TP Exclusive-हवा अवामी तो है पर निर्वाचन आयोग का घुटना टेक समर्पण और आधार निगाही का खतरा भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही नहीं उनकी मात्तृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को भी पूर्वाभास हो गया है कि उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के हार जाने पर मोदी जी का दिल्ली तखत खतरे में पड़ जाएगा। भारत को सांविधिक रूप से हिन्दू राष्ट्र उदघोषित करने का लोकसभा चुनाव-2014 के बाद हाथ लगा मौका शायद ही फिर आसानी से मिले। मोदी जी ने साढ़े सात बरस पहले हाथ आए इस मौके को बूढ़ी होती अपनी हथेली की फिसलन से बचाने राजकाज की सर्वोच कमान अब खुद संभाल ली है। वह इसी दिसंबर माह काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरीडोर के उद्घाटन के लिए वाराणसी और गंगा एक्सप्रेस वे शिलान्यास हेतु शाहजहांपुर और अन्य केंद्रों का हवाई चक्कर लगा चुके हैं। वे चुनावी तैयारी के लिए यूपी के अन्य जगहों पर भी जाने वाले हैं। हड़बड़- गड़बड़ गोदी मीडिया ने मोदी जी के चुनावी चाणक्य माने जाने वाले पूर्व भाजपा अध्यक्ष एवं मौजूदा केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह की लखनऊ में 17 दिसम्बर को आयोजित “निषाद रैली” में कही गई बात को खूब प्रचारित करवा दिया है कि मोदी जी का तख्त बचाना है तो 2017 में बने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उर्फ अजय सिंह बिष्ट को पाँच बरस के उनके शासन से अवाम में उत्पन्न व्यापक क्षोभ के बावजूद उन्हें ही इस कुर्सी पर वापस लाना होगा।

 

भाजपा हराने अवामी गठजोड़-

लेकिन उफ ये लेकिन, मोदी-योगी राज की लाख कोशिशों के बावजूद अब यूपी में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का वो माहौल नहीं बन रहा जो 2014 के आम चुनाव के समय मुजफ्फरनगर के दंगों से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैल गया था। भाजपा के लिए अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर अभियान के चुनावी फायदे अब शायद उतने सुहाने नहीं रहे। मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि मंदिर का मुद्दा भी ज्यादा नहीं उभर रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के चुनावी गठबंधन को दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के पौत्र एवं दिवंगत केन्द्रीय मंत्री अजित सिंह के पुत्र जयंत के रूप में तीसरी पीढ़ी के पहले जाट चौधरी के राष्ट्रीय लोक दल का ही नहीं बल्कि अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव के गुट , बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस , पूर्व रक्षा मंत्री एवं महाराष्ट्र के मराठा नेता शरद पवार और अब भारत की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी , सीपीएम , के महासचिव सीताराम येचुरी का भी समर्थन हासिल हो गया है। ये सब अवामी दवाब में ही हुए हैं और उसके और बढ़ने पर चुनाव उपरांत परिदृश्य में उसे कांग्रेस और यहाँ तक कि पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी ( बसपा ) का भी कम ज्यादा साथ मिलने की संभावना से साफ इनकार नहीं किया जा सकता है।

 

किसान आंदोलन, कोविड विनाशलीला-

बरस भर चले किसान आंदोलन के राजकीय दमन के उपायों के कारण सरकार की किरकिरी हुई है और लोग इसके दंडस्वरूप भाजपा को चुनावी शिकस्त देने जगह-जगह स्वतःस्फूर्त रूप से खड़े होते जा रहे हैं। गंगा नदी के हरिद्वार से लेकर इलाहाबाद के तटवर्ती क्षेत्रों में कोरोना कोविड 19 महामारी में लाखों लोगों की जान लील लेने की विनाशलीला का असर कुछ कम हो रहा था कि जबरदस्त महंगाई, बेरोजगारी ,सरकारी नौकरियों में भर्ती में धांधली और उचित वेतन , पेंशन , मानदेय के लिए शिक्षक , कर्मचारी , आशा, आंगनबाड़ी महिला कर्मियों के आंदोलन से भाजपा के समर्थक मध्य वर्ग का भी तेजी से इस कदर मोहभंग हुआ कि मोदी-योगी -राज के खिलाफ अवाम ही विपक्ष बनकर खड़ी होने लगी है। ये गठजोड़ सियासी तो है लेकिन सियासत की हस्तियों से ज्यादा आम अवाम का लगता है।

