हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण मनाया जाता है , इसकी आहट के साथ ही पेड़ लगाओ, पानी बचाओं के शोर के साथ नये उपाय और तरीके बताये जाने शुरू हो जाते है, महंगे कार्यक्रम और आयोजन के बीच वातानुकूलित कमरों में अपनी बात रख कर इतिश्री कर ली जाती थीं। आजकल कोरोना के कारण सारे कार्यक्रम बंद है पर कहने का मतलब ये है कि क्यों सिर्फ एक दिन ऐसे शुभ काम के लिए। अभी अप्रैल से मई तक पूरे देश में ऑक्सीजन के बिना लाखों मौत हुई है, अगर हमनें अपने प्राकृतिक संसाधनों पर काम किया होता तो हालात कुछ और होते, मेडिकल साइंस में जिस ऑक्सीजन की जरूरत होती है वो प्राकृतिक रूप से अलग है, पर जो स्वस्थ्य है जिन्हें कोई बीमारी नहीं उनके लिए तो ये प्राकृतिक शुद्ध वायु की जरूरत होती है। हर साल करोड़ों पेड़ लगाने का अभियान चलाया जाता था, पर असल में अगर वाकई इतने पेड़ लगे होते तो स्थिति इतनी ख़तरनाक नहीं होती।
आज पूरे देश में प्राकृतिक संसाधनों की कमी और परेशानियों को अखबार और रिपोर्ट रेखांकित करते रहे है, पर असल में बुनियादी समस्याओं पर किसी ने काम करने की जहमत नहीं उठाई है। समस्या की मूल जड़ में जाने के लिए हमें पहले साक्षरता की परिभाषा को समझना जरूरी है। हमारे देश में साक्षर होने के मतलब को सीमित दायरे में कैद करके केवल अक्षर ज्ञान या किताबें पढ़ लेने भर तक ही सिमित कर लिया गया है, उसमें कहीं भी हमारी प्राचीन सभ्यता से मिले ज्ञान और व्यवहारिक प्रयोगों की , लोक कलाओं की जगह नहीं रखी गई हैं बल्कि चर्चा तक नहीं है।
आज समाज में पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है, सरकारों को कोस रहे है स्वयंसेवी संस्थाओं को मुँह उठाकर देख रहे है पर अपने घर के बुजुर्गों की सलाह को सिर्फ इसलिए खारिज़ कर रहे है कि वो साक्षरता की बनी गई कसौटी पर खरे नही उतरते तो उनकी बातों का क्या मानना। यही गलती पिछले 30 सालों में अपनी आदतों में शुमार करने का नतीजा आज सूखा और भयानक पर्यावरण का असंतुलन के रूप में सामने सुरसा के रूप में आपके दरवाजे खड़ा है। आप साक्षरता में पानी की बात का उदाहरण देखें तो बात साफ है कि पढ़े–लिखे समाज से ज्यादा पानी की तकनीकें, समझ आधारभूत ज्ञान, जागरुकता और अनुभव समाज के उस तबके के पास है। इस कमी का फायदा उठाकर अंतराष्ट्रीय गिद्धों का झुंड पानी को व्यापार बनाने पर आमादा है।
हमारे देश मे पीढ़ियों से हमारे गाँवों की प्यास बुझाते कुएँ–कुण्डियाँ। नदियों का जाल और उनके किनारे की समृद्धि। हजारों कुएँ–कुण्डियाँ, चौपड़े, बावलियाँ, नहरें, छोटे–छोटे बाँध रचे गये थे। करीब सात सौ साल पहले राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और दिल्ली में कुछ बेमिसाल बावड़ियाँ बनाई गईं, जिन्हें आज देखने पर ही हमें ताज्जुब लगता है। 400 साल पहले अकबर के जमाने का बुरहानपुर में खुनी भण्डारा एशिया में अपनी तरह की अनूठी जल संरचना रही है। जिन्हें लालच में पाट कर समतल कर दिया गया या फिर उपेक्षा का शिकार हो गया लोगों की उदासीनता का जिसका जिक्र पहले किया गया है।
अपनी आदतों में हम थोड़ा बदलाव ले आये तो स्थिति अभी भी संभाली जा सकती है , जितना पानी आवश्यक हो उतना हो नल से इतेमाल में लिया जाये। एक बार इस्तेमाल में लिए गए पानी को बार -बार साफ सफाई , पौधों को पानी पिलाने में किया जा सकता है। छोटे बच्चों को पानी की महत्वता बता कर पानी के दुरुपयोग को कम किया जा सकता है, कई लीटर पानी से गाड़ियां धोने की जगह गीले कपड़ें इतेमाल में लाकर पानी की बर्बादी पर लगाम कसी जा सकती है। इससे सिर्फ पानी नहीं बचेगा बल्कि प्राकृतिक संसाधनों का दुरूपयोग भी रुकेगा क्योंकि ये ऐसा बैंक बन चुका है जहाँ से हम अपने हिसाब से संसाधन खर्च कर रहे है पर उसमें कुछ डिपाजिट नहीं कर रहे।
सारी समस्याओं की जड़ साक्षरता के साथ साथ एक दूसरे से जुड़ी है, पढ़े लिखें लोगों के घर की पानी की टंकियां ओवरफ्लो होती रहती है पर वही दूसरे तरफ एक किसान और गाँव का व्यक्ति एक एक बूंद को सहेजने के लिए कोशिशों में लगा रहता है। सरकारी योजनाओं और नियम बनाने वाले लोगों को इस पर भी गंभीरता से सोचना चाहिए।
पेड़ लगाने के साथ लोगों को उसे बचाने के लिए जागरूक किया जाना जरूरी है। संसाधनों के लिए पानी के लिए साक्षर किया जाना जरूरी है। सालों से संग्रहित पानी भी अब खत्म होने की कगार पर है। अभी भी नहीं चेते तो वाकई में मानवता को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। 5 जून को पूरे साल मनाये तभी सुरक्षित रह पाएंगे। सरकार अंधाधुंध तरीके से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने पर आमादा है क्योंकि कॉरपोरेट हावी है सरकारों पर।
