चिलचिलाती गर्मी में चुनाव ‘अ’व्यवस्था’

चिलचिलाती धूप, उड़ती धूल, कंधों पर बैग लादे और हाथों में मशीनें साधे चुनाव ड्यूटी में लगे कर्मचारी बॉर्डर पर तैनात किसी सिपाही की तरह बढ़े चले जा रहे हैं। अभी उसने सामग्री और मशीनें ही ली थीं बसों तक पहुँचने की लड़ाई अभी बाकी थी। इस बार व्यवस्था एकदम चुस्त और शासन प्रशासन एकदम मुस्तैद था। पिछली बार से सबक लेते हुए इस बार सीधे मण्डी से बसें उपलब्ध नहीं करवाई गईं। बल्कि विशेष व्यवस्था के तहत जहाँ से बसें मिलनी थी वहां तक पहुँचाने के लिए भी इस बार शटल बसों का इंतजाम किया गया था। तो बस इन शटल बसों की खोज की यात्रा चालू हुई। लोगों का हुजूम बढ़ा चला जा रहा था। सब एक दूसरे से पूछते हुए कदम बढ़ाते रहे। ये विशेष शटल बसें कहाँ से मिलेंगी किसी को रत्ती भर अंदाजा नहीं था। जिससे भी पूछा उसी ने कहा आगे से मिलेंगी। खैर आगे चलते चलते सब मंडी के बाहर जा पहुंचे। वहां तैनात लोगों ने बताया कि चलते जाइये आगे से मिल जाएगी। लोग चलते रहे। माथे से टपक रहे पसीने को बार बार रूमाल से पोंछते लेकिन बढ़ते रहे।

कतारबद्ध, लयबद्ध। कथित रूप से हाई सेक्युरिटी में रखी जाने वाली चुनावी मशीनें सड़क की खाक छानने को मजबूर थीं। ऐसा शायद ही पहले कहीं कभी देखा गया हो कि हजारों की संख्या में मशीनें इस तरह सड़क के किनारे चल रही थीं। खैर वो भी मशीन है। खुली हवा में साँस लेने का मन तो उसका भो करता होगा लेकिन जिम्मेदार लोग न जाने क्यों बेवजह उसे कमरों में बंद करके 24 घंटे निगरानी में रखते हैं | दम न घुटता होगा उसका? जिन मशीनों पर लोकतंत्र की नींव टिकी है उसके अधिकारों का क्या?

अचानक चलते चलते एहसास हुआ कि मंडी से तो बहुत दूर निकल आये हैं। शटल बसें मिलेंगी भी या पैदल ही जाना है। लोग प्रशासन द्वारा की गई इस ऐतिहासिक, अभूतपूर्व, अदभुत व्यवस्था को नमन कर रहे थे। थक कर चूर और गर्मी से निढाल हुए तो सड़क किनारे जिसको जहाँ छाँव मिली वहीँ मशीनें रखकर बैठ गया। अब मंडी गेट से लेकर कई सौ मीटर तक यत्र तत्र सर्वत्र चुनाव कर्मचारी ही दिखाई दे रहे थे। सबकी निगाहें सड़क पर जमीं थीं कि शायद कहीं शटल बस की एक झलक मिल जाये। और सबका जीवन धन्य हो जाये। भीड़ बढ़ रही थी। सूरज ऊपर से तमतमा रहा था जैसे सारी गलती हम ही लोगों की हो। अधिकारियों की गाड़ियाँ आ रही थीं जा रही थीं। चार पहिया गाड़ी जिस पर सवार एक अधिकारी और ड्राईवर यानी कुल जमा दो लोग। शाम होने को थी। आखिरकार जमा भीड़ के सब्र का बाँध टूट पड़ा। अधिकारी की गाड़ी निकलते देख सब बीच सड़क इकठ्ठा हो गये। खूब हो हल्ला हाय हाय हुआ। अब बात अधिकारी की थी तो पुलिस वाले एकदम से एक्टिव मोड में आ गये। एक अधिकारी महोदय को चुनाव ड्यूटी में लगे कर्मचारियों की ये गुस्ताखी नाकाबिले बर्दाश्त हुई। उन्होंने अचानक से सिंघम का रूप धारण कर लिया और लगभग हवा में उड़ते हुए एक कर्मचारी की शर्ट पकड़कर उसे घसीटते हुए किनारे कर दिया। लेकिन दाँव उल्टा पड़ गया। शायद वो वो भूल गये कि ये कानपुर है और ये सिंघम नहीं बल्कि दबंग का इलाका है। खैर उनके इस प्रयास के चलते भीड़ और ज्यादा आक्रोशित हो गई। हालाँकि थोड़ी देर में भीड़ भी ठंडी पड़ गई।

