विचार और सिद्धांत विहीन राजनीति में जितिन प्रसाद जैसे नेता आते – जाते रहते हैं- ज्ञानेन्द्र पाण्डेय

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर और धोरहारा संसदीय क्षेत्र  से जीते कांग्रेस के पूर्व कांग्रेस और पूर्व केन्द्रीय राज्य मंत्री  जितिन प्रसाद कांग्रेस पार्टी छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गए। किसी नेता का एक पार्टी छोड़ कर किसी दूसरी पार्टी का दामन थाम लेना राजनीति की एक सामान्य सी घटना है। विचारहीन राजनीति में इस तरह की घटनाएं होती रहतीं हैं। नेताओं की अदला – बदली और पलायन की ऐसी घटनाएं, पार्टी छोड़ कर जाने वाले नेता और उस नेता को अपने में शामिल करने वाली पार्टी के आपसी हितों को ध्यान में रख कर ही होती और की जाती हैं। इसमें दोनों पक्षों के निहितार्थ शामिल होते हैं जाने वाले नेता को लगता है कि उसे इस पार्टी में जो नहीं मिल सका है वो उसे उस पार्टी में मिल जाएगा जहां वो जाना चाहता है।

दूसरी तरफ वो पार्टी जहां उसे जाना होता है , यह सोचती है कि इस नेता के आने से उसका आधार और मजबूत होगा।  कभी – कभी ऐसा भी होता है कि जब कोई पार्टी राजनीति में निरंतर पिछड़ती  ही चली जाती है तो उसके नेता एक – एक कर उसे छोड़ना पसंद करते हैं और ऐसी पार्टी का दामन थामने की कोशिश में रहते हैं जिसका भविष्य उन्हें अच्छा नजर आता है। जिस तरह चूहे भी  डूबते जहाज को छोड़ना ही पसंद करते हैं। उसी तरह राजनीति में नेता भी सफल पार्टी के साथ ही रहना चाहते हैं। कई बार इस तरह की पाला बदली में धोखा भी हो जाता है और एक पार्टी छोड़ कर दूसरी पार्टी में जाने वाला नेता कहीं का नहीं रह जाता। पश्चिम बंगाल में ऐसा हो चुका है।
 इसी साल मार्च  से मई महीने के बीच संपन्न राज्य  विधानसभा के चुनाव से पहले सत्तारूढ़ तृणमूल  कांग्रेस के नेता बड़ी संख्या में पार्टी छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए थे लेकिन इनमें शुवेंदु अधिकारी जैसे अपवाद नेताओं को छोड़ कर ज्यादातर टीएमसी नेता चुनाव हार गए और अब हालत ऐसी हो गई है कि वो वापस ममता का दामन थामना चाहते हैं लेकिन ….!जितिन का कांग्रेस छोड़ना कुछ ऐसा ही है।
जितिन कांग्रेस के कितने बड़े नेता हैं और उनका देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की राजनीति में कितना व्यापक आधार है इसका अंदाजा इसी बात से लग सकता है कि 2014 और 2019 का लोकसभा चुनाव तो वो हारे ही हैं इसके साथ ही कांग्रेस जैसी पुरानी और बड़ी पार्टी के महासचिव होने के बावजूद वो 2021 के पंचायत चुनाव में अपनी सगी भाभी को भी सरपंच का चुनाव नहीं जीत सके। यही नहीं इससे पहले 2017 में संपन्न राज्य विधान सभा के चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर तिलहर विधानसभा क्षेत्र का चुनाव भी वो जीत नहीं सके थे। जमीनी राजनीति के इतने सर्वगुण संपन्न नेता होने के बाद वो भाजपा को कितना फायदा ब्राह्मण होने का दिला पायेंगे यह तो समय ही बतायेगा लेकिन राज्य के वर्तमान मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ जैसी ठाकुर भाजपा नेता उनको भविष्य में कितना झेल पायेंगे यह भी वक़्त ही बतायेगा। यह माना कि यूपी में  फिलवक्त  ब्राहमण भाजपा से नाराज हैं और भाजपा जातीय राजनीति के चश्मे से देखते हुए ब्राह्मणों को खुश करने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती इसीलिए ब्राहमण नेता के रूप में कांग्रेस के जितिन प्रसाद का वरण भी पार्टी ने किया है ।
 इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश कैडर के अवकाशप्राप्त आईएएस अधिकारी अनूप चन्द्र पण्डे को राष्ट्रीय निर्वाचन आयुक्त भी बनाया गया है। अगर ऐसा है तो कहा जा सकता है कि भाजपा इस वक़्त वैचारिक राजनीति के भयंकर दारिद्रय के दौर से गुजर रही है। क्योंकि न तो जितिन के आने से ब्राह्मण वोट उसकी झोली भर देंगे और न ही अनूप चन्द्र पण्डे प्रशासनिक स्तर पर कोई ऐसा चमत्कार ही कर देंगे कि जितिन – अनूप की जोड़ी उसका बड़ा पार लगा दे। इसी पृष्ठभूमि में यह जान लेना भी कम दिलचस्प नहीं होगा कि जितिन कांग्रेस के कितने बड़े और व्यापक आधार वाले नेता थे। याद हो कि उनके पिता स्वर्गीय जितेन्द्र प्रसाद की कांग्रेस के बड़े नेताओं में गिनती हुआ करती थी। जितेन्द्र प्रसाद शाहजहांपुर से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ते और जीतते भी थे। ब्राह्मण होने के साथ ही कांग्रेस की ठाकुर बनाम ब्राहमण राजनीति के क्रम में जितेन्द्र प्रसाद कांग्रेस के वरिष्ठ ठाकुर नेता स्वर्गीय अर्जुन सिंह के खिलाफ ताल  ठोक कर  उनके धुर विरोधी पूर्व प्रधान मंत्री और वरिष्ठ दक्षिण भारतीय नेता पीवी नरसिंह राव  के साथ जुड़े हुए थे। इसी तरह के राजनीतिक समीकरणों की वजह से जितेन्द्र प्रसाद ने कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में सोनिया गाँधी के खिलाफ उम्मीदवारी का दावा भी किया था और चुनाव हार गए थे। इसकी एक वजह यह भी थी कि सोनिया गाँधी तो 1991 में अपने पति  राजीव गाँधी की हत्या के बाद से ही राजनीति में न आने का फैसला ले चुकी थीं लेकिन  अर्जुन सिंह और अन्य वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के कई साल तक अनुरोध करने के बाद उन्होंने राजनीति में आने का फैसला लिया था।
 यह 1996 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हार जाने के बाद का दौर था । इस दौर में पीवी नरसिंह राव के उत्तराधिकारी के रूप में स्वर्गीय सीताराम केसरी की कांग्रेस अध्यक्ष की रूप में ताजपोशी में हुई छीछालेदर के करीब एक – डेढ़ साल  बाद सोनिया गाँधी ने राजनीति में प्रवेश किया और कांग्रेस की बागडोर अपने हाथ  में ली थी। जितेन्द्र प्रसाद के निधन के बाद उनके पुत्र के रूप में कांग्रेस ने उनको सब कुछ दिया लेकिन अंत में उन्होंने कांग्रेस से किनारा कर लिया। जितिन प्रसाद ने साल 2004 में पहली बार शाहजहांपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीता था। यह चुनाव जीतने के चार साल बाद ही 2008 में उनको केन्द्रीय इस्पात मंत्रालय में राज्य मंत्री बना कर सम्मानित किया गया था।
जितिन ने 2009 का लोकसभा चुनाव धोरहारा से लड़ा और जीता था। यह चुनाव जीतने के बाद 2009 से 2011 तक वो केन्द्रीय पेट्रोलियम और रसायन राज्य मंत्री रहे और उसके बाद केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री बनाए गए थे इस पद पर वो 2014 के लोकसभा चुनाव होने तक बने रहे थे। इसके बाद 2014 और 2019 के दोनों लोकसभा चुनाव में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा था यही नहीं इस बीच 2017 में हुए उत्तर विधान सभा के चुनाव में वो तिलहर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हार गए थे। इसके बाद 2021 में पंचायत के चुनाव में कांग्रेस का इतना बड़ा नेता अपनी भाभी को पंचायत का चुनाव नहीं जीत में मदद कर सका।  कांग्रेस का इतना बड़ा नेता अब भाजपा का हो गया। उनके बारे में उत्तर प्रदेश कांग्रेस के मौजूदा अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू का यह कथन अक्षरशः सही लगता है ,
