विगत शुक्रवार 24 सितम्बर 2021को दोपहर के वक़्त देश की राजधानी दिल्ली के उत्तर – पश्चिमी इलाके में स्थित रोहिणी अदालत परिसर में कोर्ट रूम के अन्दर हुई गोलीबारी की घटना ने न्यायिक सेवा से जुड़े न्यायविदों, अधिवक्ताओं और न्यायिक कर्मियों के साथ ही सामान्य जनता के मन में भी दहशत का माहौल बना दिया है। इस हादसे में वकील के भेष में आये दो हमलावरों ने पेशी पर लाए गए जेल में बंद एक आरोपी को गोली मार कर अदालत के अन्दर ही ढेर कर दिया था।
जबाबी कार्रवाई में सुरक्षाबलों ने भी दोनों हमलावरों को भी वहीं मौत के घाट उतार दिया था। इस दो तरफा गोलीबारी की घटना में कुल तीन लोगों की मौत के साथ ही पांच अन्य लोग घायल भी हो गए थे। इस घटना का यहाँ उल्लेख करने का मतलब घटना के विस्तार में जाना कतई नहीं है बल्कि इस घटना का को केंद्र में रखते हुए अदालती परिसरों में आये दिन होने वाली ऐसी घटनाओं की प्रवृत्तियों पर गहन विचार विमर्श करना है।
कई दशक पहले तक अदालत परिसरों में गैंगवार के तहत होने वाली गोलीबारी की घटनाओं को केवल मुम्बईया फिल्मों के स्क्रीन पर ही देखा जाता था पर अब ऐसी घटनाएं आम हो गई हैं। इस सदी के डेढ़ दशक के बाद के विगत 5- 6 साल की ऐसी घटनाओं पर नजर दौडाएं तो एक दशक में कमसे कम दस के औसत से इसी अवधि में एक बार दो बार नहीं बल्कि कम से कम पचास बार ऐसी घटनाओं को होते देखा गया है। मामला गंभीर और चिंताजनक है। यह मामला कितना गंभीर और चिंताजनक है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की भारत की सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एनवी रमण ने इस घटना के कुछ ही घंटे के बाद इस घटनाक्रम पर चिंता व्यक्त करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से यह सुनिश्चित करने को कहा कि राजधानी दिल्ली की अदालतों में इस तरह की घटनाएं न हों और इस तरह की किसी घटना की वजह से अदालत का काम बाधित न हो। इस घटना को लेकर चिंता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि गोली चलाने वाले दोनों शार्प शूटर वकील के लिबास में थे और हथियार के साथ कोर्ट परिसर में ही नहीं अदालत कक्ष में भी दाखिल हो गए।
यह कैसा सुरक्षा तंत्र है? सवाल यह भी है की इसमें किसकी मिलीभगत है ? अब ऐसी घटनाएं आम हो गई हैं। जब सुरक्षा इंतजामों की दृष्टि से सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली देश की राजधानी दिल्ली की अदालतों में ऐसी घटनाएं हो सकती हैं तब देश के बिहार , मध्य प्रदेश , उत्तर प्रदेश , राजस्थान और उत्तर पूर्व के ऐसे राज्य जो अपराध की गतिविधियों के हिसाब से सुर्ख़ियों में रहते हैं वहाँ क्या हाल होगा, आसानी से समझा जा सकता है। 