वाराणसी: हमेशा शिक्षित और सक्षम अधिकारियों की टीम एक साथ मिलकर अच्छा काम करती हैं क्योंकि उसमें व्यवहार और संवेदना दोनों मौजूद होती है जब उनके द्वारा कोई प्रयोग किया जाता हैं। ठीक इसी तर्ज पर नये कुलपति प्रो. आनंद कुमार त्यागी और कुलसचिव संगीत की टीम काम कर रही है। जिसके दूरगामी परिणाम भविष्य में देखने को मिलेंगे।
महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के मुख्य परिसर एवं गंगापुर परिसर के स्ववित्तपोषित योजना अंतर्गत संचालित विभिन्न विभागों में चल रहे पाठ्यक्रम में कार्यरत 14 संविदा शिक्षकों का 10 अगस्त 2021 को सेवा विस्तार कर दिया गया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार इन संविदा शिक्षकों का 5 साल का करार 31 जून 2021 को समाप्त हो गया था। उत्तर प्रदेश शासनादेश संख्या 226 /70 –2 — 2020 -18( 31 )2018 को विश्वविद्यालय कार्य परिषद ने दिनांक 3 मई 2020 को बैठक में निर्णय लिया था। उसी के आधार पर वर्तमान कुलपति प्रोफेसर आनंद कुमार त्यागी ने 14 संविदा शिक्षकों का विस्तारीकरण किया है। प्रदेश सरकार के शासनादेश के आधार पर इन सभी संविदा शिक्षकों का करार 1 जुलाई 2021 से पाठ्यक्रम संचालित रहने तक अथवा अधिवर्षिताआयु पूर्ण होने तक विस्तार किया जाता है।
ज्ञात हो कि विश्वविद्यालय के 78 संविदा शिक्षकों ने पिछले वर्ष दिनांक 2 नवंबर 2020 को इसी शासनादेश को लागू कराने के लिए विश्वविद्यालय के पंथ प्रशासनिक भवन के सामने गांधी जी के मूर्ति के समक्ष 24 दिनों तक सत्याग्रह किया था ,उस समय विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर टी, एन ,सिंह ने शासनादेश मानने से इनकार कर दिया था। यह इसलिए हुआ था कि विश्वविद्यालय के गंगापुर के डायरेक्टर प्रोफेसर योगेंद्र सिंह ,एनटीपीसी के डायरेक्टर प्रोफेसर सभाजीत यादव ,पूर्व चीफ प्रॉक्टर डॉ संतोष गुप्ता, पूर्व गृह पति डॉ विनोद सिंह पूर्व कुलपति के चाटुकार थे इन लोगों के इन लोगों की मंशा थी कि इन सभी शिक्षकों को बाहर कर दूसरे लोगों को नियुक्त कर मोटा रकम कमाया जाए। लेकिन 78 अध्यापकों के सत्याग्रह पर चले जाने के कारण इनके मंसूबे पर पानी फेर दिया, साथ ही इन शिक्षकों ने अपने अस्तर से विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति से वार्ता कर समझाने की कोशिश की लेकिन वार्ता सफल नहीं हुयी। हार मानकर लगभग 40 संविदा शिक्षकों ने हाई कोर्ट ईलहावाद का सहारा लेने पर मजबूर हुए ,जिनका निर्णय अभी लंबित है।
विश्विद्यालय के नये कुलपति और कुलसचिव को साधुवाद क्योंकि मानवीय मूल्यों और संवेदना का ध्यान जरूर रखा उन्होंने अपने इस मील के पत्थर साबित होने वाले फैसले में। अब विश्विद्यालय को बाकी बचे लोगों के भविष्य में भी फैसला लेना बाकी है क्योंकि पूर्व कुलपति त्रिलोकीनाथ सिंह ने कोर्ट के फैसले की सुनवाई में भी जानबूझ देर करवाया था ताकि वो नियुक्तियों के जरिये कमाई कर सकें। लेकिन राज्यभवन ने उनकी मंशा पर पानी फेर दिया था। नियुक्तियों पर रोक लगा कर।
