उत्तर प्रदेश के मूल निवासी लेकिन गुजरात कैडर के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी और कुछ माह पहले ही उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बनाए अरविन्द कुमार शर्मा अब उत्तर प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष भी बना दिए गए हैं। श्री शर्मा राज्य भाजपा के सत्रहवें उपाध्यक्ष हैं। उनके अलावा 16 और उपाध्यक्ष राज्य पार्टी में पहले से ही हैं।
श्री शर्मा से पहले 16वें नंबर के लिए सुनीता दयाल को प्रदेश भाजपा का उपाध्यक्ष बनाया था। राज्य के पहले नंबर के उपाध्यक्ष के रूप में लक्ष्मण आचार्य को नियुक्ति दी गई थी। ये तमाम प्रयास उत्तर प्रदेश विधान सभा के अगले साल होने वाले चुनाव की तैयारियों के सिलसिले में किये जा रहे हैं। प्रसंगवश एक महत्वपूर्ण बात यह है कि जब कुछ महीने पहले ही प्रधान मंत्री कार्यालय में तैनात भारत सरकार के इस वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को नौकरी से इस्तीफा दिलवा कर विधान परिषद की सदस्यता दिलाई गई थी तभी से यह चर्चा जोरों पर थी कि प्रधानमंत्री के इस अति विश्वासपात्र अधिकारी को शीघ्र ही योगी मंत्रिमंडल में कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी ( उप मुख्यमंत्री ) दी जायेगी पर किसी कारणवश ऐसा नहीं हो सका।
बताते हैं कि राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ श्री शर्मा को सीधे मंत्री बनाए जाने के पक्ष में नहीं थे। इस बाबत आदित्यनाथ ने पार्टी के आला नेताओं के साथ ही केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ कई दौर की बातचीत के बाद अरविंद शर्मा को मंत्री न बनाए जाने पर सबकी सहमति हासिल कर ली थी उसके बाद ही उन्हें पार्टी संगठन की जिम्मेदारी देने पर सहमति बन सकी। राजनीति में नौकरशाहों का आना नई बात नहीं है लेकिन ऐसा भी भी कोई उदाहरण नहीं है कि किसी नौकरशाह को नौकरी से इस्तीफा देने के तुरंत बाद ही किसी राज्य का मुख्यमंत्री , उप मुख्यमंत्री या केंद्र सरकार में काबीना मंत्री बना दिया गया हो। पूर्व नौकरशाह मंत्री , मुख्यमंत्री भी बने हैं लेकिन दो – चार , दस साल राजनीति में राम जाने के बाद।
इस पृष्ठभूमि में जब विधानपरिषद् का सदस्य बनने के अगले ही दिन से अरविन्द शर्मा को यूपी जैसे बड़े राज्य में मंत्री बनाए जाने की ख़बरें सामने आने लगीं तो सवाल उठने भी स्वाभाविक थे। एक सवाल यह भी उठाया जाने लगा था कि अब एक नौकरशाह उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री को प्रशासकीय मामलों में ठीक करने आयेंगे ?इस सवाल के उठते ही झमेला भी खड़ा हुआ और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ ही सत्तारूढ़ पार्टी के बड़े से बड़े नेता भी चौकन्ने हो गए। बहरहाल ! उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए फिलहाल भाजपा और संघ आला कमान ने यथास्थिति बनाए रखते हुए उत्तर प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन संबंधी तमाम अटकलों पर पूर्ण विराम लगाते हुए गुजरात कैडर के पूर्व प्रशासनिक अधिकारी अरविन्द शर्मा को उत्तर प्रदेश भाजपा का सत्रहवां उपाध्यक्ष बनाना ही उचित लगा है। अरविन्द शर्मा नरेंद्र मोदी के इतने करीब कैसे आये कि प्रधान मंत्री उन्हें सीधे राज्य सरकार में मंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। इस सम्बन्ध में देश की नौकरशाही और राजनीति के गलियारों में एक ख़ास तरह की चर्चा भी अक्सर सुनी जाती है। इस चर्चा के मुताबिक जब साल 2008 में पश्चिम बंगाल के सिंगुर में टाटा की नैनो कार का प्लांट लगाने की बात खटाई में पड़ गई थी तब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रतन टाटा को एक मोबाइल सन्देश भेज कर गुजरात आने का न्योता दिया था।