“इतना सम्मान देने के बाद भी अगर कोई नेता पार्टी से वफादारी न करे तो यह पार्टी के साथ विश्वासघात है ” जितिन को शिकायत थी कि पार्टी उन्हें काम नहीं करने देना चाहती वो ब्राह्मणों के किये कुछ करना चाहते थे लेकिन पार्टी के बड़े नेताओं ने तवज्जो नहीं दी। जितिन ने 2017 में ब्राह्मण सम्मेलन करने का सिलसिला शुरू किया था लेकिन इसका कोई फायदा पार्टी को नहीं मिला। अगर ब्राह्मणों को खुश करने की  उनकी मेहनत रंग लाई होती 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की स्थिति पहले से बेहतर होती पर हुआ इसका उल्टा राज्य विधान सभा में कांग्रेस की सीटों में कोई इजाफा नहीं हुआ था। इसीलिए जब जितिन प्रसाद ने 20 19 में एक बार फिर ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित करने का प्रस्ताव पार्टी नेताओं के सामने रखा तो उसे बहुत महत्त्व नहीं दिया गया। जितिन प्रसाद की इन तमाम योग्यताओं के बावजूद अगर भाजपा के बड़े नेताओं को ऐसा लगता है कि उनके आने से उत्तर प्रदेश में भाजपा मजबूत होगी तो इसका एक मात्र मतलब यही निकाला जा सकता है कि भाजपा नेताओं की निगाहों में देश के सबसे बड़े राज्य में पिछले पांच साल से सत्ता में रहने के बावजूद आज पार्टी कमजोर हो गई है। अगर ऐसा है तो यह बहुत ही गंभीर बात है क्योंकि भाजपा ने हिंदुत्व के संकल्प को पूरा करने की गरज से अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भी शुरू करवा दिया , कश्मीर से धारा 370 भी हटा दी गई , इसके बाद भी हिन्दू और ब्राहमण वोट उससे नाराज है तो यह गंभीर और विचारणीय मुद्दा तो है ही। प्रसंगवश इससे भी बड़ा , गंभीर और विचारणीय मुद्दा यह है कि भाजपा को उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में अपनी मजबूती का आधार कांग्रेस के उस उपेक्षित नेता में दिखाई दिया जिसे हिंदुत्व और ब्राह्मणत्व  दोनों का ही कोई ज्ञान नहीं है। 
अवसरवादी , सिद्धांत और विचार विहीन राजनीति में राजनीतिक दलों से नेताओं का आना जाना , अदला – बदली और आया राम , गया राम का यह दौर भारतीय राजनीति में नया नहीं है और न ही यह पहली बार ही हुआ है। इससे पहले भी ऐसा होता आया है और आगे भी ऐसा होता रहेगा। लिहाजा एक जितिन के कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में जाने की घटना में किसी तरह का आश्चर्य ढूँढने की भी कोई जरूरत नहीं है।  कांग्रेस भी जब तक सिद्धांत और विचार की राजनीति करती रही उसमें नेताओं के आवागमन का सिलसिला ऐसा नहीं था। आज भी विचार और सिद्धांत से जुड़े कांग्रेस के नेता जीवन पर्यंत पार्टी से जुड़े रहते चाहे उन्हें विधायकी या सांसदी का टिकट मिले या न मिले। वो मंत्री , राज्यपाल , सलाहकार न भी बने तब भी पार्टी के लिए समर्पित रहते हैं। कांग्रेस ही नहीं संघ और हिंदुत्व की विचारधारा  के प्रति इमानदारी से जुड़े हुए पूर्व हिन्दू महासभा , भारतीय जनसंघ और अब भारतीय जनता पार्टी से जुड़े वैचारिक नेता भी इस तरह पार्टियों की अदला बदली नहीं करते वैचारिक धरातल पर राजनीति करने वाले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी , भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी , फॉरवर्ड ब्लाक और क्रांतिकारी सोशलिस्ट पार्टी ( आरएसपी ) जैसे राजनीतिक दलों के सदस्य भी कभी वैचारिकता के साथ समझौता नहीं करते।
