SPECIAL- 51 साल के हुये राहुल गांधी, खास क्या है ? धाराओं के विपरीत रुक कर मुकाबला करना ख़ासियत है, इस नये राहुल गांधी की

 

कोरोना के कारण पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपना जन्मदिन ना मनाने का निर्णय लिया, पार्टी कार्यकर्ताओं ने राहुल की इच्छा का सम्मान करते हुये आज “सेवा दिवस” मनाया गरीबों तक मेडिकल किट के साथ राशन पहुंचाने का जिम्मा उठाया। देखने में ये बात छोटी है पर, संवेदनशील हैं। ऐसा कहने का कारण है विगत के सालों में लोग अपनी खुशियां जरूरतमंद लोगों के साथ बांट कर अपना दिन मनाना पसंद करते हैं। राहुल गांधी के साथ इस बात की चर्चा क्यों हो रही हैं?? क्योंकि उनके जैसा संवेदनशील नेता अभी दूर-दूर तक स्वाभाविक रूप से दूसरा नहीं दिखता-

ये प्रश्न स्वाभाविक है, भारतीय राजनीति में राहुल गांधी उन राजनेताओं के बीच में खड़े है , जिन्हें तमाम लोगों की मौत और जन्मदिन की खुशियों में केक काटने से लेकर बड़े आयोजन करते मीडिया के कैमरों ने देखा है। पूर्व मुख्यमंत्रियों को लगातार देखा जाता रहा है ऐसे आयोजनों के आड़ में खुश होते हुये। राहुल गांधी ने इस महामारी के समय में जब करोड़ों लोग दुखी है जिनके अपने बिछड़ गये है। के दुख को समझते हुए उसे महसूस करना और इस तरह से समझना और उसमें शामिल होना संस्कार और व्यक्तिगत इच्छाशक्ति को दिखाता है।

राहुल गांधी कोई करिश्माई नेता नहीं है, ना वो दुसरे नेताओं की तरह बेधड़क झूठ बोलते है, सबसे बड़ी बात है आज जिस तरह से वो डट कर अकेले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टक्कर दे रहे हैं, वो बात नजरअंदाज नहीं कि जा सकती। राहुल देश के प्रधानमंत्री नहीं है, ना तो कांग्रेस सत्ता में है पर कोरोना को लेकर पार्टी और राहुल गांधी के साथ पार्टी के चुनिंदा नेता लगातार सजग होकर सरकार को आग्रह करते रहे हैं, वो देश को समझने की जरूरत है। सरकार देर सवेर उन्हीं उपायों को अमल में ला रही हैं ये अच्छी बात हैं। देश के हितों में जो जरूरी है उसको लागू करना इसपर कोई राजनीति नहीं होनी चाहिये।

राहुल पढ़े लिखें और गरीब तबके के साथ खड़े होने के कारण आलोचना के शिकार होते है तो, ऐसी आलोचना होनी चाहिए जब आप बिना PR और इवेंट मैनेज किये बिना लोगों के साथ सहज होकर मिले। देश को ऐसे ही नेता की जरूरत है, जो सोच सके कि एक जान भी कीमती हैं। हर थाली में अनाज होना जरूरी है जेब में मजदूरों के पैसे जरूरी है, देश का किसान जरूरी है, देश का डॉक्टर जरूरी है, छात्र जरूरी है युवा जरूरी है। इसलिए श्रीनिवासन जैसे युवाओं के साथ कोरोना से निपटने के लिए तैयारी शुरू की गई,जिनसें लोगों ने अपनों की सांसों को बचाने के लिए गुहार लगाई। राहुल गांधी के पास बनियान के विज्ञापन वाला 56 इंच का सीना भले नहीं है, पर फिट और पढ़ा लिखा और जागरूक दिमाग है जिसे लोगों की फिक्र है।

 

पैराशूट लैंडिंग और भिक्षाटन की जगह राहुल पले पढ़े है,
राजनीति के गलियारों में उनके खून में राजनीति होने के वावजूद स्वाभाविक और सहज रहना आकर्षण पैदा करता हैं। कमर्शियल पायलेट होने के साथ पेशेवर है अपने क्षेत्र के।
राहुल गांधी भले प्रधानमंत्री मोदी के “मित्रों” जैसी चाशनी ना लपेट पाये पर बातें सटीक बोलते है जो जनमानस के लिए उपयोगी है, देश को इवेंट मैनेजर नहीं जननेता चाहिए जिसे जनता के साथ जुड़ाव महसूस हो। पिछले 7 साल से राहुल अकेले चुनौती बने हुये है प्रधानमंत्री के साथ पूरे मंत्रिमंडल के लिए, राहुल के एक सवाल का जाबव देने पूरा मंत्रिमंडल उतर आता हैं। ये आसान नहीं जब आपके खुद के पार्टी के लोग मतलब की राजनीति करें और अपनी नकारेपन का ठीकरा भी राहुल के सिर फोड़ने को तैयार हो। सवाल स्वार्थ का नहीं होता तो अमेठी में राहुल को हराने के लिए भाजपा के साथ हाथ नहीं मिलाया जाता। इसी अमेठी के कल्लो के परिवार में पटाखों के कारण हुई मौत पर 2004 में राहुल पीड़ित से मिलने चाटर्ड प्लेन लेकर पहुंचे थे।