लखीमपुर खीरी में इसी बरस तीन अक्टूबर को किसानों को अपने वाहन से कुचल कर मार डालने के आरोपी आशीष मिश्र के सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में कायम विशेष जांच दल की रिपोर्ट में गुनाहगार होने के अकाट्य साक्ष्य आने के बावजूद उनके पिता केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री और भाजपा नेता अजय मिश्र टेनी को बचाने की मोदी सरकार की हरकत ने जैसे आग में घी डालने का काम किया है। अजय मिश्र टेनी के खिलाफ 17 बरस से फौजदारी मामला लंबित है जिसमें उन पर 2000 में प्रशांत गुप्ता नामक एक युवक की हत्या का अभियोग है। उन्हें जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत ने 2004 में इस मामले में बरी कर दिया था। उस अदालती फैसले के खिलाफ 5 फरवरी 2019 से लंबित अपील पर 34 बार सुनवाई की तारीख तय होने के बावजूद अंतिम कार्यवाही नहीं हुई है। सन 2004 की क्रिमिनल अपील संख्या 1624 पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लाखनऊ बेंच में फैसला 12 मार्च 2018 को ही सुरक्षित रखा गया था।

चुनाव आयुक्तो को पीएमओ फरमान-

प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की एक बैठक में निर्वाचन आयोग के आयुक्तों को पेश होने के जारी फरमान को लेकर सियासी और विधिक हलके में भी हो हल्ला मच गया। मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्र ही नहीं बल्कि दोनों अन्य चुनाव आयुक्त, राजीव कुमार और अनूप चंद्र पांडे भी मूलतः यूपी के हैं। उन्हें 16 नवंबर को पीएमओ के एक अफसर द्वारा ऑनलाइन वार्ता में बुलाने पर राज्यसभा में विपक्ष एवं कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा ऐसे में कैसे माना जाए कि आगामी चुनाव निष्पक्ष होंगे।

खड़गे जी का सवाल है पीएमओ , चुनाव आयुक्तों को बुलाने कैसे फरमान जारी कर सकता है? प्रोटोकॉल के अनुसार कोई अफसर किसी मुद्दे पर राय लेने निर्वाचन आयोग के पास जा सकते हैं। पर कोई अफसर तो क्या प्रधानमंत्री स्वयं भी ऐसा नहीं कर सकते। ये आयोग भारत के संविधान के तहत कायम स्वतंत्र सांविधिक निकाय है। पीएमओ कोई सांविधिक निकाय नहीं है। उनका आरोप है मोदी सरकार हर संस्था की स्वतंत्रता खत्म कर रही है। उसने केन्द्रीय जांच ब्यूरो और केन्द्रीय सतर्कता आयोग की भी स्वतंत्रता नष्ट कर दी है।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी (सीपीएम ) के महासचिव एवं पूर्व सांसद सीताराम येचुरी ने अपने ट्वीट में इसे अटरोसियस लिखा जिसका हिंदी अर्थ अत्याचार होता है। उन्होंने सवाल किया पीएमओ किसी स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरण को कैसे बुला सकता है? इससे भी बुरी बात है निर्वाचन आयोग का इतना लापरवाह हो जाना । वह पीएमओ की बुलाई बैठक में कैसे उपस्थित हो सकता है? भारत के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। साफ है मोदी सरकार निर्वाचन आयोग को अपंग करना चाहती है। इसका देश में चुनावों और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने इस प्रकरण में “ चुनाव आयोग की स्वायत्तता और स्वतंत्रता” पर चर्चा करने के लिए लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दाखिल कर दिया।

पूरा प्रकरण ये है कि केन्द्रीय विधि कानून मंत्रालय ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पीएमओ की बैठक में बुलाने पत्र भेजा जिसकी समन , नोटिस की भाषा पर आपत्ति होने के बावजूद मुख्य चुनाव आयुक्त 16 नवंबर की इस बैठक में भागीदार हुए। पत्र जारी होने के बाद तीनों चुनाव आयुक्त को पीएमओ के अधिकारियों के साथ बैठक में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हाजिरी लगानी पड़ी। पत्र में लिखा था कि प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पीके मिश्रा की अध्यक्षता में होने वाली एक बैठक में चुनाव आयुक्तों की उपस्थिति जरूरी है। पहले भी ऐसी दो बैठक पिछले बरस 13 अगस्त तीन सितंबर को हुई थीं जिनमें निर्वाचन आयोग के अधिकारी हाजिर नहीं हुए थे।

