ज्ञानेन्द्र पाण्डेय: अहंकार किसी का हो , व्यक्ति का या संस्था का और किसी भी तरह का क्यों न हो कभी टिकाऊ नहीं होता। एक न एक दिन तो अहंकार टूटता ही है । बुधवार 17 फरवरी 2021 की दो घटनाएं अहंकार टूटने के मामले में सही साबित होती हैं। ये दोनों घटनाएं व्यक्ति और संस्थागत दोनों ही तरह के अहंकार टूटने का स्पष्ट संकेत देती हैं। एक घटना जहां पूर्व केन्द्रीय मंत्री और एक जमाने के वरिष्ठ पत्रकार एम. जे अकबर का अहंकार टूटने की तरफ इशारा करती है तो दूसरी घटना से केंद्र और देश के अनेक राज्यों में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय पार्टी का अहंकार टूटता साफ़ दिखाई देता है। गौरतलब है कि एक तरफ देश की राजधानी दिल्ली की एक अदालत ने अपने एक फैसले में प्रिय रमानी को मानहानि के मुक़दमे से बरी किया है तो दूसरी तरफ पंजाब के स्थानीय चुनाव में किसान आन्दोलन के खिलाफ दिखाई देने वाली राजनीतिक पार्टियों को जनता ने धुल चटाई है।
सब जानते हैं कि पूर्व केन्द्रीय मंत्री एम् जे अकबर पर महिला पत्रकार प्रिय रमानी ने यौन शोषण का आरोप लगाया था जिसके चलते उनको मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। एम् जे अकबर ने इन आरोपों का खंडन करते हुए दिल्ली की एक अदालत में प्रिय रमानी पर मानहानि का मुकदमा दायर किया था। उस अदालत ने प्रिय रमानी को आरोप मुक्त करने का फैसला सुनाया है। उधर दिल्ली के तीन बॉर्डर पर पिछ्ले ढाई माह से आन्दोलन कर रहे किसानों ने न्याय न मिलने से नाराज होकर पंजाब के मतदाताओं ने स्थानीय निकायों के चुनाव में भाजपा और अकाली दल के उम्मीदवारों को बुरी तरह पराजित कर अपना फैसला सुनाया है।
ये दोनों घटनाएं यह सन्देश देने के लिए काफी हैं कि जिस तरह पूर्व केन्द्रीय मंत्री को बड़ा आदमी होने का अहंकार था उसी तरह केंद्र और देश के अनेक राज्यों में सत्तारूढ़ पार्टी भी किसान मसले पर अहंकार के भाव से ग्रसित दिखाई दे रही थी। दिल्ली की अदालत और पंजाब की जनता के फैसले ने दोनों ही तरह के अहंकार एक ही झटके में चकनाचूर कर दिए हैं।
एमजे अकबर बनाम प्रिय रमानी के मामले को तफसील से समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि साल 2018 में प्रिय रमानी ने ” मी टू ” अभियान के तहत जे अकबर के खिलाफ यौन उत्पीडन का आरोप लगाया था जिसके जवाब में अकबर ने प्रिया रमानी के खिलाफ 15 अक्टूबर 2018 को दिल्ली के अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेटरविन्द्र कुमार की अदालत में शिकायत दर्ज की थी।
इस मामले में दोनों पक्षों के वकीलों की जिरह सुनने के बाद मजिस्ट्रेट ने अपना फैसला 10 फरवरी तक के लिए सुरक्षित रखा दिया था। 10 फरवरी को अदालत ने यह कहते हुए यह फैसला 17 फरवरी के लिए टाल दिया था क्योंकि मजिस्ट्रेट ने दोनों ही तरफ से लिखित कॉपी मिलने में विलम्ब होने के कारण अदालत समय से फैसला नहीं लिख सकी थी। बहरहाल विलम्ब से दिए गए अपने फैसले में प्रिय रमानी को मानहानि के आरोप से मुक्त करते हुए अदालत ने साफ़ कहा है कि हमारे समाज को यह समझने में समय लगता है कि कभी-कभी पीड़ित व्यक्ति मानसिक आघात के कारण वर्षों तक नहीं बोल पाता। महिला को यौन शोषण के खिलाफ आवाज उठाने के लिए दंडित नहीं किया जा सकता। यही नहीं , इस मामले में अदालत का यह भी साफ़ मानना है कि महिला अक्सर सामाजिक दबाव में शिकायत नहीं कर पाती. समाज को अपने पीड़ितों पर यौन शोषण और उत्पीड़न के प्रभाव को समझना चाहिए।