 

क्या इतना आसान है राहुल गांधी होना –

सवाल ये हैं कि क्या इतना आसान सफर रहा है, राहुल गांधी का ?? नहीं बिलकुल नहीं राहुल गांधी को आलोचना और भाजपा की गंदी राजनीति का शिकार इसलिए होना पड़ा क्योंकि वो गांधी है, भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पोते और प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बेटे होने के साथ एक ऐसे बेटे हैं जिन्हें अपने पिता की लाश टुकड़ों में मिली। राजनीति अपनी जगह लेकिन सवाल ये है एक बच्चें ने क्या कुछ सुना और महसूस किया जब उसकी मां को लेकर तमाम बातें कही गई, परिवार पर कीचड़ उछाले गये, मीडिया और तमाम तरह से राजनैतिक षड्यंत्र रचा गया ताकि गांधी परिवार का वजूद खत्म हो जाये। राहुल की दाद देनी चाहिए कि उन्होंने भाजपा और संघ के कांग्रेस मुक्त भारत की तरह कोई ओछी बात नहीं की। राहुल ने व्यक्ति की जगह एक स्टैंड लिया विचारधारा के खिलाफ, आरएसएस और सिमी जैसे संगठनों को लेकर राहुल का स्टैंड बहुत लोगों को रास नहीं आया।

परिवारवाद का आरोप का आधार बेबुनियाद है-

कांग्रेस में मौकापरस्त नेता हर समय हावी रहे जिनका आधार ही लालच और स्वार्थ है, ये बात लोगों को चुभ सकती है पर सच है। कांग्रेस कई बार टूटी पर फिर मजबूती से वापस अपने पुराने स्वरूप में आई। जिनकी दाल नहीं गली वो परिवारवाद के आरोपों की बात कहने लगे तो सवाल ये है कि 2004 में राहुल पहली बार जीत कर लोकसभा पहुंचे, उसके बाद 2014 तक कांग्रेस सत्ता में रही किसी ने नहीं रोका था सोनिया गांधी को राहुल को प्रधानमंत्री बनाने से, पर ऐसा नहीं हुआ क्योंकि पार्टी में मनमोहन सिंह जैसे अनुभवी अर्थव्यवस्था के जानकार चुना गया प्रधानमंत्री बनाने के लिए। राहुल गांधी की लोकप्रियता चरम पर थीं, मीडिया और देश के युवाओं में क्रेज़ था। राहुल की सोच और सलाह के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, जतिन प्रसाद, अगाथा संगमा, और अन्य युवाओं को मौका मिला। जो आज पार्टी और राहुल को सवालों के घेरे में खड़े करते नहीं थकते। लेकिन कांग्रेस संस्कारों वाली पार्टी है उद्दन्त नहीं इसलिए यहां मार्गदर्शन मंडल नहीं बना अभी तक।

 

राहुल गांधी की गलती कहा थीं पार्टी का अध्यक्ष बने रहने के दौरान-

गलती यहां वाकई राहुल की थीं, क्योंकि इनमें से बहुत सारे नाम ऐसे थे जिनको अपने बाप के नाम पर पार्टी में इज्जत और अधिकार मिले थे, इनकी नाकामी की वजह से 2014 में पार्टी ने इतनी बुरी हार का स्वाद चखा। लेकिन पार्टी में विचारों की जगह है इसलिए पार्टी में डैमेज चलता रहा कभी एजेंसी का डर दिखा कर तो कभी इनकी खुद की मक्कारी और लालच के कारण। ऐसे में ये बड़ा मजाकिया है जब जतिन प्रसाद जैसा नेता जो अपनी भाभी को पंचायत चुनाव में सम्मानजनक वोट तक नहीं दिलवा पाये ये कहे कि पार्टी ब्राह्मणों की अनदेखी कर रही है। 2017 में इनके सिर माथे है ऊत्तरप्रदेश कि हार भी। जब राहुल ने पार्टी की हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुये 2019 में अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया तो बाकी नेताओं ने क्यों नहीं दिया इस्तीफा। क्यों वो मीडिया के एक धरे के साथ मिलकर पार्टी के खिलाफ बाहर ब्यानबाजी करते रहें। क्या पूरे देश में हार जी जिम्मेदारी अकेले अध्यक्ष की थीं, पार्टी का कोई नेता मोदी फोबिया में अपने घर के ऐसी कमरों से बाहर नहीं निकला बल्कि अभी भी कांग्रेस के अंदर महत्वपूर्ण व्यक्तियों के पास बीजेपी के प्लांटेड लोग काम कर रहे हैं। जो पार्टी को कमजोर करने के काम में लगे हैं।

