वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर के नवनिर्मित कॉरीडोर का 13 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री एवं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटन कर देने के बाद निर्वाचन आयोग अब कभी भी उत्तर प्रदेश (यूपी), उत्तराखंड, पंजाब, गुजरात, गोआ और मणिपुर की विधान सभाओँ के चुनाव कार्यक्रम की औपचारिक घोषणा कर सकता है। इन सभी छह विधान सभाओ के नए चुनाव कराने का वक्त मौजूदा भारतीय संविधान में तय जिम्मेदारी के कारण उसके ही नहीं बल्कि केंद्र की साढ़े सात बरस इस सरकार के भी सर पर सवार है। वे चाहें भी तो अपना ये सांविधिक बोझ दूसरों के सर पर नहीं लाद सकते हैं। वैसे तो निर्वाचन आयोग को ही इसके कार्यक्रम की आधिकारिक घोषणा करनी है। लेकिन जैसे कि हम पहले देख चुके है मोदी जी के लिए कुछ भी नामुमकिन नहीं है। वह खुद ही कहते हैं ‘ मोदी है तो मुमकिन है’। मई 2021 में बंगाल, असम , केरल , तमिलनाडु और पुडीचेरी की विधानसभाओँ के चुनाव कार्यक्रम भी इस आयोग ने समय का इशारा मोदी जी के सार्वजनिक चुनावी सभा में मिलने के बाद ही की थी। उसे वाराणसी में आयोजित इस सोमवारी सभा के खबरिया टीवी चैनलों से सजीव प्रसारण से साफ इशारा मिल गया होगा कि मोदी जी अब चुनाव के लिए अपनी कमर कस चुके हैं।
स्वाभाविक रूप से मोदी जी, उत्तर प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री अजय सिह बिष्ट उर्फ योगी आदित्यनाथ और उनकी भाजपा ही नहीं ,दोनों को अपने अदृश्य सूत्रों से संचालित कर रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ( आरएसएस ) भी ये चुनाव जीतने के लिए कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ेगा। स्पष्ट हो चुका है कि ये चुनाव जीतने उनकी व्यक्तिगत और सांगठनिक ही नहीं बल्कि उनसे इतर स्तर की भी तैयारी है। ये स्तर वित्तीय ,सियासी ,सामाजिक , धार्मिक ही नहीं सैन्य भी हो सकते हैं। क्यों और कैसे ? हम अपने हफ्तेवार कालम #चुनाव-चर्चा के 17 नवंबर 2021 के अंक में इनकी चर्चा कुछ हद तक कर चुके हैं। आज के अंक में उनकी आगे की चर्चा होगी।
भाजपा के लिए अब अयोध्या के रामबाण से बड़ा चुनावी हथियार काशी का शिव त्रिशूल हो गया है जो उसे देश में सबसे ज्यादा आबादी के सूबा यूपी के अहम चुनाव में आजमाना है। भाजपा को इसमें आरएसएस के स्थापनाकाल से तय लक्ष्य: हिंदुओं का सैन्यकरण और सेना का हिन्दुकरण की प्राप्ति के लिए दोहरा फायदा नजर आता है। इससे चुनाव में उसकी पुरानी सियासी चालों में अव्वल साबित हो चुके सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का भी जोर बढ़ेगा। इसकी प्रतिक्रिया में मुस्लिम पहचान का मुद्दा भी बढ़ेगा। ये भाजपा के लिए और फायदामंद स्थिति हो सकती है। तब उसे इजरायल के सैन्यतंत्र शासन का मॉडल हिंदुस्तानी जमीन पर उतारने के लिए विशाल अवसरवादी मध्यवर्ग का जनमानस तैयार करने में भी बड़ी मदद मिलेगी। ये मदद हथियार और सुरक्षा सेवाएं बेचने वाले इजरायल, आदि देशों की कंपनियों के स्तर पर भी होने की संभावना है।
हिन्दुस्तानी चुनावों में मुस्लिम पहचान-
भारत के चार राज्यों- असम, बंगाल , केरल, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी की विधान सभाओं के मई 2021 के चुनाव में भी मुस्लिम पहचान बड़ा मुद्दा था। इनके मतदाताओ में मुस्लिम नागरिक नगण्य नहीं बल्कि बडी संख्या में हैं। भारत की आजादी के पह्ले से ही और बाद में भी मुस्लिम समुदाय की स्वतंत्र पह्चान की हिफाजत की सियासत करने वाली पुरानी और नई नवेली पार्टियो की भी कमी नहीं है।
भारत की सबसे पुरानी सियासी पार्टी , कांग्रेस जब दिसम्बर 1885 में मुम्बई में बनी थी तब देश पर ब्रिटश हुक्मरानी का औपनिवेशिक राज था. उस राज में 1930 के दशक में नया कानून बनने के बाद हिंदुस्तान में संसदीय लोकतंत्र के नाम पर चुनाव शुरु हो गये थे।
भाजपा समेत सभी दलों ने मुस्लिम मुद्दो को चुनावो में अपने हिसाब से उठाये हैं। इन पार्टियो ने मुस्लिम समुदाय की अन्य सभी धार्मिक समुदायो से बिल्कुल भिन्न समस्याओ के समाधान भी अपने–अपने चुनावी बही-खाता के हवाले से ही बताये हैं।
नई बात ये थी कि भाजपा के ऐलानिया कबूले मातृ संगठन , आरएसएस ने भी मुस्लिम समुदाय को पटाने की ताजा कोशिशे की है. आरएसएस के सरकार्यवाह ( प्रमुख ) मोहन भागवात ने नौ मई को दिल्ली में कुछ मुस्लिम नेताओ की बैठक बुलाकर अवाम के बीच उसे खोओ प्रचारित किया या करवाया. मोदी जी ने भी इन चुनावो के लिये प्रचार के दौरान सुरक्षा घेरा से बाहर निकल एक मुस्लिम मतदाता के गले मिलने की फोटो प्रदर्शित की थी। बहरहाल , उन प्रयासों का कोई खास चुनावी फायदा नहीं होने से अब उसने मुस्लिम वोट पाने का जुगत छोड़ दी है और उसका सारा ध्यान बहुसंख्यक हिन्दू वोट पर केंद्रित हो गया लगता है। ये सब वाराणसी कार्यक्रम के आयोजन से पूरी तरफ साफ हो चुका है। हम उसकी और चर्चा करने से पहले यूपी में उभरे नए सियासी समीकरण का संक्षिप्त जायजा ले लें तो बेहतर रहेगा।
न्यू इंडिया में यूपी-
पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश सिंह यादव के जयंत चौधरी को एक हेलिकप्टर में बिठा पश्चिमी उत्तर प्रदेश मेरठ जिला की रैली में आने का हालिया कदम इस जाट किसान बहुल क्षेत्र में कितना चुनावी गुल खिलाएगा इसकी चर्चा हम अगले अंक में “चौधरी एंड संस यानि चौधरी चरण सिंह”, अजित सिंह, जयंत चौधरी ‘ का लेखा जोखा में करेंगे।
फिलहाल इंगित करना जरूरी है कि अखिलेश सिह यादव पर हिन्दुस्तानी सियासत में ‘ लंबी रेस के घोड़े ‘ माने जाने वाले मराठा नेता शरद पवार ने भी ठप्पा लगा दिया है। उनकी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के साथ मिलकर विधानसभा की कुछे सीट पर चुनाव ही लड़ना चाहती है।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) भी अखलेश यादव के संग आने तैयार लगती हैं। कोई अधिकृत खबर नहीं है। लेकिन उनके सपा के समर्थन में वाराणसी में एक रैली में आने की चर्चा है। गौरतलब है कि यूपी में बांगला भाषी वोटर भी है। टीएमसी ने कुछ अरसा पहले यूपी विधान सभा चुनाव में कुछ सीटों पर प्रत्याशी खड़े किये थे। उनमें एक तराई क्षेत्र में जीतते-जीतते रह गया था।
इन छह में से उत्तर प्रदेश की मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल अगले बरस 14 मार्च को खतम हो रहा है। मोदी जी के गृह राज्य गुजरात का अगले बरस 18 फरवरी, गोवा का 15 मार्च , मणिपुर का 19 , उत्तराखंड का 23 और पंजाब विधान सभा का मौजूदा कार्यकाल 27 मार्च को खत्म हो रहा है। इन तारीखों तक नए चुनाव के जरिए उनकी नई विधानसभा का गठन करने की सांविधिक दरकार है। केंद्र सरकार अगर चाहे तो संसद में प्रस्ताव पारित कर इनके चुनाव कुछ समय के लिए टाल सकती है। लेकिन मोदी सरकार के अब चुनाव टालने का कोई औचित्य नहीं लगता है। दरअसल, मोदी जी वाराणसी में हर हर महादेव का उद्घोष सुनने के बाद यूपी और उसके बाद नई लोकसभा के भी नए चुनाव कराने के सियासी राउंड में आ चुके हैं।




