ज्ञानेन्द्र पाण्डेय: तमिलनाडु संभवतः देश का पहला ऐसा राज्य है जिसने चुनाव में तोहफा संस्कृति की शुरुआत की है। इस संस्कृति के तहत राजनीतिक पार्टियां अपने चुनाव घोषणा पत्र में मतदाताओं को चुनाव जीतने और सरकार बनाने पर लेपटॉप, सिलाई मशीन , साइकिल , स्कूल बैग ,या ऐसी ही कोई ख़ास चीज जनता को देने का वादा करती हैं और यह वादा चुनाव बाद बाकायदा निभाया भी जाता है। तमिलनाडु चुनाव में तोहफा संस्कृति का प्रवेश करीब 6 दशक पहले हो चुका था बाद के दौर में तो उत्तर भारत में भी इस सिलसिले का चलन शुरू हो गया था। इसी तोहफा संस्कृति के तहत ही एक बार समाजवादी पार्टी ने स्कूल – कॉलेज के बच्चों को लेपटॉप देने का वादा किया था और चुनाव बाद सरकार बनाने पर उसे पूरा भी किया। इसी तरह एक बार इसी पार्टी ने चुनाव में लड़कियों को साइकिल देने का वादा भी किया था। तमिलनाडु में तोहफा संकृति की शुरुआत 1960 में ही तब हो चुकी थी जब कांग्रेस से के .कामराज इस राज्य के मुख्य मंत्री थे। कामराज ने चुनाव से पहले स्कूली बच्चों को मुफ्त में मिड डे मील का तोहफा देने का वादा किया था। इसी कड़ी में अन्नादुरै ने 1967 में 1 रुपये में डेढ़ किलो चावल देने का तोहफा मतदाताओं को दिया था। बाद के दौर में द्रमुक नेता एम . करूणानिधि , अन्ना द्रमुक नेता एमजी रामचंद्रन और उनके उत्तराधिकारी भी इसी तोहफा संस्कृति को आगे बढ़ाते रहे। इसी सिलसिले में एम जी रामचंद्रन ने सत्तर के दशक में मद्रास के जल संकट के दौरान मतदाताओं को प्लास्टिक के कैन उपहार में देने की घोषणा की थी। 1996 के बाद से तो इस राज्य में चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा मतदाताओं को तोहफे देने की घोषणा करने का यह सिलसिला अपने चरम पर आ गया है। राज्य के दो पूर्व मुख्य मंत्री द्रमुक नेता स्वर्गीय एम करुना निधि और उनकी धुर विरोधी अन्नाद्रमुक नेता स्वर्गीय जे जयललिता के सौजन्य से मतदाताओं को गिफ्ट देने की परंपरा इतनी तेजी से पुष्पित और पल्लवित हुई कि एक अनुमान के मुताबिक़ चुनाव पूर्व किये गए वादों को पूरा करने में ही सालाना बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च किया जाता रहा है , उदहारण के लिए 2019 के लगभग 2 लाख करोड़ रुपये के सालाना बजट में तोहफों की मद में ही 75 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का ही प्रावधान किया गया था।
तमिलनाडु विधान सभा के चुनाव इससे पांच साल पहले 2015 में हुए थे। इन पांच साल में तमिलनाडु की राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव आया है। सबसे बड़ा बदलाव यही है कि इस चुनाव में राज्य की दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियों द्रमुक और अन्ना द्रमुक को अपने दो दिग्गज नेताओं – एम करूणानिधि और जे . जयललिता की अनुपस्थिति में ही चुनाव लड़ना पड़ रहा है। इन दोनों नेताओं का निधन हो जाने के कारण द्रमुक की कमान स्टालिन के हाथ में है तो अन्नाद्रमुक की कमान अपेक्षा कृत नए नेताओं के हाथों में है। द्रमुक के साथ कांग्रेस गठबंधन में है तो केंद्र और देश के आधे से ज्यादा राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही है।
द्रमुक , अन्ना द्रमुक और कांग्रेस के लिए तो इस चुनाव में परिस्थितियाँ कमोबेस पहले जैसी ही हैं लेकिन भाजपा इस बार इस हेसियत में जरूर आना चाहती है कि अगर चुनाव के बाद अन्नाद्रमुक के नेतृत्व वाला गठबंधन सरकार बनाने की स्थिति में आये तो विधान सभा में उसके सदस्य जरूर हों कि राज्य मंत्रिमंडल में भाजपा सदस्यों का कमसे कम 40 प्रतिशत प्रतिनिधित्व तो हो ही और महत्वपूर्ण मंत्रालयों और विभागों की जिम्मेदारी भी भाजपा के मंत्रियों को मिले। इसी पृष्ठभूमि में जब हम इस चुनाव को लेकर तोहफों की राजनीति पर बात करते हैं तो हमें पता चलता है कि यह सिलसिला आज भी किस रूप में जिन्दा है। अन्नाद्रमुक ने राज्य विधान सभा के चुनाव की घोषणा से ठीक पहले राज्य के अंतरिम बजट में