यह सन्देश मिलने के बाद रतन टाटा ने सिंगूर से जाने और गुजरात में प्लांट लगाने का मन बना लिया था। गुजरात के भुज में जिस जगह यह नैनो प्लांट लगना था उसमें कुछ कानूनी और तकनीकी दिक्कतें थीं , यह काम संभाल लिया अरविन्द शर्मा ने। कुछ ही महीनों की मेहनत रंग लाई और इस विवादास्पद जगह की सारी उलझने दूर हो गयीं। इसके बाद टाटा के इस संयंत्र से कार उत्पादन भी शुरू हो गया था। प्रधान मंत्री के इतना करीब आ गए इस अधिकारी ने विगत 12 जनवरी 2021 को अपनी सेवा अवधि से दो साल पहले ही ऐच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर 14 जनवरी को धूमधाम से लखनऊ में भाजपा की सदस्यता ले ली और उसके कुछ दिन बाद ही विधान परिषद के सदस्य भी बन गए थे।
1988 बैच के गुजरात कैडर के आईएएस अधिकारी अरविन्द शर्मा उत्तर प्रदेश में बनारस के पास मऊ जिले के मोहम्मदाबाद गोहना तहसील के रानीपुर विकासखंड के अंतर्गत आने वाले काझा खुर्द गाँव के रहने वाले हैं जहां साल 1962 में शिवमूर्ति राय और शांति देवी के घर में उनका जन्म हुआ था वो तीन भाइयों में सबसे बड़े हैं और उन्होंने गांव के स्कूल से प्राथमिक पढ़ाई करने के बाद डीएवी इंटर कॉलेज से इंटर पास किया। फिर उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद चले गए।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए , एमए और पीएचडी करने के बाद सिविल सेवा की तैयारी शुरू की और चुन लिए गए। संयोग की बात है कि साल 2001 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल बहुत दिक्कतों से गुज़र रहे थे। इसके पहले 1998 में कांडला बंदरगाह पर तूफ़ान, साल 1999 और 2000 का कच्छ और सौराष्ट्र का सूखा और साथ ही 2001 का भुज का भूकंप। इनके साथ-साथ पंचायत और उपचुनावों में भी भाजपा अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही थी। केशुभाई पटेल से शीर्ष नेतृत्व ख़ुश नहीं था। मीडिया में केशुभाई के खिलाफ खूब छप रहा था। यह भी एक संयोग ही है कि मीडिया को अपनी ही पार्टी की सरकार के खिलाफ सामग्री उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति को ही केशुभाई के उत्तराधिकारी के रूप में राज्य का अगला मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री बनाया जाना था। और बना भी दिया गया।
इस तरह 7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने गुजरात के 14वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. दी .”बहरहाल, मुख्यमंत्री बनने के बार नरेंद्र मोदी की मुलाकात हर्षद ब्रह्मभट्ट नामक एक आईएएस अधिकारी से हुई जिसके संघ से भी अच्छे रिश्ते थे और वो उस समय सामान्य प्रशासन विभाग से सम्बद्ध थे। हर्षद ब्रह्मभट्ट ने ही उनको उस समय उद्योग विभाग में अतिरिक्त आयुक्त के पद पर तैनात वरिष्ठ अधिकारी अरविन्द शर्मा का नाम सुझाया था। अरविंद कुमार शर्मा को हर्षद ब्रह्मभट्ट की सिफारिश पर तुरंत मुख्यमंत्री सचिवालय बुला लिया गया। नियुक्ति हुई सचिव के पद पर. यहीं से अरविंद शर्मा और नरेंद्र मोदी के बीच एक अटूट सम्बन्ध की शुरुआत हुई इसके बाद। जहां-जहां नरेंद्र मोदी रहे, वहां-वहां अरविंद कुमार शर्मा मौजूद रहे।
गुजरात कैडर के आईएएस अधिकारी के रूप में काम करते हुए अरविन्द शर्मा गुजरात के तत्कालीन मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदी को यूँ ही नहीं भा गए थे बल्कि इसके पीछे सबसे बड़ी बात यह थी कि उन्होंने गुजरात के भुज में टाटा के नैनों कार प्लांट का रास्ता साफ़ करने के साथ ही भुज के भूकंप में बहुत ही प्रभावशाली तरीके से करवाया गया राहत कार्य भी इसकी पृष्ठ भूमि में था। इसके एक साल बाद 2003 में आयोजित वाइव्रेंट गुजरात समारोह ने अरविन्द शर्मा को नरेन्द्र मोदी के एकदम करीब लाकर खड़ा कर दिया था। यह गुजरात का एक ऐसा कार्यक्रम है जो दुनिया के निवेशकों को गुजरात की तरफ आकर्षित करता है। अब यह एक सालाना जलसा बन गया है। अरविन्द शर्मा इस कार्यक्रम के प्रमुख योजनाकार रहे हैं।
