एक रंग में आन्दोलनकारियों और उनके समर्थकों ने जहां वैश्विक हस्तियों के इस समर्थन का स्वागत किया था। वहीँ दूसरी तरफ भारत सरकार और किसान आन्दोलन से एक तरह की निश्चित दूरी बना कर रखने वाले भारत की आबादी के एक तबके ने विदेशी हस्तियों के किसान आन्दोलन का समर्थन करने संबंधी बयानों को देशहित में उचित नहीं मान कर इसे एक दूसरा ही रंग दे दिया था। गौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय ख्याति की गायिका रिहाना , अंतर्राष्ट्रीय स्टार पर पर्यावरण हितों के लिए संघर्ष कर रही स्वीडन की एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग , फिल्म जगत से जुडी मियाँ खलीफा और अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हेरिस की भांजी और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति की लेखिका मीना हेरिस समेत अनेक वैश्विक हस्तियों ने किसान आन्दोलन के समर्थन में अपने विचार सोशल मीडिया के माध्यम से व्यक्त किये थे । इस पर दिल्ली के बॉर्डर पर धरना दे रहे 3 संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के नेताओं ने बीते बुधवार 3 फरवरी 20 21 को कहा था कि दुनिया की नामचीन हस्तियों द्वारा किसान आंदोलन को समर्थन देना गर्व की बात है, लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत सरकार उनका दर्द नहीं समझ रही है। आन्दोलनकारी किसानों के साथ ही भारत में आबादी के एक बड़े तबके ने विदेशी हस्तियों के किसान समर्थन का स्वागत किया था लेकिन भारत की खेल और फिल्म जगत से जुडी अनेक हस्तियों ने सरकार के पक्ष का समथन करते हुए विदेशी हस्तियों के इस कदम की आलोचना भी की थी । हैरानी की बात यह भी है कि किसान आन्दोलन का समर्थन करने वाली सभी विदेशी हस्तियों ने भारत के किसान आन्दोलन को लेकर अपनी राय व्यक्तिगत स्तर पर दी थी लेकिन भारत सरकार ने एक कदम आगे बढ़ कर आधिकारिक स्तर पर विदेशी हस्तियों की प्रातिक्रियाओं का जवाब देने की कोशिश की ।
रिहाना , ग्रेटा थनबर्ग , मीना हेरिस और मियाँ खलीफा सरीखी विदेशी हस्तियों की प्रतिक्रियाओं का जवाब देने वाली भारतीय हस्तियों में सदाबहार कंगना रानौत तो सबसे आगे ही हैं , उनके अलावा कनाडा के नागरिक लेकिन भारतीय फिल्म उद्योग के अभिनेता अक्षय कुमार , निर्माता करण जौहर, अभिनेता – निदेशक सुनील शेट्टी और भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान तथा कांग्रेस पार्टी की कृपा से राज्य सभा के मानद सदस्य बनाए गए और कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में ही देश के सर्वोच्च अलंकरण भारत रत्न से नवाजे गए महान खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर को भी विदेशी हस्तियों का किसानों के समर्थन में सामने आना आगवार लगा है ।आन्दोलन को लेकर देशी – विदेशी हस्तियों का क्रिया – प्रतिक्रिया देना एक अलग बात है लेकिन आन्दोलनकारी किसानों को लेकर जिस तरह का माहौल इस देश में बन रहा है या बनाया जा रहा है उसे ठीक नहीं कहा जा सकता । भारत के किसानों की अपनी समस्याएं हैं उनका निराकरण भारत सरकार को ही करना होगा . ऐसा नहीं हुआ और किसानों को आन्दोलन का सहारा लेना पड़ा । लोकतांत्रिक देश में अपनी जायज मांगों को मनवाने के लिए जनता को शांतिपूर्वक तरीके से आन्दोलन करने का अधिकार तो होता ही है फिर किसानों के आन्दोलन को लेकर इतनी हाय तौबा क्यों ?यहाँ समझने वाली एक बात यह भी है कि आज के समय में दुनिया तकनीकी रूप से इतनी आगे बढ़ चुकी है कि अब न देशों के बीच किसी तरह की दूरी नहीं रह गई है । सबको सभी कुछ चंद सेकंड में ही पता चल जाता है । कोई कहीं भी , कभी भी आ जा सकता है ऐसे में किसी से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वो दुनिया के एक कोने में बैठ कर दूसरे कोने में होने वाली गतिविधियों पर अपनी प्रतिक्रिया न दे ।
याद हो कि डेढ़ महीने पहले ही भारत समेत दुनिया के सभी देशों नी अमेरिका के केपिटल हिल में हुई अलोकतांत्रिक गतिविधि की न केवल आलोचना की थी बल्कि अमेरिका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति जो बिडेन और उप राष्ट्रपति कमला हेरिस के शपथ ग्रहण समारोह पर हुई इस राजनीतिक हिंसा के लिए अमेरिका के निवर्तमान प्रधान मंत्री डोनाल्ड ट्रम्प को भी यह कहते हुए निशाने पर लिया था कि ट्रम्प के इशारे पर ही उनके समर्थकों ने हिंसा की यह हरकत की थी । हाल ही के दिनों में म्यांमार की सेना के अलोकतांत्रिक तरीके से वहाँ की लोकतांत्रिक सरकार के सत्ता पलट की घटना को भी वैश्विक स्तर पर अच्छा नहीं कहा गया था और इसकी दुनिया भर में आलोचना भी हुई थी ।इसी तरह करीब साल भर पहले चीन को भी पूरी दुनिया ने निशाने पर लेने की कोशिश की थी कि उसकी गलती से कोरोना जैसी महामारी पूरी दुनिया में फ़ैल गई ।पड़ोसी देश नेपाल में भी आये दिन होने वाली राजनीतिक उठा – पटक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनाती है । ऐसे में भारत में होने वाली किसी भी तरह की राजनीतिक हलचल को दुनिया की निगाहों से बचा कर कैसे रखा जा सकता है ।भारत में किसान आन्दोलन का सिलसिला काफी लम्बा हो गया है । चर्चा तो होगी ही जरूरत इस बात की है कि समस्या का हल खोजने की गंभीर कोशिश की जाए । ऐसा न करके हम देश की राजधानी की इस तरह किलेबंदी करने में लगे हैं कि कोई परिंदा भी अन्दर न आ सके । सरकार और समर्थकों को किसान को दुश्मन समझने की यह मनोवृत्ति त्यागनी होगी तभी किसी सर्वमान्य समाधान तक पहुंचा जा सकता है

