प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासकीय परिवार का दायरा बढ़ गया है। इस कुनबे के सदस्यों की जो संख्या गुरूवार 7 जुलाई 2021 की शाम 6 बजे तक 53 थी वो एक घंटा 25 मिनट बाद शाम 6 बज कर 25 मिनट पर बढ़ कर 77 हो गई। खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को मिलकर उनकी कैबिनेट के सदस्यों की कुल संख्या अब 78 हो गई है। इनमें प्रधानमंत्री के अलावा 30 मंत्री कैबिनेट स्तर के , 45 राज्यमंत्री स्तर के और 2 राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभारवाले हैं। नियमानुसार प्रधान मंत्री को मिला कर उनकी मंत्रिपरिषद में 81 मंत्री हो सकते हैं , इस लिहाज से अभी 3 और लोगों को एडजस्ट करने की पूरी गुंजाइश है , लगता है यह गुंजाइश भी फिलहाल जान बूझ कर छोडी गई है ताकि आड़े वक़्त काम आने वाले ऐसे कुछ लोगों को अंतिम समय में एडजस्ट किया जा सकें।
यह अंतिम समय अगले साल 2022 में कुछ राज्य विधानसभाओं के चुनाव से कुछ महीने पहले का भी हो सकता है और 2024 में होने वाले 18 वीं लोकसभा के चुनाव से कुछ महीने पहले का भी हो सकता है। बहरहाल यह प्रधानमंत्री की इच्छा पर निर्भर करता है कि वो भविष्य में कब अपनी मंत्रिपरिषद का विस्तार या उसमें फेर बदल करना चाहते हैं, पर उनके मंत्नरिमंडल में हुए नए और जम्बो विस्तार के बाद यह सवाल भी स्वाभाविक रूप से उठने लगे हैं कि जिस व्यक्ति ने अब तक न्यूनतम सरकार , अधिकतम शासन के मंत्र पर अमल करते हुए केंद्र में कम से कम मंत्रियों के साथ काम करने की परंपरा का निर्वाह किया हो , उसे अचानक इतना भारी – भरकम मंत्रिमंडल बनाने की जरूरत आखिर क्यों आ गई ? इस सवाल का जवाब सहज नहीं है।
इतना कहा जा सकता है कि राजनीतिक मजबूरियाँ किसी राजनेता से कब कोई काम करा ले , कोई नहीं जानता। फिलहाल प्रधानमंत्री के सामने सबसे बड़ी मजबूरी चुनाव की है। इनमें एक है 2022 का मिनी आम चुनाव जिसमें देश के उत्तरप्रदेश , उत्तराखण्ड , हिमाचल , पंजाब , मणिपुर , गोवा और गुजरात राज्य विधानसभाओं के चुनाव होने हैं तो दूसरी मजबूरी से 18 वीं लोकसभा का चुनाव जो 2024 में होना है। इन दोनों चुनाव को ध्यान में रख कर ही अपने जम्बो मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जातीय , धार्मिक , क्षेत्रीय , सामाजिक और राजनीतिक सभी तरह के समीकरण साधने और समेटने की कोशिश की है। इस कोशिश का कितना फायदा सत्तारूढ़ पार्टी को मिल पायेगा इसका पता तो बाद में ही चल पायेगा लेकिन प्रधानमंत्री की इस कोशिश ने आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी के मनीष सिसोदिया और अखिलेश यादव जैसे विरोधी दलों के नेताओं को यह कहने का मौका जरूर दे दिया है, कि पटरी के बाहर जा रही ट्रेन का एक डिब्बा बदलने की नहीं बाल्की पूरी ट्रेन ही बदलने की जरूरत है।
मंत्रिमंडल विस्तार के बाद यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री अखिलेश यादव ने थी। इसी कड़ी में दिल्ली के उपमुख्यमंत्री और आप नेता मनीष सिसोदिया ने कहा था , ” लगता है साहब का विश्वास हिला हुआ है ” मनीष सिसोदिया की बात को पूरी तरह स्वीकार न भी करें लेकिन जिस तरह के प्रयास नए मंत्रिमंडल के विस्तार और फेरबदल में किये गए हैं, उनसे तो यही लगता है कि कहीं कुछ खो गया है जिसे खोजने की कोशिश में यह कवायद की गई है। जो चीज खो गई है वो और कुछ नहीं नरेन्द्र मोदी का विश्वास है।