2002 में हुए गुजरात दंगों की वजह से नरेंद्र मोदी और अमरीका के संबंध बहुत दिन तक खटाई में थे। मोदी बहुत समय तक अमरीका नहीं जा सके। वीज़ा पर रोक थी ऐसे मौके पर अरविंद शर्मा न केवल अपने संपर्कों की वजह से साल 2014 में अमरीकी राजदूत नैन्सी पावल को गांधीनगर लाने में सफल हुए बल्कि बाद के दौर में धीरे-धीरे नरेंद्र मोदी और अमरीका के रिश्तों के बीच जमी बर्फ़ को पिघलाने में भी उन्होंने बड़ी भूमिका अदा की थी।
बताते हैं कि मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के देश और विदेश के लगभग सभी दौरों पर अरविंद शर्मा उनके साथ ज़रूर मौजूद रहे। इसके साथ ही वो नरेन्द्र मोदी के सभी कानूनी मसलों पर भी उनके ट्रबल शूटर की तरह हमेशा उनके साथ ही रहे, चाहे वो 2002 के गुजरात दंगों से जुड़ा मुद्दा हो या कोई और इस दरम्यान सिर्फ साल 2006 का 11 महीनों का समय छोड़ दें तो पिछले 20 साल में नरेंद्र मोदी और अरविंद कुमार शर्मा का साथ कभी नहीं छूटा है। यह 11 महीने का समय भी वो था जब अरविन्द शर्मा को विशेष प्रशिक्षण के लिए ऑस्ट्रेलिया जाना पड़ा था। कहते हैं कि जब ,16 मई 2014 को तय हुआ कि नरेंद्र मोदी ही अगले प्रधानमंत्री बनेंगे तब उसके अगले ही दिन 17 मई को नरेंद्र मोदी ने अरविंद कुमार शर्मा को फ़ोन पर सूचित कर दिया था किया कि उनको भी दिल्ली चलना है। मई 2014 में प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ गुजरात से दिल्ली कूच करने वाले अरविन्द शर्मा को 30 मई 2014 को प्रधान मंत्री कार्यालय संयुक्त सचिव के पद पर नियुक्त किया गया था और इसके दो साल दो महीने के बाद 22 जुलाई 2017 को उन्हें पदोन्नत कर अतिरिक्त सचिव बना दिया गया था और 30 अप्रैल 2020 को श्री शर्मा केंद्र सरकार के लघु सूक्ष्म और मध्यम उपक्रम मंत्रालय के सचिव बना दिए गए थे। इसके बाद ही ऐच्छिक सेवानिवृत्ति और अब विधान परिषद् सदस्य के रूप में देश के सबसे बड़े राज्य के विधायक तथा सत्तारूढ़ पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष।
गुजरात से केंद्र में आने के बाद से ही अरविंद कुमार शर्मा पहले एक नौकरशाह के रूप में चर्चित रहे और अब एक राजनीतिज्ञ के रूप में चर्चा में हैं। एक नौकरशाह के रूप में उन्हें सीधे उन प्रोजेक्ट्स से जोड़ा जाता, जिनमें प्रधानमंत्री मोदी की ख़ास रुचि होती थी. 2019 में केंद्र सरकार के 100 करोड़ इंफ़्रास्ट्रक्चर में निवेश में प्लान को डिज़ाइन करने में अरविंद शर्मा ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। साथ ही इससे जुड़े मंत्रालयों में अरविंद शर्मा की सीधी दख़ल होती थी। चर्चा तो ये अभी है कि अरविंद कुमार शर्मा का मेयार इतना बुलंद था कि वो काम निकालने के लिए सीधे केंद्रीय मंत्रियों को फ़ोन लगा देते थे। अब एक राजनीतिज्ञ के रूप में भी वो इसीलिए चर्चा में हैं क्योंकि यहाँ भी उन्हें यूपी में प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के विशेष राजनीतिक दूत के रूप में ही काम करना है। अरविन्द शर्मा मित भाषी हैं कर्मठ हैं और जो करने की ठान लेते हैं उसे कर के ही दम लेते हैं उनके ये ही गुण उनको दूसरों से ख़ास और अलग बनाते हैं और अपने इन गुणों की वजह से ही वो नरेन्द्र मोदी के इतने करीब आ सके हैं .उत्तर प्रदेश विधान परिषद् का सदस्य बनने से मात्र एक दिन पहले भाजपा की सदस्यता लेने वाले श्री शर्मा का मानना है कि ऐसा इत्तफाक सिर्फ भाजपा में और प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में ही हो सकता है कि एक व्यक्ति जिसकी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि या विरासत न हो उसे रातों रात भाजपा जैसी देश की सबसे बड़ी और राष्ट्रीय पार्टी में शामिल कर लिया जाए . ”ये तो नहीं पता कि यूपी में एक तीसरा डिप्टी CM आएगा, या दिनेश शर्मा और केशव प्रसाद मौर्या में से किसी एक की छुट्टी होगी। लेकिन ये चर्चा बुलंद है कि अरविंद शर्मा को नई और अतिरिक्त जिम्मेदारी देकर प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने उत्तर प्रदेश सरकार और पार्टी के आला पदाधिकारियों को यह सन्देश जरूर दे दिया है कि अरविन्द शर्मा देश के सबसे बड़े राज्य में उनके विश्वासपात्र दूत के रूप में काम संभालेंगे ।
