म्यांमार में सैनिक तानाशाही का पक्षधर क्यों बन रहा है भारत

 

 ज्ञानेन्द्र पाण्डेय: पड़ोस में खटपट हो रही है, और यह खटपट भारत के लिए परेशानी का सबब है। भारत की परेशानी पड़ोसी देश म्यामार में तख्तापलट को लेकर हो रही हिंसा की ही नहीं है। बल्कि भारत की परेशानी यह भी है कि वहाँ लोकतंत्र खतरे में है। जनता पर अन्याय हो रहा है और भारत चुप्पी मारे बैठा है। कहने को हम लोकतंत्र के पुरोधा हैं लेकिन जब पड़ोस में ही लोकतंत्र का गला दबाया जा रहा है हम चुप बैठे हैं। ऐसा तो हमने पहले कभी नहीं किया था।

 

 

लोकतांत्रिक मूल्यों की सुरक्षा के खातिर ही तो हमने यानी भारत ने करीब पांच दशक पहले बांगला देश का उदय करने में मदद की थी। पाकिस्तान के कई मसले भी हमने वैश्विक मंचों पर उठाए थे। नेपाल में लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम करने में भी हमने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। श्रीलंका में शांति सेना भेजने का निर्णय भी हमारा ही था। कुल मिला कर हाल ये कि लोकतंत्र के सजग प्रहरी की तरह हमारी निगाहें तब – तब हमेशा चौक्कनी रहीं जब – जब कहीं भी लोकतंत्र पर हमला किया जाता रहा है। पर न जाने क्यूँ म्यांमार  के मौजूदा हालात को देख – समझ कर भी हम चुप्पी साधे बैठे हैं , यह बात समझ में नहीं आई . गौरतलब है कि  म्यांमार  में इस साल फरवरी में हुई तख्तापलट की घटना जिसका वहाँ अभी तक विरोध हो रहा है , के  बाद नई दिल्ली को नई तरह की  कूट नीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इन चुनौतियों के साथ ही भारत के  उत्तर-पूर्व में भी  नया शरणार्थी संकट खड़ा हो गया है और हम शांत बैठे हैं। म्यांमार में सैन्य शासन के बाद हिंसा बहुत तेजी से हुई है। भारत के वैश्विक मामलों के सरकारी विशेषज्ञों का मानना है कि म्यांमार के मामले में भारत की स्थिति काफी जटिल हो गई है। भारत और संयुक्त राष्ट्र लगातार हिंसा की निंदा कर रहे हैं लेकिन भारत के लिए सीधे तौर पर इस लड़ाई में कूदना ठीक नहीं होगा इसलिए भारत के लिए म्यांमार के ताजा मामल को देखते संतुलन बनाना जरूरी हो गया है।