अब जैसे – जैसे राजनीति में विचार और सैद्धान्तिकता का ह्रास हो रहा है अदल – बदली और आया राम , गया राम का यह दौर बढ़ता ही जा रहा है। कांग्रेस में आजादी बाद तीन दशक तक तो पार्टी छोड़ कर जाने का यह सिलसिला इतना तेज नहीं हुआ था लेकिन 1977 के लोक सभा चुनाव में पार्टी के पहली बार  बुरी तरह हारने के बाद यह सिलसिला अचानक बड़ी तेजी से शुरू हुआ था।
इसके बाद तो हर ऐसे मौके पर जब पार्टी चुनाव हार रही हो या फिर हारने की संभावनाएं  बन रही हों तब इस तरह की भाग दौड़ काफी तेज हो जाती है। 1977 के बाद 1996 में भी ऐसा ही हुआ था। इससे पहले 1989 में भी कांग्रेस में भगदड़ मची थी। 1996 के बाद 2014 से यह सिलसिला लगातार जारी है। जितिन से पहले माधव राव सिंधिया के बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी कांग्रेस छोड़ कर भाजपा का दामन थाम लिया था। ज्योतिरादित्य को इसका इनाम भी मिला और लोकसभा का चुनाव हारने के बावजूद पिछले दरवाजे उनको संसद के दूसरे सदन राज्य सभा का सदस्य बनाया गया। जितिन अभी न सांसद हैं न विधायक। पद के बिना राजनीति करने की उनकी आदत भी अब नहीं रह गई है लिहाजा कुछ तो पाना ही है इसी उम्मीद में भाजपा का दामन थामना किसी सिद्धांत विहीन और विचार विहीन नेता के लिए कभी भी घाटे का सौदा नहीं रहा। याद हो कि नब्बे के दशक के बाद कांग्रेस की राजनीतिक चेतना में बहुत बड़ा बुनियादी बदलाव आया था।
इसी बदली कांग्रेस चेतना का ही परिणाम था कि जब 1991 में चुनाव प्रचार के दौरान तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गाँधी की हत्या के बाद पीवी नरसिंह राव कांग्रेस अध्यक्ष और उसके बाद पार्टी के सत्ता में आने पर देश के प्रधान मंत्री बनाए गए थे तब भी कई पार्टी नेताओं ने विरोध स्वरुप पार्टी छोड़ दी थी।
 बाद के दौर में अलग – अलग कारणों से ही सही अर्जुन सिंह , नारायण दत्त तिवारी , माधव राव सिंधिया , दिलीप सिंह भूरिया , असलम शेर खान ,  पी रंगराजन कुमारमंगलम,  अरविन्द नेताम , कमलनाथ , विद्याचारण शुक्ल और  शीला दीक्षित समेत असंख्य नेता कांग्रेस छोड़ कर दूसरी पार्टियों में शामिल होते रहे हैं या फिर इन नेताओं ने कांग्रेस स्व अलग होकर अपनी ही कोई पार्टी खड़ी कर ली लेकिन अपने निहित स्वार्थों के लिए पार्टी का दामन छोड़ने से संकोच नहीं किया था। बाद में इनमें से ज्यादातर नेता कांग्रेस में वापस भी आए और केन्द्रीय मंत्री से लेकर मुख्य मंत्री , राज्य पाल , समेत तमाम पदों का भरपूर दोहन भी किया था। अतीत में पूर्व प्रधान मंत्री  चंद्रशेखर  से लेकर मोरारजी देसाई  , एस बी चव्हान , बाबू जगजीवन राम , के कामराज , बीजू पटनायक , चौधरी चरण सिंह , हेमवती नंदान बहुगुणा , शरद पवार , ममता बनर्जी , वाई . एस राजशेखर रेड्डी के पुत्र जगन मोहन रेड्डी , जी के मूपनार . पी चिदंबरम जैसे अनेक नेता भी समय – समय पर अपनी जरूरतों के लिए कांग्रेस से अलग होते रहे हैं। इनमें ज्यादातर लोगों ने आज एक संस्था के रूप में अपनी एक अलग पहचान भी बनाई है लेकिन ऐसे नेताओं में कुछ ऐसे भी हैं जिनको कांग्रेस से हटने के पांच – दस साल बाद ही कोई नहीं पहचानता। आने वाले समय में जितिन भी ऐसे ही पूर्व कांग्रेस नेताओं की जमातमें शामिल  हो जाएँगे  जिनको कोई ढूंढ कर भी पहचान नहीं पायेगा। दूसरे तरफ कांग्रेस से निकल कर अपनी पहचान बना कर रखने वाले ममता बनर्जी , शरद पवार और बीजू  पटनायकके मुख्य मंत्री बेटे नवीन पटनायक कुछ ऐसे पटनायक हैं जिनको समय अपने हिसाब से याद जरूर रखेगा ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *