कलकत्ता उच्च न्यायालय के 2023 के फैसले के खिलाफ पश्चिम बंगाल सहित अन्य द्वारा दायर विभिन्न याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के एक विवादास्पद फैसले को पलट दिया, जिसमें किशोर लड़कियों को अपनी यौन इच्छाओं को नियंत्रित करने और अपने शरीर की अखंडता के अधिकार की रक्षा करने के लिए कहा गया था। न्यायमूर्ति एएस ओका की अध्यक्षता वाली पीठ ने किशोरों से जुड़े मामलों में फैसले लिखने के तरीके के बारे में न्यायाधीशों के लिए दिशानिर्देश भी जारी किए। इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि किशोरों से जुड़े मामलों में विशेष संवेदनशीलता और सावधानी बरतने की जरूरत होगी।
जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइया की बेंच ने यह फैसला दिया है।
बार और बेंच के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने उस व्यक्ति को बरी करने के कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले को भी पलट दिया, जिसे एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार के लिए दोषी ठहराया गया था, जिसके साथ उसका “रोमांटिक संबंध” था।
सजा बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि रेप मामले में शख्स की सजा पर विशेषज्ञों की एक समिति फैसला करेगी।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला तब आया जब पिछले साल कलकत्ता हाई कोर्ट ने किशोरियों से कहा था कि वे अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखें और दो मिनट के आनंद के चक्कर में न पड़ें। उच्च न्यायालय के फैसले ने विवाद पैदा कर दिया क्योंकि इसमें किशोरों के लिए “कर्तव्य/दायित्व-आधारित दृष्टिकोण” का आह्वान किया गया था।
अपने फैसले में, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 16 वर्ष से अधिक उम्र के किशोरों के साथ सहमति से किए गए यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का आह्वान किया था।
कोलकाता हाई कोर्ट ने एक आरोपी को बरी करते हुए कहा था कि नाबालिग लड़कियों को दो मिनट के मजे की जगह अपनी यौन इच्छाओं पर कंट्रोल रखना चाहिए और नाबालिग लड़को को युवा लड़कियों और महिलाओं और उनकी गरिमा का ख्याल रखना चाहिए।
बच्चों खासकर लड़कियों को Bad Touch, अश्लील इशारों के बारे में बताना जरूरी है। कोलकाता हाई कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में ये भी कहा था कि, हमें कभी ये नही सोचना चाहिए कि केवल एक लड़की ही दुर्व्यवहार का शिकार होती है। लड़के भी दुर्व्यवहार के शिकार हो सकते हैं। माता-पिता के मार्गदर्शन के अलावा, इन पहलुओं और रिप्रोडक्टिव हेल्थ और हाइजीन पर जोर देने वाली यौन शिक्षा हर स्कूल में दी जानी चाहिए।
मालूम हो कि इस मामले का सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जजों को अपनी निजी राय व्यक्त नही करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “यह केवल इन टिप्पणियों के बारे में नहीं है, बल्कि अदालत के निष्कर्षों के बारे में है। इस तरह के फैसले लिखना बिल्कुल गलत है। न्यायाधीशों ने किस तरह के सिद्धांतों का इस्तेमाल किया है?”
