महुआ मोइत्रा को दिल्ली HC से झटका, बंगला खाली करने वाले नोटिस के खिलाफ अर्जी खारिज

दिल्ली उच्च न्यायालय ने पूर्व तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने आवंटित सरकारी बंगला खाली करने के लिए भेजे गए नोटिस को चुनौती दी थी। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि मोइत्रा को बंगले में रहने का अधिकार नहीं है क्योंकि उन्हें सांसद के रूप में निलंबित कर दिया गया है। यह दूसरी बार था जब महुआ मोइत्रा ने पिछले साल दिसंबर में अपने निष्कासन के बाद उन्हें भेजे गए निष्कासन नोटिस पर दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा- याचिकाकर्ता के निष्कासन का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने और सरकारी आवास खाली करने के लिए समय बढ़ाने का मुद्दा उससे अभिन्न रूप से जुड़ा होने के साथ-साथ इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि आज की तारीख में याचिकाकर्ता के पास कोई अधिकार नहीं है, यह अदालत विवादित बेदखली आदेश के संचालन पर रोक लगाने के लिए अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने की इच्छुक नहीं है। तदनुसार, आवेदन खारिज किया जाता है।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता को सरकारी आवास का आवंटन उसकी स्थिति के साथ सह-टर्मिनस था, जो उसके निष्कासन पर समाप्त हो गया है। हालाँकि, HC ने मुख्य याचिका को 24 जनवरी, 2024 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।

लोकसभा में प्रश्न पूछने के लिए व्यवसायी दर्शन हीरानंदानी से उपहार स्वीकार करने के आरोप में 8 दिसंबर को उनके निष्कासन के बाद, संपदा निदेशालय (डीओई) ने मुहुआ मोइत्रा को 7 जनवरी तक बंगला खाली करने के लिए कहा था।

इसके बाद तृणमूल कांग्रेस नेता ने डीओई के आदेश को चुनौती देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। हालाँकि, अदालत ने 4 जनवरी को महुआ मोइत्रा को सरकार द्वारा आवंटित आवास में रहने की अनुमति के लिए DoE से संपर्क करने को कहा।

11 जनवरी को डीओई द्वारा महुआ मोइत्रा को दूसरा नोटिस भेजा गया था, क्योंकि वह इस मामले पर अपने पहले नोटिस का जवाब देने की समय सीमा से चूक गईं थीं।

हालाँकि, संपदा निदेशालय (DoE) ने पूर्व सांसद के स्पष्टीकरण को असंतोषजनक पाया कि उन्हें सरकारी बंगले में रहने की अनुमति क्यों दी जानी चाहिए। मंगलवार को महुआ मोइत्रा को एक और नोटिस भेजकर तुरंत सरकारी बंगला खाली करने को कहा गया।

इसके बाद मोइत्रा ने डीओई के उस नोटिस को चुनौती देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जिसमें उनसे तुरंत बंगला खाली करने को कहा गया था। हालाँकि, अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी और कहा कि सरकारी आवास का आवंटन एक सांसद के रूप में उनके निष्कासन के साथ ही समाप्त हो गया।

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