राहुल ने हमेशा किसानों और जरूरतमंद लोगों की आवाज सुनी है-

ये वहीं राहुल गांधी है जिन्हें 2011 में नोएडा में उत्तर प्रदेश पुलिस ने भट्टा परसौल गांव में गिरफ्तार किया था, जब वह एक राजमार्ग परियोजना के लिए अधिग्रहित की जा रही भूमि के लिए अधिक मुआवजे की मांग कर रहे आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में निकले थे।

 

2015 में भूमि सुधार को लेकर राहुल मुखर रहे। ये वहीं राहुल गांधी है।जिन्होंने अपनी मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली सरकार के खिलाफ 2013 में “दोषी दागी सांसदों के अध्यादेश” पर विरोध किया था। इस अध्यादेश को पहले सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को नकारने के लिए मंजूरी दी थी जिसके कारण दोषी सांसदों को बेदखल किया जा सकता था। ये स्टैंड लेना आसान नहीं।

 

इसलिए विरोधियों को राहुल गांधी खटकने लगे और फिर राहुल के खिलाफ शुरू किया गया एक प्रयोजित कंपेनिंग। क्योंकि राहुल के तेवर भारतीय राजनीति को सूट नहीं करते थे, दागी सांसदों की भरमार तो दोनों तरफ थीं। लेकिन इसकी हवा भी राहुल ने 2019 आते- आते निकाल दी ।

राहुल गांधी हमेशा मुखर रहे हैं महिला अधिकारों और LGBT समुदाय के अधिकारों को लेकर। राहुल महिलाओं के सशक्तिकरण के समर्थक रहे हैं। इसलिए आज प्रियंका गांधी के अलावा पार्टी में भी महिला नेताओं की भरमार हैं।

राहुल महिलाओं के लिए सभी लोकसभा और राज्य विधानसभा सीटों के 33% आरक्षण के हिमायती रहे हैं। राहुल के समर्थन से ये बिल 2010 में राज्यसभा में पारित हुआ लेकिन एभी तक लोकसभा में इसपर वोटिंग नहीं हुई क्योंकि 2014 में सरकार बदल गई।

पार्टी में राहुल के साथ कंधा मिलाकर खड़े एक नई लीडरशिप ने इस कोरोना महामारी में अच्छे से अपना काम पूरा किया है। जिसपर चर्चा जरूरी हैं। और पार्टी को भी राहुल के इस योगदान को पार्टी अध्यक्ष का चुनाव करते समय ध्यान में रखना जरूरी है। ये पार्टी का अंदरूनी मसला है कि किसे चुनें पर अब सावधानी और समझदारी जरूरी हैं। साथ ही थोड़ी सख्ती भी विरोधियों से निपटने के लिए।

देश को एक मजबूत नेता की जरूरत है जो उन्हें केक और खाखडा देने की जगह रोटी देने की सोच रखे। किसानों को सम्मान दे सकें।महिलाओं को सुरक्षा और सम्मान के साथ संविधान की मजबूती दे सके। इन सभी के बीच में राहुल धाराओं के विपरीत बहने की कोशिश कर रहे हैं। विपरीत इसलिए क्योंकि वो रोजगार और शिक्षा की बात करते हैं, हिन्दू मुसलमान की जगह। 51 साल के इस शुरुआत के साथ उम्मीद है अच्छे दिन शुरू होंगे पार्टी के क्योंकि ज्योतिष के हिसाब से भी ये नम्बर शुभ माना जाता है। 5 और 1 जोड़ दे तो अंक आता है 6 जो हार्मोनी और स्थिरता का नम्बर है। तो उम्मीद है पार्टी की धुंध साफ हो और देश को स्थिरता देने के गति और तेज़ हो।

One thought on “SPECIAL- 51 साल के हुये राहुल गांधी, खास क्या है ? धाराओं के विपरीत रुक कर मुकाबला करना ख़ासियत है, इस नये राहुल गांधी की

  1. बहुत ही तथ्यात्मक और बैलेंस, लोगों के जानने पढ़ने लायक लिखा है आपने ,पर अफसोस भक्तों के पास इतना पढ़ने के लिए वक्त ही कहां है..👌

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