24 दिसंबर की इस ताजा घटना के संदर्भ में जब हम अतीत में इस तरह की घटनाओं के पन्ने पलटने की कोशिश करते हैं तब हमको पता चलता कि साल 2017 के मार्च महीने से लेकर जनवरी 2018 के बीच की 11 महीने की अवधि के दौरान देश की अदालतों में गोलीबारी की ऐसी एक दर्जन से अधिक घटनाएं हुईं। कहने का मतलब यह है कि औसतन ऐसी एक घटना एक महीने में हो ही जाती है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक 28 मार्च 2017 को हरियाणा के रोहतक की एक अदालत में महिलाओं के भेष में आए हमलावरों ने गोली बारी की घटना में पेशी में अदालत लाये गए कैदियों को निशाने पर लिया था जिसमें 6 कैदी मारे गए थे और सात अन्य लोग घायल हो गए थे। इसी तरह 29 अप्रैल 2017 को रोहिणी के ही अदालत परिसर में द्वार संख्या – 5 के बाहर हुए शूट आउट में पेशी में अदालत लाये एक आरोपी की मौत हो गई थी। इसी तरह 18 मई 2017 को हरियाणा के ही भिवानी कोर्ट परिसर में हुए गोलीकांड में पेशी पर लाए गए कैदियों को निशाने पर लेकर ढेर कर दिया गया था। इसी साल 30 मई को हरियाणा के ही करनाल शहर की एक अदालत में न्यायाधीश जे . एस . बधवा की अदालत में पेशी के लिए लाये गए एक खूंखार अपराधी को गोलियों का निशाना बनाया गया था।
इस हादसे में दो लोग बुरी तरह घायल हुए थे। इसके साथ ही 4 अगस्त 2017 को छिंदवाड़ा ( मध्य प्रदेश ) की अदालत में जेल में बंद आरोपी की हत्या कर दी गई थी। एक ऐसे ही घटनाक्रम में आज से चार साल पहले 8 सितम्बर 2017 को महेंद्र गढ़ की एक अदालत से बदमाशों ने अंधाधुंध फायरिंग कर एक कैदी को पोलिस के कब्जे से छुड़ा लिया था और पैदल ही लेकर चले गए थे।
8 सितम्बर 2017 को ही बिहार की राजधानी पटना के सबसे सुरक्षित समझे जाने वाले बाढ़ न्यायालय परिसर में कैदियों को पेशी पर ले जाए जाने के दौरान बंदूक के निशाने पर लिया गया। इस हादसे में गुड्डू सिंह नामक एक आरोपी की मौत हो गई थी और कई घायल हो गए थे। उसी साल 12 अक्टूबर 2017 को मध्य प्रदेश के बड़वानी अदालत परिसर में दो हत्यारोपियों को गोलियों का निशाना बनाया गया था। इस हादसे में भी कई लोग घायल हो गए थे। इसी साल एक महीने के बाद 13 नवम्बर को दिल्ली की रोहिणी अदालत में ऐसा ही एक हादसा हुआ था जिसमें पेशी पर लाए गए कैदी की मौत के साथ ही कई अन्य लोग घायल भी हुए थे।
इस घटना के एक सप्ताह बाद ही 20 नवम्बर को उत्तराखंड के हरिद्वार जिले के रूड़की स्थित अपर जिला मजिस्ट्रेट की अदालत में पेशी के लिए लाये गए गैंगस्टर देवपाल राणा की अदालत परिसर में ही गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। इसी तरह 16 दिसम्बर 2017 को राजस्थान के बूंदी स्थित जिला मजिस्ट्रेट न्यायालय परिसर में बैरक में बंद कैदी की उस समय गोली मारकर हत्या कर दी गई थी जब उसे दोपहर के वक़्त पेशी के लिए अदालत काक्ष ले जाया जा रहा था। इस घटना के कुछ ही दिनों बाद 17 जनवरी 2018 को राजस्थान के ही चुरू जिला स्थित सादुलपुर न्यायालय परिसर में भी हथियार लोगों ने हिस्ट्रीशीटर अजय जैतपुरा की हत्या कर दी थी। ये कुछ घटनाएं हैं जो यह बताती हैं कि हमारे देश में अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि वो अदालत जैसे सर्वाधिक सुरक्षित स्थानों में भी गोली चलाने जैसी वारदात को अंजाम देने से डरते नहीं हैं। माना कि ये घटनाएं आपसी गैंगवार का नतीजा हैं लेकिन इन घटनाओं के चलते न्यायाधीशों और इस प्रक्रिया से जुड़े अन्य लोगों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है। इस लिहाज से इस मुद्दे पर गंभीरता से चिंतन करने की जरूरत हो गई है।
