तीन नए आपराधिक कानून – भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम – सोमवार को पूरे देश में लागू हो गए। ये कानून क्रमशः औपनिवेशिक युग के भारतीय दंड संहिता, आपराधिक प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह लेंगे। नए आपराधिक कानूनों के तहत पहली एफआईआर (प्रथम सूचना रिपोर्ट) सोमवार को दिल्ली के कमला मार्केट पुलिस स्टेशन में एक स्ट्रीट वेंडर के खिलाफ दर्ज की गई। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर फुटओवर ब्रिज में बाधा डालने के आरोप में भारतीय न्याय संहिता की धारा 285 के तहत मामला दर्ज किया गया।
कानूनों के लागू होने से पहले, राष्ट्रीय राजधानी में विभिन्न स्थानों, विशेषकर पुलिस स्टेशनों पर लोगों को नए कानूनों के बारे में शिक्षित करने वाले पोस्टर लगाए गए। नए कानूनों के बारे में जानकारी देने वाले कुछ पोस्टर कनॉट प्लेस, तुगलक रोड, तुगलकाबाद और कई अन्य पुलिस स्टेशनों पर देखे गए। पोस्टरों में कानूनों के बारे में जानकारी दी गई थी और बताया गया था कि वे क्या बदलाव लाएंगे।
नए आपराधिक कानून भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में व्यापक बदलाव लाएंगे और औपनिवेशिक युग के कानूनों को समाप्त करेंगे।
भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम क्रमशः ब्रिटिश-युग की भारतीय दंड संहिता, आपराधिक प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह लेंगे।
भारतीय न्याय संहिता-
भारतीय न्याय संहिता में 358 धाराएं हैं (आईपीसी की 511 धाराओं के मुकाबले)। संहिता में कुल 20 नए अपराध जोड़े गए हैं और 33 अपराधों के लिए कारावास की सजा बढ़ा दी गई है। 83 अपराधों में जुर्माने की राशि बढ़ा दी गई है और 23 अपराधों में अनिवार्य न्यूनतम सजा का प्रावधान किया गया है। छह अपराधों में सामुदायिक सेवा का दंड पेश किया गया है और अधिनियम में 19 धाराएं निरस्त या हटा दी गई हैं।
महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कानून ज्यादा संवेदनशील बनाए गए हैं। अब पीड़िता जहां चाहेगी, पुलिस को वहां बयान दर्ज करना होगा।
भारतीय न्याय संहिता ने यौन अपराधों से निपटने के लिए ‘महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध’ नामक एक नया अध्याय पेश किया है, और संहिता 18 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं के बलात्कार से संबंधित प्रावधानों में बदलाव का प्रस्ताव कर रही है।
नाबालिग महिला से सामूहिक बलात्कार से संबंधित प्रावधान यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पोक्सो) के अनुरूप हैं। 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के मामले में आजीवन कारावास या मृत्युदंड का प्रावधान भी किया गया है।
सामूहिक बलात्कार के सभी मामलों में 20 साल की कैद या आजीवन कारावास का प्रावधान है और संहिता में 18 वर्ष से कम उम्र की महिला के साथ सामूहिक बलात्कार की नई अपराध श्रेणी है।
संहिता उन लोगों के लिए लक्षित दंड का प्रावधान करती है जो धोखाधड़ी से संभोग में शामिल होते हैं या शादी करने के सच्चे इरादे के बिना शादी करने का वादा करते हैं।
भारतीय न्याय संहिता में पहली बार आतंकवाद को परिभाषित किया गया है और इसे दंडनीय अपराध बनाया गया है।
आतंकवाद के किस अपराध के लिए कितनी सजा?