शाम होते होते शटल बसों के दर्शन हुए तो उसमें चढ़ने के लिए मारा मारी होने लगी। आश्रम तक के रास्ते में अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था थी। पूरा रास्ता लगभग वन वे था। यानी अगर दो बसें आमने सामने आ जाएँ तो जाम। कई जगह ऐसे ही जाम से जूझे। एक जगह प्रशासन द्वारा अनाउंस किया जा रहा था कि किसी गाड़ी को ओवरटेक न करें। तभी बगल से सांय सांय करती एक अधिकारी की गाड़ी निकल गई। हालाँकि अनाउंस करने वाले ने तब भी हिम्मत नहीं हारी। वो पूरी निष्ठा के साथ लगा रहा।

दूर तक सिर्फ जमीन ही जमीन जिस पर जमी मोटी धूल की परत जिसमें से आधी हवा में उड़ उड़कर माहौल को बेहद खुशनुमा बना रही थी। यानी हम आश्रम पहुँच चुके थे। आश्रम में नाश्ते पानी का भी पूरा इंतजाम था। चाट, बताशे, आइसक्रीम से सुसज्जित ठेले सबकी सेवा में हाजिर थे। मिट्टी, धूल जैसे natural ingredients मिल जाने की वजह से चाट बताशों का टेस्ट बढ़ा ही होगा। जिसको अपनी पाचन क्षमता की जाँच करनी हो वो इनका स्वाद ले सकता था। मरते क्या न करते दोपहर से भूखे लोग जो होगा देखा जायेगा सोचकर और ईश्वर पर भरोसा रखते हुए इनका स्वाद पूरे चाव से लेने को मजबूर थे। बस से उतरकर जैसे ही पैर जमीन पर रखे तो जैसे लगा रेगिस्तान में आ गये हों। जूते अंदर तक मिटटी में धंस चुके थे। खैर बिना एक पल गंवाए हमने अपनी बस ढूंढी और चढ़ लिए। बस में बैठने वाली चार पार्टियों में से हम दूसरी ही पार्टी थे। यानी हम देर से पहुँचने के बावजूद जल्दी पहुँच गये थे। खैर जल्दी ही बाकी दोनों पार्टियाँ आ गईं। और बस चल दी। हमारे आगे की चलती हुई बसें हमारी सांसों में धूल का मोटा गुबार घोल रही थीं।

समस्याएं तमाम थीं। लेकिन जज्बे में कमीं नहीं थी। बदन थके थे लेकिन कंधे झुके नहीं थे। तमाम झंझावतों को झेलते हुए हम बढ़ चले थे रणभूमि की ओर…लोकतंत्र की आन बान और शान को बढ़ाने के लिए और लोकतंत्र के सबसे बढ़े पर्व को सफल बनाने के लिए…

सह लेंगे तमाम दिक्कतें और हजारों गम
पर लोकतंत्र के महापर्व को मिलकर सफल बनाएंगे हम

स्थान: कानपुर

नितेंन्द्र वर्मा(चुनाव ड्यूटी में लगा एक मतदान अधिकारी)

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