शिव की नगरी और अध्यात्म का शहर बनारस आजकल कुछ अलग तरह की शोर शराबे में डूबा हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये कहकर पूरे देश का ध्यान खींचा की मुझे माँ गंगा ने बुलाया है। चुनाव के पहले की ये स्टंटबाजी काफी हद तक फायदेमंद भी रही। लेकिन तमाम राजनैतिक स्टंट और मार्केटिंग के बीच किए गये पाप अब गगरी भर जाने के बाद बजबजाते हुये ओवरफ्लो हो कर सामने आ रहे है। दूसरी तरफ जातिवादी और आंख नाक कान बंद करके केवल ब्यूरोक्रेसी पर भरोसा करते हुए प्रदेश की सरकार चलाने वाले मुख्यमंत्री आदित्यनाथ सिंह के पूर्वांचल के क्षत्रियों के नाम पर कारस्तानी की कहानी दिल्ली दरबार तक बिना का कान लगाये भी सुनी जा सकती हैं। लेकिन क्या मजाल सिंहासन डोल जाये। क्योंकि 2017 की ब्लैकमेलिंग और सत्ता पाने की उत्कंठा में काठ की हांडी जो चढ़ी उसे उतारने की हिम्मत नहीं…
वाराणसी से बांग्लादेश तक फैले खांसी सिरप “फेनसेडिल” कोडीन के कहर में लोग फंसते जा रहे है। आखिर क्या है ये ??इसका क्या उपयोग है। ये जान लेना जरूरी है। ये वो जहरीली सिरप नहीं जिससे सैकड़ो नवजात बच्चों की जान चली गई।। खांसी के लिए दिए जाने वाले सभी कफ सिरप में “कोडीन गुआइफेनसिन” साल्ट महत्वपूर्ण है। जो उचित डॉक्टरी परामर्श से ही लेनी चाहिए। खास TB के मरीजों को। बनारस में भी इस बीमारी ने बहुत तेज़ी से पैर पसारे है।
खैर वाराणसी वाले कफ सिरप के परार्मश के लिए जो डॉ है वो सभी राजनैतिक पार्टी के गंगाजल में नहा के अपने सारे पाप धो चुके है। इनके ही सहयोग से शुभम जायसवाल जैसे कल के आये लड़के के ऊपर 2000 करोड़ रुपये की संपत्ति बनाने का आरोप है। मात्र 3 से 4 साल में। कौन है ये पवित्र धर्मात्मा जिन पर रोती-बिलखती माँ और बहनों के आंसुओं का कोई असर नहीं उन अजन्मे बच्चों के भविष्य का कोई छत्रप नहीं, जिनके पिता-भाई और पति इस नशे के धंधे की भेंट चढ़ चुके है।
गंगा किनारे उगता ‘फेनसेडिल साम्राज्य’ — सत्ता की छत्रछाया में फैलता ज़हर*
लेकिन ये वो “अमृत” सिरप है जिसमें नशे के करोड़ों रुपये का कारोबार और सत्ता में बने रहने की हनक है। इस काले कारोबार के सांझेदार वाराणसी के 100 से ज्यादा दवा फर्म है, जिनके सहयोग से इस काले कारोबार को पल्वित और पोषित किया गया है। शुभम जायसवाल तो एक चेहरा है। जिसने इस धंधे के उन चेहरों को बेनकाब होने से बचाया हुआ है। आज तक्षकपोस्ट की खास रिपोर्ट उन सभी छुपे चेहरे की पोल खोलेगी जो गुनाहगार है। समाज में जहर घोल कर अपनी तिजोरी भरने के लिए इसमें शामिल लंबी चेन है। जो कई लेयर में है। जिनका काला कारोबार पूरे पूर्वांचल में फैला हुआ है। जिसको टियर-1, टियर-2, टियर-3 करके ऑपरेटिंग सिस्टम का हिस्सा बनाया गया था। इस सिडिकेट कि कमाई 5 हज़ार से 6 हजार करोड़ रुपये में अनुमानित हैं। ये मात्र पूर्वांचल के आंकलन है।
पहले शुभम के पार्टनर चेन को समझे-
शुभम जायसवाल पुत्र भोला जायसवाल, गाय घाट निवासी
प्रशांत उपाध्याय पुत्र धर्मेंद्र उपाध्याय
विशाल राणा, विभोर राणा, दोनों सगे भाई
आसिफ, वसीम, (दिल्ली-दुबई)
अमित गुप्ता
दीपक दुबे ( वाराणसी दवा मंडी)
सिंडिकेट का हवाला ऑपरेटर ( अमित फ्लावर)