गोल्ड लोन और कृषि कर्ज माफी के जिन प्रावधानों की घोषणा की थी वो भी एक तरह से मतदाताओं को तोहफा देना ही माना जाएगा। इसी तरह अन्नाद्रमुक की धुर विरोधी द्रमुक पार्टी ने 2019 में संपन्न सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव में गोल्ड लोन माफी का मुद्दा उठा कर निश्चित रूप से राजनीतिक फायदा उठाया था। अब देखना यह है कि गोल्ड लोन माफी का इस चुनाव में भी द्रमुक को कोई फायदा मिलता है या फी इस मुद्दे को अपनी सरकार के अंतरिम बजट का हिस्सा बना कर सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक ने अपनी बढ़त बना ली है। मतदाता किसे भाव देते हैं इसका पता चुनाव परिणाम आने के बाद ही चलेगा लेकिन तय बात यह है कि इस बार चुनाव काफी दिलचस्प हो गया है। दिलचस्प इसलिए क्योंकि जब गोल्ड लोन माफी का मुद्दा हाथ से निकल गया तो द्रमुक नेता स्टालिन ने हर गृहणी को हर महीने एक हजार रुपये सरकारी खजाने से देने की घोषणा कर दी है ,
तमिलनाडु में चुनावी तोहफा संस्कृति आज कितने चरम पर है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लोकसभा के चुनाव में राज्य के मुख्य विपक्षी दल द्रमुक ने गोल्ड लोन की माफी का मुद्दा तो उठाया लेकिन इस मुद्दे का लाभ वो मतदाताओं को नहीं सके क्योंकि लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में भाजपा नेतृत्व वाले जिस राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनी उस गठबंधन का वो हिस्सा नहीं थे। उनकी पार्टी तमिलनाडु में भी सरकार में नहीं थी इसलिए द्रमुक गोल्ड लोन माफी के मुद्दे को कहीं भी लागू नहीं कर सका जबकि राज्य की अन्नाद्रमुक गठबंधन सरकार ने विधान सभा चुनाव में इसका फायदा लेने की गरज से इसे अंतरिम बजट का हिस्सा बना दिया। जब द्रमुक को लगा कि यह मुद्दा उसके हाथ से निकल गया है तो उसने हर गृहणी को हर महीने एक हजार रुपये सरकारी खजाने से दिलवाने की घोषणा कर दी। अब अगर द्रमुक की सरकार बनी तो उसकी सरकार 60 के दशक की कामराज सरकार की फ्री मिड डे मील गिफ्ट योजना की तरह महिलाओं को हर महीने हजार रुपये देने की योजना लागू भी कर सकती है। इस राज्य में चुनाव के दौरान एक पार्टी द्वारा की गई गिफ्ट की घोषणाएं प्रतिद्वंदी पार्टियों को इतना विचलित कर देती हैं कि उन्हें भी अपनी साख बचाने के लिए कुछ वैसे ही घोषणाएं करनी पड़ती हैं। ऐसा ही कुछ इस बार भी हुआ, जब द्रमुक ने महिलाओं को हर महीने एक हजार रुपये देने की घोषणा का दी तो जवाब में सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक के नेता और राज्य के मुख्य मंत्री पलानी स्वामी ने यह कहने से भी संकोच नहीं किया कि द्रमुक नेता स्टालिन ने इस मामले में अन्नाद्रमुक के घोषणा पत्र की नक़ल की है ।
उनके घोषणा पत्र में कुछ भी नया नहीं है जबकि उनकी अन्नाद्रमुक पार्टी इस मामले में पिछले करीब एक पखवाड़े से काम कर रही थी इसलिए द्रमुक को जवाब देने की गरज से अन्नाद्रमुक ने अब हर राशन कार्ड धारक गृहणी को डेढ़ हजार रुपया हर महीने देने के साथ ही साल में 6 गैस सिलिंडर निशुल्क देने का एलान भी कर दिया। तमिलनाडु की राजनीति में इसे घोषणा पत्र कहें कि तोहफा पत्र कि अन्नाद्रमुक और द्रमुक के बीच मतदाताओं को लुभाने का यह सिलसिला कभी थमता ही नहीं। इसी दौरान द्रमुक ने चुनाव जीतने के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमसे कम पांच रुपये प्रति लीटर की कमी करने का एलान करने के साथ ही अनन्याः एलान भी कर दिया कि यदि चुनाव के बाद राज्य में द्रमुक की सरकार बनी तो प्रति सिलिंडर सौ रुपये की सब्सिडी सरकार की तरफ से दी जायेगी। इसी बीच राज्य की इन दोनों पार्टियों के बीच आरोप – प्रत्यारोप का सिलसिला बढ़ता हुआ देख कर चुनाव में कूदे फिल्म अभिनेता कमल हासन ने दोनों ही पार्टियों को यह कहते हुए कटघरे में खड़ा कर दिया कि ये दोनों पार्टियां उनके घोषणा पत्र की नक़ल कर रही हैं और किसी का भी घोषणा पत्र असली और अपना नहीं है ।