-आतंकी गतिविधि से मौत होने पर मौत की सजा के अलावा उम्रकैद और जुर्माने का प्रावधान।
-आतंकी साजिश रचने, कोशिश करने या आतंकी की मदद करने पर पांच साल से लेकर उम्रकैद की सजा और जुर्माना।
-आतंकी संगठन से जुड़ने पर उम्रकैद और जुर्माने का प्रावधान।
-आतंकी को जानबूझकर छिपाने पर तीन साल से उम्रकैद और जुर्माने का प्रावधान
अपराध एवं दंड को किया गया परिभाषित और पुनर्परिभाषित-
-छीनाझपटी एक संज्ञेय, गैर जमानती और गैर शमनीय अपराध (बीएनएस धारा-304)
-आतंकवादी कृत्य की परिभाषा: इसमें ऐसे कृत्य शामिल हैं जो भारत की एकता, अखंडता, संप्रभुता, सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करते हैं या किसी समूह में आतंक फैलाते हैं (बीएनएस धारा-113)
-राजद्रोह में परिवर्तन: राजद्रोह के अपराध को समाप्त कर दिया गया है तथा भारत की एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों को दंडित करने के लिए देशद्रोह शब्द का इस्तेमाल किया है (बीएनएस धारा-152)
-मॉब लिंचिंग को एक ऐसे अपराध के रूप में शामिल किया गया जिसके लिए अधिकतम मृत्युदंड है (बीएनएस धारा 103-(2))
-संगठित अपराध को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है (बीएनएस धारा-111)
भारतीय न्याय संहिता 2023 (बीएनएस) की विशेषताएं-
-महिला और बच्चों के खिलाफ अपराधों को एक अध्याय में समेकित किया गया है।
-धारा 69 झूठे वादे पर यौन संबंध बनाने पर सख्त सजा का प्रावधान किया गया है।
-धारा 70 (2) सामूहिक दुष्कर्म के मामले में मृत्यु दंड का प्रावधान किया गया है।
आईपीसी की धाराओं को बीएनएस की इन धाराओं बदला गया-
हत्या:
आईपीसी – धारा 302
बीएनएस – धारा 103
हत्या का प्रयास:
आईपीसी – धारा 307
बीएनएस – धारा 109
गैर इरादतन हत्या:
आईपीसी – धारा 304
बीएनएस – धारा 105
दहेज हत्या:
आईपीसी – धारा 304बी
बीएनएस – धारा 80
चोरी:
आईपीसी – धारा 379
बीएनएस – धारा 303
दुष्कर्म:
आईपीसी – धारा 376
बीएनएस – धारा 64
छेड़छाड़:
आईपीसी – धारा 354
बीएनएस – धारा 74
धोखाधड़ी:
आईपीसी – धारा 420
बीएनएस – धारा 318
पति द्वारा क्रूरता का शिकार महिलाएं:
आईपीसी – धारा 498ए
बीएनएस – धारा 85
लापरवाही से मौत:
आईपीसी – धारा 304ए
बीएनएस – धारा 106
आपराधिक षडयंत्र के लिए सजा:
आईपीसी – धारा 120बी
बीएनएस – धारा 61
देश के खिलाफ युद्ध:
आईपीसी – धारा 121, 121ए
बीएनएस – धारा 147, 148
मानहानि:
आईपीसी – धारा 499, 500
बीएनएस – धारा 356
लूट:
आईपीसी – धारा 392
बीएनएस – धारा 309
डकैती:
आईपीसी – धारा 395
बीएनएस – धारा 310
शून्य एफआईआर दर्ज करने की प्रथा को संस्थागत बना दिया गया है, और एफआईआर कहीं भी दर्ज की जा सकती है, चाहे अपराध किसी भी क्षेत्र में हुआ हो।
इन कानूनों में पीड़ित के सूचना के अधिकार को सुनिश्चित किया गया है, जिसमें पीड़ित को एफआईआर की प्रति निःशुल्क प्राप्त करने का अधिकार भी शामिल है।
इसमें पीड़ित को 90 दिन के भीतर जांच की प्रगति की जानकारी देने का भी प्रावधान है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता-
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में 531 धाराएं हैं (सीआरपीसी की 484 धाराओं के मुकाबले)।
संहिता में कुल 177 प्रावधान बदले गए हैं और इसमें नौ नई धाराओं के साथ-साथ 39 नई उपधाराएं भी जोड़ी गई हैं।
अधिनियम में 44 नए प्रावधान और स्पष्टीकरण जोड़े गए हैं। 35 अनुभागों में समय-सीमा जोड़ी गई है और 35 स्थानों पर ऑडियो-वीडियो प्रावधान जोड़ा गया है।
संहिता में कुल 14 धाराएं निरस्त और हटा दी गई हैं।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम –
भारतीय साक्ष्य अधिनियम में 170 प्रावधान होंगे (मूल 167 प्रावधानों के विपरीत), और कुल 24 प्रावधान बदले गए हैं।
अधिनियम में दो नए प्रावधान और छह उप-प्रावधान जोड़े गए हैं और छह प्रावधान निरस्त या हटा दिए गए हैं।
भारत में हालिया आपराधिक न्याय सुधार प्राथमिकताओं में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है, जिसमें महिलाओं, बच्चों और राष्ट्र के खिलाफ अपराधों को सबसे आगे रखा गया है।