राजा दरवाजा बुलानाला।
सिंडिकेट का टियर-1
इस गैंग की कार्यवाही शुरू होती है देश/विदेश के सबसे बड़े महामारी “कोविड” काल 2021 से। जब लोगों की सांसें खत्म हो रही थीं, तब सत्ता का एक पक्ष अपनी जेबें भरने में लगा था। इनका तुरुप का एक्का बनकर आया (Drug Licensing Authority ) नरेश मोहन दीपक। जिसने एबॉट कंपनी के बैनर पर बन रही हिमाचल में “फेनसेडिल” कफ सिरप को कंपनी से बनारस के डिपो और उसके बाद डिस्ट्रीब्यूटर मिलने वाला स्टॉक की सप्लाई चेन बाधित की। छोटे व्यापारियों को लाइसेंस रद्द करने की धमकी दे कर सारा स्टॉक शुभम को देने के लिए कहा। क्योंकि नरेश मोहन दीपक और धनंजय सिंह पूर्व सांसद जौनपुर और उनकी तीसरी पत्नी श्रीकला रेड्डी पंचायत सदस्य रह चुकी है इस धंधे में पार्टनर है। जौनपुर से केपी सिंह, सुधीर सिंह उर्फ पप्पू भौकाली, (चिरईगांव का पूर्व ब्लाक प्रमुख) अमित टाटा का बड़ा भाई ये कहलाता है। अभी चौबेपुर थाने में क्षेत्र में इसी गतिविधियों को लेकर नवंबर के पहले हफ्ते में FIR दर्ज हुई है।इनके अलावा अन्य छुपे चेहरों में अजय सिंह (प्रबंधक महादेव महाविद्याल) अविनाश सिंह उर्फ बेचू इन दोनों ने 2021 इस धंधे में करोड़ों रुपये लगाए है। इसके अलावा सोनभद्र के कोयला खदानों में भी इनकी अय्यासी की कीमत लगी हुई है। अमित सिंह टाटा, अम्बरीष सिंह भोला, के नामों के अलावा वेस्टर्न यूपी के भी एक भाजपा नेता का नाम इस गैंग में है। मुम्बई से उनका पुराना नाता रहा है। बाकी लिस्ट इंद्र के माया जाल जितनी लंबी है।
सिंडिकेट का टियर-2
इसके अलावा इस सिडिकेट में माफिया विनीत सिंह, वाराणसी दक्षिणी विधानसभा MLA नीलकंठ तिवारी, कैबिनेट मंत्री स्वतंत्र प्रभार रविंदर जायसवाल, रविंदर का बड़ा भाई, वीरेंद्र जायसवाल (क्षेत्रीय कार्यवाहक) मिनी PMO से शिव शरण पाठक, बनारस और अब वर्तमान प्रांत प्रचारक अनिल पाशी, भाजपा जिला अध्यक्ष हंसराज विश्वकर्मा, (अबू आजमी की कंपनी में भी दाऊद का पैसा ऑपरेट करने का आरोपी ) कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर, कैंट विधायक सौरभ श्रीवास्तव का बड़ा भाई, पूर्व क्षेत्रीय संगठन मंत्री, रत्नाकर पांडेय, महेश चंद्र श्रीवास्तव, दिवंगत सुनील ओजा (मझवा विधानसभा, गढ़ौली धाम में सिरप का पैसा चैनल में सफेद किया जाता था।) कफ सिरप का असल मास्टरमाइंड भी सुनील ओजा को कहा जाता है। ओजा की मौत संदिग्ध रही जिसे बीमारी का नाम देने काम किया गया। हत्या को बीमारी बताने वाले माफिया का नाम लखनऊ दरबार से जुड़ा है।
एक समृद्ध राज्य के गवर्नर का नाम भी इस सिडिकेट में है। (संवैधानिक पद के कारण उनका नाम नहीं लिखा जा रहा) अजय उपाध्याय (स्वदेशी जागरण मंच), आजकल बिहार झारखंड के दायित्व में, अनुराग सिंह पटेल MLA चुनार, पुष्पराज सिंह, कैबिनेट मंत्री दयाशंकर दयालु, बनारस के कुछ पत्रकार, समेत दर्जनों पुलिस अधिकारी और दवा व्यापारी इस खांसी की गंगा में दवाई पीकर अपने छाती का जलन मिटा रहे है। हरे-हरे नोटों की गड्डियों को संभाल कर।
