खिलाफ है, संपत्ति का मौलिक अधिकार अब क़ानून की किताब पर नहीं है।”

इससे पहले जनवरी 2013 में याचिकाकर्ताओं ने कर्नाटक औद्योगिक क्षेत्र विकास बोर्ड (केआईएडीबी) से अधिनिर्णय पारित करने और मुआवजे का भुगतान करने का अनुरोध किया था, लेकिन अधिकारियों की ओर से इस पर चुप्पी साध ली गई। यह तर्क दिया गया था कि मुआवजे का भुगतान अधिग्रहण को बनाए रखने के लिए एक पूर्व शर्त है।

याचिकाकर्ता एम वी गुरुप्रसाद और नंदिनी गुरुप्रसाद ने 2007 में केआईएडीबी द्वारा उनकी भूमि के अधिग्रहण के खिलाफ 2016 में उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ताओं ने भूमि अधिग्रहण और केआईएडीबी द्वारा मुआवजे का भुगतान न करने पर सवाल उठाया गया था। इन्होने अपनी याचिका में कहा- प्रारंभ में अधिग्रहण अधिसूचना से उनके नाम गायब थे और सरकार को 2014 में एक शुद्धिपत्र जारी करने और उनके नाम शामिल करने में सात साल लग गए।

मालूम हो कि सुनवाई के दौरान 1904 के अमेरिका के एक मामले (डेविस बनाम मिल्स) का हवाला देते हुए उच्च न्यायालय ने कहा, “संविधानों का उद्देश्य व्यावहारिक और पर्याप्त अधिकारों को संरक्षित करना है, सिद्धांतों को बनाए रखना नहीं है।”

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