उनका विश्वास कई वजह से डगमगाया है। इनमें पहली वजह यह है कि उनकी मंत्रिपरिषद के दर्जन भर वरिष्ठ और पुराने सहयोगियों ने अपने मंत्रालयों के कामकाज से उनको परेशान किया तो दूसरी तरफ महंगाई की मार और कोरोना काल की जग हंसाई की वजह से उन्हें इतने कठोर कदम उठाने पड़े कि एक साथ अपने 12 मंत्रियों को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया , इनकी विदाई के साथ ही 36 नए साथियों को मंत्रिमंडल में शामिल भी कर दिया और अच्छा काम करने वाले कई मंत्रियों को प्रमोशन देकर राज्य मंत्री से केबिनेट मंत्री बना दिया।
नरेन्द्र मोदी नई टीम से कुछ ख़ास काम करवाना चाहते हैं, शायद इसीलिए सभी 77 मंत्रियों को निर्देश दिए हैं कि वो 15 अगस्त तक दिल्ली छोड़ कर न जाएँ। मंत्रिमंडल में हुए इस बदलाव का कारण बने जिन पूर्व मंत्रियों को बाहर का रास्ता देखना पड़ा उनमें पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री डॉक्टर रमेश पोखरियाल निशंक , पूर्व क़ानून और आईटी मंत्री रवि शंकर प्रसाद ,पूर्व स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन , पूर्व रसायन मंत्री सदानंद गौड़ा , पूर्व श्रम मंत्री संतोष गंगवार , पर्यावरण मंत्री बाबुल सुप्रियो , देबोश्री चौधरी ( महिला और बाल विकास ),रतनलाल कटारिया ( जल शक्ति ), प्रताप सारंगी ( पशुपालन ) और संचार राज्य मंत्री संजय धोत्रे के नाम उल्लेखनीय हैं। ये सभी मंत्री बाहर इसलिए हुए क्योंकि न तो ये अपने मंत्रालयों का सही से ध्यान रख सके और न ही इन्होने कोई बेशकीमती राजनीतिक योगदान ही किया था। इनमें बाबुल सुप्रियो तो ऐसे राजनेता हुए जो केंद्र में मंत्री होने के बाद बंगाल विधानसभा का चुनाव नहीं जीत सके।
मोदी मंत्रिमंडल से बाहर होने वाले एक पूर्व मंत्री थावरचंद गहलोत भी हैं, लेकिन उनको राज्यपाल की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है इसलिए उनके योगदान को सकारात्मक ही माना जाएगा। काम करने वाले पूर्व राज्य मंत्रियों को प्रमोशन भी दिया गया जिनमें किरण रिजीजू , आरके सिंह , हरदीप पूरी , मनसुख मांडविया , पुरुषोत्तम रुपाला , जी किशन रेड्डी और अनुराग ठाकुर के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जो अब क्रमशः भारत के क़ानून , उर्जा , पेट्रोलियम – शहरी विकास ,रसायन डेरी – मतस्य विकास,पूर्वोत्तर मामले तथा खेल और सोचना प्रसारण मंत्री हैं।
सामाजिक समीकरण साधने की गरज से नए मंत्रिमंडल में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ा कर सात किया गया है , पिछड़े वर्ग के 27 लोगों को प्रतिनिधित्व दिया गया है और पांच अल्पसंख्यकों को मंत्रिमंडल में जगह दी गई है। कहा यह भी जा रहा है कि विस्तार को लेकर नजर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव पर है इसलिये उत्तरप्रदेश से सबसे ज्यादा चेहरे मंत्रिपरिषद में लाये गए हैं, और गुजरात समेत हिमाचल, गोवा और उत्तराखंड समेत ऐसे कई राज्यों को विस्तार में जगह मिली है। पर ऐसा है नहीं अगर ऐसा होता तो पंजाब और मणिपुर से भी मंत्री बनाया होता , उत्तराखंड के कोटे के कैबिनेट मंत्री
( रमेश पोखरियाल ) की जगह राज्य मंत्री ( अजय भट्ट ) को लाया जाता। ऐसा ही था तब ओडिशा को जरूरत से ज्यादा वजन न मिलता बंगाल चुनाव में हार के बाद बंगाल को भी भूल जाते , महाराष्ट्र से भी और मंत्री नहीं बनाए जाते , बिहार को भी ज्यादा तूल नहीं दी जाती। यह सब हुआ तो इसका मतलब साफ़ है कि मंत्रिमंडल का यह विस्तार अगले साल के सात विधानसभा चुनाव को ध्यान में रख कर कम , 2022 के लोकसभा चुनाव की प्राथमिकता को ध्यान में रख कर अधिक किया गया है।