मुख्य चुनाव आयुक्त रह चुके एसवाय कुरैशी, टीएस कृष्णमूर्ती , ओपी रावत और एन गोपालास्वामी के अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस के साथ व्यक्त विचार में पहले तीन के मुताबिक ये पत्र आयोग की स्वतंत्रता के खिलाफ है। गोपालास्वामी ऐसा नहीं मानते। जुलाई 2010 से जून 2012 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे कुरैशी जी ने सीधा सवाल किया कि क्या पीएमओ न्यायिक सुधारों के लिए अपनी बैठक में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को भी बुला सकता है ?

गौरतलब है कि विधि आयोग ने केंद्र सरकार को 2015 में सौंपी 255 वीं रिपोर्ट की अनुशंसाओ पर चुनाव सुधार के कुछ कदम उठाए गए हैं जिनमें से समान मतदाता सूची के सुझाव पर निर्वाचन आयोग भी सहमत है। देश के विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से अधिकतर पंचायत आदि स्थानीय निकायों के चुनावों में निर्वाचन आयोग द्वारा तैयार वोटर लिस्ट का पूरी तरह इस्तेमाल करते है लेकिन कुछ इसका आंशिक उपयोग ही करते है।

वोटर आईडी को आधार से जोड़ने के लिए लोकसभा ने चुनाव कानून (संशोधन) विधेयक, 2021 पारित कर दिया है। ग्वालियर के सोशल मीडिया एक्टिविस्ट गिरीश मालवीय के त्वरित अध्ययन के अनुसार इसके तहत किसी वोटर से चुनाव अधिकारी वोटर लिस्ट में प्रविष्टि के प्रमाणीकरण के लिए उसका आधार नंबर मांग सकते हैं। साथ ही वोटर लिस्ट डेटा को आधार सिस्टम से लिंक किया जा सकता है। सन 2010 में आधार विधेयक लाने पर साफ कहा गया था इसका इस्तेमाल सिर्फ सरकार की योजनाओं में किया जाएगा। 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आधार का इस्तेमाल सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) और एलपीजी एवं केरोसिन तेल के वितरण की योजना तक सीमित रखने के निर्देश दिये थे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की बाद में अवहेलना कर आधार को हर योजना में लिंक करना लगभग अनिवार्य कर दिया गया । आधार को फ़ोन, बैंक, टीकाकरण आदि कई कार्यों से जोड़ा जा चुका है। आधार को वोटर आईडी से जोड़ने से वोटरों की प्रोफाइलिंग की अनुमति दी जा रही जिन्हें बाद में ‘ टारगेट ‘ किया जा सकता है। सरकार को आसानी से पता चल जाएगा कोई वोटर किस राजनीतिक विचारधारा का समर्थक है। जुलियन असांजे की विकीलीक्स ने दावा किया है कि अमेरिकी की सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी (सीआईए) ने आधार डाटा को चुरा लिया है।

संसद के हालिया शीतकालीन सत्र में 20 दिसम्बर को विपक्षी दलों के विरोध के बावजूद लोकसभा में विधि मंत्री किरण रिजिजू द्वारा पेश चुनाव सुधार संशोधन विधेयक 2021 पेश कर बिन बहस के पास भी कर दिया गया। उन्होंने कार्मिक , लोक शिकायत , विधि एवं न्याय मामलों पर संसद की स्थाई कमेटी की 105 वीं रिपोर्ट के हवाले से दावा किया आधार को लिंक करने से वोटर लिस्ट ‘ शुद्ध ‘ हो जाएगी।

बहरहाल, मोदी सरकार की मानें तो अब चुनाव प्रक्रिया के सारे अवांछित पाप काशी में गंगा में डुबकी लगा कर धोने की दरकार नहीं है। ये पाप आधार कार्ड से धुल जाएंगे।

 

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