विदेशी हस्तियों द्वारा किसान आन्दोलन को समर्थन देने का एक दिलचस्प पहलू इस रूप में भी देखा गया कि उनके इस कदम के लिए एक तबके द्वारा उनको सोशल मीडिया पर जबरदस्त तरीके से ट्रोल भी किया गया और उन पर प्रतिकूल टिपण्णी भी की गई . प्रसंगवश यह जान लेना भी जरूरी होगा कि पॉप स्टार रिहाना ने ‘इंडिया कट्स इंटरनेट अराउंड न्यू डेल्ही एज प्रोटेस्टिंग फार्मर्स क्लैश विद पुलिस’ शीर्षक से प्रकाशित सीएनएन के एक लेख को शेयर कर किसान आंदोलन के प्रति समर्थन जताया.बीते दो फरवरी को रिहाना ने ट्वीट कर कहा, ‘हम किसानों के आंदोलन के बारे में बात क्यों नहीं कर रहे हैं?’इसी तरह पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन की दिशा में काम करने वाली ग्रेटा थनबर्ग ने भी सीएनएन का लेख शेयर किया और अधिक स्पष्ट तरीके से किसानों के आंदोलन के प्रति समर्थन जताया. बीते तीन फरवरी को थनबर्ग ने ट्वीट कर कहा, ‘हम भारत में किसानों के आंदोलन के प्रति एकजुट हैं.’विदेशी हस्तियों की इस आशय की टिपण्णी को लेकर विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर इसे गैर जिम्मेदाराना बयान बताया था । इस बाबत .विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने बयान जारी कर कहा था , ‘सनसनीखेज सोशल मीडिया हैशटैग और कमेंट्स से लुभाने का तरीका, खासकर जब मशहूर हस्तियों और अन्य लोगों द्वारा किया गया हो तो ऐसा करना न तो उचित है यह न तो है और न ही इसे जिम्मेदाराना कहा जा सकता है .’

इस सम्बन्ध में ख़ास बात यह भी है कि किसान आंदोलन ने उस समय अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचा है, जब दिल्ली की सीमाओं को किले में तब्दील कर दिया गया है. पुलिस ने वाहनों की आवाजाही को रोकने के लिए कई स्तरीय बैरिकेडिंग की है. इंटरनेट सेवाओं को बंद कर दिया गया है.केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए कृषि से संबंधित तीन विधेयकों– किसान उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) विधेयक, 2020, किसान (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) मूल्य आश्वासन अनुबंध एवं कृषि सेवाएं विधेयक, 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, 2020- के विरोध में पिछले दो महीने से किसान दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे हैं.इसे लेकर सरकार और किसानों के बीच 11 दौर की वार्ता हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोई समाधान नहीं निकल पाया है। किसान तीनों नए कृषि कानूनों को पूरी तरह वापस लिए जाने तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी दिए जाने की अपनी मांग पर पहले की तरह डटे हुए हैं..कहना गलत नहीं होगा कि बेवजह सलाह देने वाले सरकार के कुछ सलाहकारों की गलत सलाह की वजह से किसान आन्दोलन अब एक ऐसे मोड़ पर आकर ठहर गया है जहां से वापस आना अब किसानों के लिए किसी तरह संभव नहीं है ।

ऐसे में पंजाब और हरियाणा के साथ ही इन दोनों राज्यों से लगे उत्तर प्रदेश , राजस्थान , उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भी सतारूढ़ भाजपा को असंतोष का सामना करना पड़ रहा है । इन परिस्थितियों में इन प्रदेशों से आने वाले भाजपा सांसद और विधायकों ने भी पार्टी आलाकमान के सामने अपनी चिंता रखनी शुरू कर दी हैं लेकिन आलाकमान की भी दिक्कत यही है कि किसान मसले को लेकर इतनी आगे बढ़ चुकी सरकार अपने कदम वापस कैसे ले। भाजपा के सांसदों और विधायकों को अब यह लगने लगा है कि इस समस्या का किसी तरह समाधान होना ही चाहिए। इसी वजह से पार्टी के ये नेता चाहते हैं कि किसान समस्या का तुरंत समाधान न भी निकले तो भी ऐसा लग्न जरूर चाहिए कि सरकार समाधान निकालने में लगी हुई है किसानों के प्रदर्शनस्थल पर लगी कंटीली तारें, बैरिकेड्स और पुलिसकर्मियों के हाथों में तलवार जैसी दिखने वाली स्टील की लाठियों ने भाजपा के सांसदों और विधायकों के सामने अपनी ही सरकार की बहुत ही भद्दी तस्वीर खींच दी है.. यहां तक कि सुस्त विपक्ष भी इसके खिलाफ खुल कर मैदान में आ गया है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और तक्षकपोस्ट के Counsulting Editor है।) पोस्ट की सभी सामग्री पर तक्षकपोस्ट का एकाधिकार है।