सोशल स्टेट्स का व्यक्ति भी यौन उत्पीड़न कर सकता है। इस बारे में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि यौन शोषण महिला को गरिमा और आत्मविश्वास से भी दूर ले जाता है इसलिए प्रतिष्ठा के अधिकार को गरिमा के अधिकार की कीमत पर संरक्षित नहीं किया जा सकता, लिहाजा ऐसी किसी भी महिला को दशकों बाद भी मानहानि का मामला बता कर शिकायत करने से नहीं रोका जा सकता है। कि यौन शोषण गरिमा और आत्मविश्वाससे दूर ले जाता है और इस आधार पर उसे मानहानि का दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।
उधर , पंजाब स्थानीय निकाय चुनाव के परिणाम की बात करें तो कह सकते हैं कि किसानों की नाराजगी ने राज्य से अकाली दल का सफाया ही कर दिया और किसी जमाने में अकाली दल की सहयोगी रही भाजपा को पैर जमाने की कोई ठौर ही नहीं मिल सकी।
पंजाब में सरकार बनाने का सपना देख रही
आम आदमी पार्टी को इज्जत बचाना भारी पड़ गया , जबकि इस परिस्थिति का फायदा उठाते हुए कांग्रेस ने अपना परचम फहरा दिया। बुरे वक़्त में किसानों का साथ देने का इस पार्टी को एक लाभ यह भी मिला कि उसने भटिंडा में पांच दशक पुराना रिकॉर्ड भी तोड़ दिया।पंजाब में हाल ही में हुए 8 नगर निगम ,109 नगरपालिका परिषद् और नगर पंचायतों के 302 वार्डों के लिए हुए चुनाव के नतीजे तो यही संकेत दे रहे हैं कि किसान आन्दोलन की अनदेखी कई राजनीतिक दलों को महंगी साबित हुई है। किसानों के साथ रहने का कांग्रेस को इन चुनावों में जो लाभ मिला है उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पंजाब की गुरुदासपुर लोकसभा सीट से स्थानीय जनता ने पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के जिस सांसद सनी देयोल को भारी मतों से विजयी बनाया था उसी संसदीय सीट के अंतर्गत आने वाली स्थानीय निकाय की 29 सीट कांग्रेस के खाते में गयी हैं।
इस क्षेत्र से भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली है।
इस क्षेत्र से कांग्रेस ने 29 उम्मीदवार खड़े-खड़े किये थे और सभी जीत भी गए हैं जबकि अकाली दल ने 27 और आम आदमी पार्टी ने 27 उम्मीदवार खड़े किये थे। इन दोनों ही पार्टियों को इस इलाके की एक भी सीट जीतने में सफलता नहीं मिली। इससे ऐसा लगता है कि किसान समस्या के सन्दर्भ में यहाँ के मतदाताओं ने केवल कांग्रेस पर ही भरोसा किया है और सभी दलों को खारिज कर दिया है। इसके अलावा भी राज्य की ज्यादातर नगरपालिकाओं में भी कांग्रेस ने जीत दर्ज की है। राज्य की सिर्फ मोगा नगरपालिका ऐसी है जहां कांग्रेस को अकाली दल ने टक्कर दी है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और तक्षकपोस्ट के
Counsulting Editor है।)