इस खेल का समय तब खराब हुआ जब मध्यप्रदेश में नकली कफ सिरप की वजह से नवजात बच्चों की जान चली गई, खोजबीन शुरू होने के साथ सर्च अभियान में 1 महीने पहले रॉबर्टसगंज में दवा से भरी ट्रक को पकड़ा गया। जिसमें नकली दवाइयां पाई गई। इसके साथ जुड़े विभोर राणा को उठा कर जब पुलिस ने खातिरदारी की तब जाकर शुभम जायसवाल का नाम सामने आया। इसके पहले शुभम जायसवाल दीवाली पर पोस्टर और मिठाई बांट कर सनसनी फैला चुका था। नरेश मोहन ड्रग इंस्पेक्टर और धनंजय समेत सभी बिजनेस पार्टनर है। तस्वीर नीचे –
हिमाचल एबॉट कंपनी से कोडीन सिरप का माल आता था 160 रुपये प्रति शीशी, ये लोग बाजार में बेचते थे 700 से लेकर 3000 रुपये में रिटेल मार्किट से इस ड्रग को आउट ऑफ स्टॉक किया गया। उसके बाद झारखंड के रास्ते बांग्लादेश को सप्लाई दी गई। जहाँ इस कफ सिरप का इस्तेमाल नशे के लिए नशीली दवाइयों को मिलाकर किया जाता है। इस काम में झारखंड के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता का भी नाम है। शुभम की बेटी शैली के नाम से फर्म रजिस्टर्ड है जो देश से विदेश तक इसके सप्लाई चेन के लिए काम करती है।
हाल फिलहाल एबॉट कंपनी ने “फेनसेडिल” बनाना बंद कर दिया है। ये सब तब जाकर पकड़ में आये जब नकली फेनसेडिल के उत्पादन करना शुरू किया। क्योंकि असली फेनसेडिल में इस्तेमाल किया गया “कोडीन” ईरान से आयत किया जाता है क्योंकि उसकी क्वालिटी अच्छी होती है।
शुभम जायसवाल एंड कंपनी नकली बनाने के खेल में कच्ची निकली शुभम के पास झारखंड में 75 लाख का स्टॉक था, ये एक छोटी संख्या है क्योंकि इस धंधे की अनुमानित लागत 100 करोड़ के ऊपर आंकी गई है। पूरे उत्तर प्रदेश में 3 जोन में बांट कर धंधा फैलाया और चोखा किया गया। क्या बिना राज दरबार के जानकारी में ऐसा हुआ होगा।
वाराणसी पुलिस कप्तान मोहित अग्रवाल दिनभर गाड़ियों का रेला रोकने पर जोर देते है। लेकिन शहर की व्यवस्था संभाल नहीं पा रहे दिन भर उनके आवास कम कार्यालय पर काले कारोबार के दलालों का टोटा लगा रहता है। बैंकों को ये ज्ञान देते है। बड़े ट्रांजेक्शन पर पुलिस को सूचित कीजिये लेकिन सिरप के कारोबार में अंगड़िया सैकड़ों रुपये हेरफेर कर रहे है। लोकल इंटेलिजेंस कहा घोड़े बेचकर सो रही है। पुलिस करोडों रुपये पकड़ कर खुद गायब कर रही है, क्या ये ऐसे ही बैठे होंगे बिना लेनदेन के।
STF भी हवा हवाई बनाई गई है, क्यों नहीं इनमें से को उठाया क्योंकि जातिवादी मुख्यमंत्री के सह पर ही तो हुआ होगा ना। बनारस में दारू व्यापारी जिसे गोली मारी गई थी आरएसएस का आदमी था। मामला खुलने पर लीपापोती हुई।
160 की बोतल 3000 की: बनारस का सिरप सिंडिकेट और राजनीति का नशा
अमित सिंह टाटा की गिरफ्तारी और शुभम जायसवाल के भागने के खेल में कौन सा मास्टरमाइंड है ? ये जांच का विषय है। बरहाल योगी और मोदी के राज में “गंदा है पर धंधा है” !!…..अभी पूरे परवान पर है।
देश भक्ति की उद्घोषणा में अपना फायदा और मुनाफा बनाने की फैक्टरी चल रही है। चीफ सेक्रेटरी पैसे चुराकर टैक्स हेवेन भेज रहे है। बिना बाबा जी के संज्ञान के ? जहाँ उनके बेहद अजीज अधिकारी नौका डूबने की खबर पर भी हायतौबा मचा देते है लेकिन मुग़लसरेबमे दवा व्यापारी की मौत पर चुप्पी साध लेते है। ये सोचने की बात है कि ये सिंडिकेट कितना खतरनाक है।