 
 प्रसंगवश म्यांमार के ताजा हालात को लेकर भारत की चिंताओं के सन्दर्भ में एक बात यह भी कही जा रही है कि भले ही भारत यह कह रहा है कि वो इस मामले को लेकर काफी चिंतित है और हालात को करीब से नजर रखे हुए है ‘, लेकिन म्यांमार के ताजा घटनाक्रम को लेकर भारत के दिमाग में कहीं न कहीं चीन फैक्टर  का रोड़ा अटक गया है। भारत को कुछ इस तरह की खबरें भी मिल रही हैं कि म्यांमार में तख्तापलट की कारवाई का चीन  के इशारों पर की गई है इसलिए भारत वैश्विक स्तर की ऐसी किसी मुहिम में भागीदार नहीं बनना चाहता है जिसमें चीन की भागीदारी भी हो। इन परिस्थितियों में भारत के लिए अपने पड़ोसी देश में चीन का प्रभाव कभी भी रूचि कर नहीं लगेगा और म्यांमार जैसे पड़ोसी देश में सैनिक शासन से भारत को उत्तर – पूर्व के शरणार्थियों ( विद्रोहियों ) पर नकेल कसने में भी मदद मिलेगी इसलिये भी भारत के लिए म्यांमार के सैनिक शासन की मदद करना रणनीतिक दृष्टि से जरूरी भी हो गया है। शायद इसी वजह से विगत 26 मार्च को जारी किये गए एक सरकारी आदेश में भारत की तरफ से यह कहा भी गया है कि म्यांमार से आने वाले शरणार्थियों की मदद के लिए म्यांमार की सीमा से लगे भारत के जिलों में जिला प्रशासन को खाना और आश्रय देने के लिए कैंप शुरू नहीं करने चाहिए।‘ न केवल जिला प्रशासन बल्कि स्वेच्छिक संगठनों को भी सरकार ने इस आशय के आदेश दिए थे  कि म्यांमार से आने वाले शरणार्थियों को शालीनता के साथ वापस भेज दें। केंद्र सरकार की पहल पर  मणिपुर के गृह विभाग द्वारा जारी किया गया इस तरह का आदेश बाद में वापस ले लिया गया था लेकिन कहीं न कहीं कोई गड़बड़ तो जरूर थी। राज्य सरकार ने भी यह आदेश तभी वापस लिया था जब मीडिया में इसकी बहुत किरकिरी हुई थी।
 
इस प्रसंग में भारत की तरफ से की गई कारवाई का एक हास्यास्पद पहलू यह भी है कि सरकार सोशल मीडिया में हुई जबरदस्त खिंचाई के बाद अपने इस आदेश को वापस भले ही ले लिया हो लेकिन म्यांमार के शरणार्थियों की मदद के मामले में उस का  आधिकारिक स्टैंड  अभी तक वही है  बदला कुछ भी नहीं है। इस विवादित आदेश के सम्बन्ध में भारत सरकार का आज भी यही मानना है किभारत यूएन कन्वेंशन ऑन स्टेटस ऑफ रिफ्यूजी और 1967 के प्रोटोकॉल का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है। इसलिए भारत सरकार ने म्यांमार के ताजा घटनाक्रम के सन्दर्भ में जो कदम उठाए हैं वो भारत के सन्दर्भ में उचित ही हैं और  भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर उत्पीड़न से भागने वालों को शरण देने के लिए बाध्य नहीं है। म्यांमार शरणार्थियों के प्रति भारत की अधिकृत उपेक्षा का नजारा इस रूप में देखने को मिल रहा है कि म्यांमार के चिन राज्य से तियाउ नदी के जरिए भारत आ रहे लोग नई तरह की चुनौती का कर रहे हैं। ये लोग  मिजो समुदाय से जुड़े हुए हैं।
भारत में उनके पारिवारिक संबंध हैं और यही वजह है कि इस समुदाय पर शरणार्थियों को छोड़ने का दबाव बनाना मुश्किल हो रहा है। म्यांमार की बॉर्डर अथॉरिटीज ने हाल ही में चम्पाई प्रशासन को पत्र लिखकर कम से कम 8 पुलिसकर्मियों को सौंपने की मांग की है। पत्र में कहा गया है कि दोनों देशों के बीच संबंध बरकरार रखने के लिए‘ ऐसा किया जाना चाहिए। ऐसे में यह भारत के लिए खासी चुनौती बना हुआ है। भारत हिंसा की निंदा के बावजूद जुंटा को निराश नहीं करना चाहता। म्‍यांमार में सेना द्वारा किये गए तख्‍तापलट के बाद लगातार हालात खराब हो रहे हैं। गौरतलब है कि म्‍यांमार में 1 फरवरी 2021 को सेना के प्रमुख मिन ऑन्‍ग ह्लेनिंग ने ऑन्‍ग सांग सू की कि सरकार का तख्‍तापलट कर शासन अपने हाथों में ले लिया था। तब से ही वहां पर सैन्‍य शासन के खिलाफ जबरदस्‍त प्रदर्शन हो रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *