TP Election Special- बिहार पंचायत चुनाव में पुराना नेतृत्व खारिज, जनादेश नए को

बिहार में सूर्य उपासना महापर्व छठ के दौरान जमीनी लोकतांत्रिक चुनावों की जननी पंचायत चुनाव के निकल रहे परिणामों से साफ है मतदाताओं ने घाघ नेताओं को खारिज कर नया नेत्तृत्व लाने के लिए वोट दिए है।

 

चार दिनों का छठ पर्व सोमवार को बड़ी संख्या में परंपरागत रीति “नहाय खाय ” से शुरू हुआ।इसमें मंगलवार को “खरना “के बाद बुधवार को अस्ताचलगामी सूर्य को मीठे जल की गंगा जैसी नदियों और राज्य भर के तालाबों में खड़े होकर सांध्य अर्घ अर्पण होगा। जलाशयों में गुरुवार को प्रातःप्रहर के अर्घ देने से छठ पर्व की पूजा अर्चना सम्पन्न होगी।

 

 

राज्य निर्वाचन आयोग के ऑफिसियल वेबसाइट <sec.bihar.gov.in> पर बुधवार सुबह तक घोषित परिणामों के फौरी विश्लेषण से उभरे ट्रेंड के मुताबिक अवाम ने अधिकतर जगह नए चेहरे चुने हैं। प्रदेश की राजधानी ,पटना के जिला क्षेत्र की पंचायतों में 36 में 33 पुराने मुखिया चुनाव हार गए। बिहटा और दुल्हिन बाजार प्रखण्ड की पंचायतों में अधिकतर पुराने मुखिया के परास्त होने का ट्रेंड कमोबेश पूरे बिहार में चल निकला है। हिन्दी दैनिक प्रभात खबर की रिपोर्ट है दुल्हिन बाजार में 14 पुराने मुखिया में से सिंघारा कोपा पंचायत के पिछली तीन बार से मुखिया कमरूद्दीन कुरैशी ही जीते और अन्य सभी 13 हार गये। बिहटा में 22 में 20 पंचायतों के नये मुखिया बने हैं।

पद और आरक्षण

भारत के संविधान में 1992 में 73 वें संशोधन अधिनियम के तहत वर्ष 2006 में बिहार पंचायत राज अधिनियम बना। इसके तहत ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, प्रखंड (ब्लॉक) स्तर पर पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद हैं। राज्य में 8386 ग्राम पंचायत, 534 प्रखंड स्तरीय पंचायत समिति और 38 जिला परिषद हैं। ग्राम पंचायत वार्डों में विभक्त हैं , जिनकी पूरे बिहार में कुल संख्या करीब 1.15 लाख है। हर ग्राम पंचायत के साथ ग्राम कचहरी भी कायम है। ग्राम कचहरी भारत में न्याय तंत्र का बुनियादी हिस्सा है और सरपंच के अधिकार किसी मजिस्ट्रेट से ज्यादा नहीं तो बहुत कम भी नहीं हैं।

 

 

इन तीन स्तरीय पंचायत चुनाव में मुखिया और ग्राम कचहरी के सरपंच के साथ ही ग्राम पंचायत के वार्ड सदस्य , ग्राम कचहरी के पंच , प्रखंड पंचायत और जिला परिषद् के सदस्य भी उसी तरह एकल समानुपातिक वयस्क मताधिकार से चुने जा रहे है जो भारतीय संसद और विधान सभाओं आदि लोकतांत्रिक निकायों में लागू है। ये मताधिकार थर्ड जेंडर के बालिग लोगों को भी हसिल है।

 

 

अदालती आदेश के अनुपालन में सरपंच के लिए वोटिंग में विभिन्न प्रत्याशियों के छपे नाम और आयोग से आवंटित चुनाव चिन्ह वाले परंपरागत बैलेट और बॉक्स का ही इस्तेमाल किया जा रहा है।

 

 

बिहार पंचायत राज विभाग के मुताबिक राज्‍य में कुल 8386 ग्राम पंचायत में मुखिया के उतने ही पद के लिए सामान्य श्रेणी से 3772 पद महिलाओ के लिए आरक्षित हैं। अनुसूचित जातियों के वास्ते आरक्षित 1388 मुखिया पदों में इन जातियों की महिलाओं के लिए 562 रिजर्व हैं। अनुसूचित जनजातियों के लिए 92 मुखिया पद होंगे जिनमें 21 महिलाओं के लिए आरक्षित हैं. अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों के लिए आरक्षित 1441 मुखिया पद में से 585 महिलाओं के लिये रिजर्व हैं।

 

 

बिहार में 8386 ग्राम कचहरी में उतने ही सरपंच के लिए महिलाओं के वास्ते 3772 पद रिजर्व हैं. अनुसूचित जातियों के लिए 1388 सरपंच में 562 महिलाओं के वास्ते निर्धारित हैं.अनुसूचित जनजातियों के लिए रिजर्व 92 पद में ही महिलाओं के लिए 21 तय हैं. पिछड़े वर्ग के लिए रिजर्व 1441 सरपंच में महिलाओं के लिए 585 पद निर्धारित हैं. कुल 114733 पंचायत वार्ड सदस्यों में महिलाओं के लिए 51998 पद आरक्षित हैं। अनुसूचित जातियों के लिए वार्ड सदस्यों के निर्धारित 19037 पद में 7469 महिला होंगी। अनुसूचित जनजातियों के लिए सुरक्षित 1223 पद में 300 महिला होंगी। अन्य पिछड़े वर्ग के 18561 वार्ड सदस्यों में 7890 महिला के लिए आरक्षित हैं।

 

प्रखंड पंचायत समिति के सदस्यों लिए कुल 11497 पद में महिलाओं के लिए 5341 आरक्षित हैं। इन 11497 पद में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित किये 1910 में 819 महिलाओं के लिए है। अनुसूचित जनजातियों के लिए 131 पद हैं जिनमें महिलाओं के लिए 35 पर आरक्षण है। पिछड़ा वर्ग के लिए 2049 पद सुरक्षित हैं जिनमें 903 महिला आरक्षण है।

 

जिला परिषद सदस्यों के 1161 पदों में महिलाओं के लिए 548 सुरक्षित हैं। इन सदस्यों के पद में अनुसूचित जातियों के लिए195 आरक्षित हैं। उनमें 87 महिलाओं के लिए रिजर्व हैं। अनुसूचित जनजातियों के लिए 13 पद आरक्षित हैं जिनमें दो महिला भी है। पिछड़ा वर्ग के लिए 217 पद आरक्षित हैं जिनमें 101 महिलाओं के लिए हैं।

जिला पंचायत प्रमुख के कुल 538 पदों के लिए चुनाव में 236 महिलाओं वास्ते हैं। अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित 92 पद में 36 महिलाओं के लिए हैं। लेकिन अनुसूचित जनजातियों के लिए निर्धारित पाँच पद में महिलाओं के वास्ते आरक्षण नहीं है। अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों के लिए आरक्षित 93 पद में महिलाओं के वास्ते 36 निर्धारित है।

जिला परिषद अध्यक्ष के 38 पद के लिए 18 महिलाओं के लिए रिजर्व है। इन 38 पदों में अनुसूचित जातियों के लिए 6 आरक्षित हैं जिनमें महिलाओं की 3 सीट भी है। जिला परिषद अध्यक्ष पदों में अनुसूचित जनजातियों के लिए एक पद आरक्षित है। इसमें महिलाओं के लिए आरक्षण नहीं है। पिछड़ा वर्ग की आरक्षित 7 सीट में से 3 महिलाओं के लिए है।

 

महापर्व छठ

इस बरस के पंचायत चुनाव के दौरान ही बिहार में सूर्य उपासना का महापर्व छठ शुरू हो गया। कोसी, सीमांचल और पूर्वी बिहार के जिलों में छठ महापर्व के बाद पंचायत चुनाव है। प्रत्याशी अपने मतदाताओं को लुभाने पूजन सामग्रियों और साड़ियां के मुफ़्त वितरण आदि के प्रयास कर रहे हैं। कुछ प्रत्याशी श्रद्धालु मतदाताओं तो गंगा स्नान कराने ले जा रहे हैं। कुछ उम्मीदवारों ने व्रतियों के लिए छठ घाट बनवा दिए। वे वहाँ नारियल, सूप, मीठे पकवान और मिठाई बांटेंगे।

वोटिंग

पंचायत चुनाव गैर-सरपंच सभी पदों के लिए मतदान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन ( ईवीएम ) के जरिए 11 चरणों में 26 सितंबर 2021 से कराया गया। कुछ चरणों के परिणाम घोषित हो चुके हैं। अंतिम चरण का चुनाव दिसंबर माह तक पूरा कर लिया जाएगा। पहला चरण 26-27 सितंबर को, दूसरा 1-2 अक्टूबर को, तीसरा 10-11 को, चौथा 22–23 को , 5वाँ 26–27 अक्टूबर को कराया गया। छठे चरण का मतदान 13-14 नवंबर को , 7वाँ 17-18 को , 8वां 26-27 नवंबर को है। 9वाँ चरण 1–2 दिसंबर को ,10वाँ 10–11 को और 11वाँ एवं अंतिम चरण का मतदान 14-15 दिसंबर को कराया जाएगा।

 

पूर्वी बिहार के सहरसा जिला के हमारे गांव और उसके ” बैठ मुसहरी ” पंचायत में वोटिंग चार नवंबर को हो चुकी है जिसमें अनुमानित 60 फीसद मतदाताओं ने अपने वोट डाले। पुरुषों की तुलना में महिलाओं की वोटिंग ज्यादा रही. वोटिंग का यही ट्रेंड कमोबेश हर पंचायत में नजर आ रहा है।

 

 

हमने वोट गांव के सरकारी स्कूल पर बने मतदान केंद्र पर 93 बरस की अपनी मां , माया देवी के वोट डालने के बाद दिया। उन्होनें भारत की आजादी के बाद से हर चुनाव में अपने मताधिकार का उपयोग किया है। इसका एक कारण ये भी है कि मेरे दिवंगत पिता , नारायण झा सहरसा जिला के कलक्टर पद से रिटायर होने के पहले 1952 में लोकसभा के पहले चुनाव में केंद्रीय निर्वाचन आयोग द्वारा नियुक्त करीब 50 चुनाव सुपरवाईजर में शामिल थे। उन्होनें सुपरवाईजर के रूप में और फिर बतौर प्रांतीय प्रशासनिक अधिकारी राज्य में कई जगह कई बार चुनाव कराने में अपने कर्तव्य का निर्वाह कर सभी को मताधिकार का उपयोग करते रहने के लिए प्रोत्साहित किया था।

राज्य के सभी जिलों: बक्सर, अररिया , बांका, अरवल , बेगूसराय , औरंगाबाद, भागलपुर, कटिहार, भोजपुर, किशनगंज, मधुबनी, कैमूर, मधेपुरा, खगड़िया, मुंगेर , गया, मुजफ्फरपुर, गोपालगंज , रोहतास, जमुई ,लखीसराय ,जहानाबाद, वैशाली, दरभंगा, शिवहर, नवादा, शेखपुरा, नालंदा, समस्तीपुर,पटना, सहरसा, सुपौल, पश्चिमी चम्पारण, पूर्वी चम्पारण, सारन, पूर्णिया, सीतामढ़ी और सीवान का मानचित्र संलग्न है।

 

बिहार राज्य निर्वाचन आयोग

यह केन्द्रीय निर्वाचन आयोग से अलग मगर उसी तरह का सांविधिक आयोग है, जिसकी स्थापना बिहार पंचायत राज अधिनियम (1993) के तहत 30 मार्च 1994 को हुई थी।पंचायतों के क्षेत्रों के डीलिमिटेशन, आरक्षण , मतदाता सूचियों की तैयारी, प्रकाशन आदि के लिए चुनाव नियमावलि 1995 में बनी।

 

बैकग्राउंड

भारत की नरेंद्र मोदी सरकार के बनाये तीन कृषि कानूनों की वापसी की मांग को लेकर दिल्ली के सभी बॉर्डर केंद्रों पर 25 नवम्बर 2020 से विभिन्न राज्यों के किसानों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के बीच सीमावर्ती उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव हो चुके हैं। उसमें मोदी जी की फंसी भारतीय जनता पार्टी ( भाजपा) को बिहार में भी तीन स्तरीय पंचायत इसी बरस अप्रैल-मई में कराने के प्रस्ताव को लेकर पसीने छूटने लगे। पंचायत चुनाव कार्यक्रम की औपचारिक घोषणा से पहले इसे कराने के लिए बिहार राज्य निर्वाचन आयोग की तैयारियां तेज कर दी गईं थी। इन तैयारियों के बीच ही राज्य में जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के नितीश कुमार के मुख्यमंत्रित्व में भाजपा और अन्य दलों के नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) गठबंधन सरकार के मंत्रीमंडल के गठन का 81 दिन बाद विस्तार कर दिया गया। तब पंचायत चुनाव विधिक कारणों से नहीं कराए जा सके थे क्योंकि भारत के कानून के तहत ईवीएम का इस्तेमाल करने का अधिकार राज्य निर्वाचन आयोग को नहीं बल्कि सिर्फ केंद्रीय निर्वाचन आयोग को है. मामला अदालत में पहुंचा तो एक रास्ता निकल गया कि ईवीएम का इस्तेमाल सरपंच के चुनाव में नहीं किया जायेगा। चुनाव कराने में देरी का ये बड़ा कारण है।

 

 

हम इस चुनाव के बारे में तब अपने गांव से ही किसी और न्यूज़ पोर्टल पर विस्तार से लिख चुके थे। दिल्ली में करीब छह माह रहने के बाद अपने गांव लौटने पर धान की फसल की कटाई आदि में बहुत व्यस्तता के बीच ये कॉलम पूरा करने में तथ्यात्मक गड़बड़ी तो शायद नहीं हुई होगी लेकिन टाइपो एरर हो सकते हैं। उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

 

 

राज्य निर्वाचन आयोग ने इस बार ऑनलाइन नामांकन के अलावा कोरोना कोविड 19 महामारी से निपटने की केंद्र सरकार की गाइडलाइन के अनुसार व्यवस्था भी की। पंचायत चुनाव में पहली बार इलेक्टॉनिक वोटिंग मशीन ( इवीएम ) का प्रयोग किया गया। ये चुनाव दलगत आधार पर नहीं काराये जाते हैं। आयोग ने 19 फरवरी को ही मतदाता सूची का अंतिम तौर पर प्रकाशन करने के निर्देश दे दिए थे। सभी जिलों में 24 फरवरी तक मतदाता सूची का प्रकाशन कर दिया गया।

 

व्यक्तिगत

हम खुद पूर्वी बिहार के सहरसा जिला के 151 पंचायत में से सोनबरसा प्रखंड के बैठ मुसहरी पंचायत के वोटर हैं। इसके प्रथम मुखिया बसनही गाँव वासी हमारे बाबा एवं स्वतंत्रता सेनानी मुक्तिनाथ झा थे। वे कई दशक तक मुखिया रहे और कुछ वर्ष पहले दिवंगत हुए। वे बिहार के प्रथम निर्वाचित स्नातक मुखिया थे और पहले स्कूल हेडमास्टर थे। उनके दूर के रिश्ते के पौत्र और इसी गाँव के स्नातक शिशिर झा दो बार मुखिया चुने गए, जिनके पितामह के भ्राता शम्भूनाथ झा बिहार से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक सर्चलाइट, इंडियन नेशन, दैनिक प्रदीप और आर्यावर्त के सम्पादक रहे। वह बिहार विधान परिषद के सदस्य भी थे और संयुक्त विधायक दल की मिलीजुली सरकारों के दौर में 1960 के दशक में समाजवादी नेता बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की 13 दिन टिकी राज्य सरकार में मंत्री भी रहे।

 

 

पंचायत के मुखिया अभी रामलगन यादव है। पंचायत का नाम अधिसंख्यक मुसहर अनुसूचित जाति के आधार पर रखा गया। पंचायत में करीब पांच हजार वोटर हैं जिनमें अन्य पिछड़े वर्ग की जातियों और ब्राम्हण के अलावा बड़ी संख्या में संथाल आदिवासी भी बसे हुए हैं। पंचायत में शिक्षा का स्तर संतोषजनक है। बसनही गाँव में चार स्कूल है जिनमे से एक हमारे पिता और मां के नाम से बने भवन ” नारायण झा माया देवी ” कुटीर में संचालित वो ज्ञान प्रभा स्कूल भी है जिसमे गांव के ही बेरोजगार युवक पढ़ाते हैं।

 

पंचायत चुनाव में बेरोजगारी बड़ा मुद्दा है। स्वास्थ्य , शिक्षा आदि के मुददे और भी बहुत हैं मगर प्रत्याशियों ने उन पर ज्यादा ध्यान केंद्रित नहीं किया। मसलन 1960 के दशक के बाद राज्य में पहली बार पंचायत चुनाव के ऐन पहले गांवों में खेती और रिहाइस की जमीन का सरकारी भू सर्वे पूरा हुआ। इससे बहुत विवाद उत्पन्न हुए हैं जो कोर्ट कचहरी में पहुंचेंगे। ये विवाद ग्राम कचहरी में भी सुलझाए जा सकते हैं। लेकिन निर्वाचित घोषित सरपंचों को भूमि कानूनों की बुनियादी जानकारी भी देने के लिए सरकार की तरफ से अभी तक तो कोई पहल नहीं हैं। राज्य की नितीश कुमार सरकार जमींदारी उन्मूलन के बाद के उस अहम काम ” व्यापक भूमि सुधार ” के प्रति भी उत्सुक नजर नहीं आती है जिसके लिए रिजर्व बैंक की मंगलम कमेटी ने आगाह किया था. पूर्वी भारत के सभी राज्यों में कृषि संकट दूर करने के उपाय सुझाने के लिए बनाई उस विशेषज्ञ कमेटी की बरसों पहले की वो रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है।

 

 

पंचायत की आबादी का बड़ा हिस्सा बिदेसिया मजदूर के रूप में कृषि एवं निर्माण कार्यों में मजदूरी करने पंजाब, हरियाणा और दिल्ली जाता है। पंचायत चुनाव में दिल्ली बॉर्डर पर किसानों के प्रदर्शन का भी असर पड़ा ।

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