ज्ञानेन्द्र पाण्डेय: लोकसभा के अध्यक्ष और राज्य सभा के सभापति ( देश के उपराष्ट्रपति भी ) ने अपने – अपने सदनों के पीठासीन अधिकारियों की हैसियत से दोनों सदनों के नेता विपक्ष को यह बता दिया है कि संविधान प्रदत्त कोई प्रावधान न होने की वजह से संसदीय समितियों की वर्चुअल बैठक नहीं की जा सकती।
राज्य सभा सचिवालय ने कुछ दिन पहले ही उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति के कार्यालय से जारी इस आशय की जानकारी से संसद के उच्च सदन में नेता विपक्ष की भूमिका का निर्वाह कर रहे कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडगे को सूचित कर दिया है। इसी तरह की सूचना से लोकसभा सचिवालय ने भी सदन में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका का निर्वाह कर रही कांग्रेस पार्टी के नेता अधीर रंजन चौधरी को भी अवगत करा दिया है। पीठासीन अधिकारियों के इस फैसले का मतलब यही हुआ कि जब तक दोनों सदन संसद सत्र के दौरान होने वाली खुली बैठकों में अपने – अपने हिस्से की सदनीय नियमावली में इस आशय का संशोधन कर नए नियम का प्रावधान नहीं कर लेते तब तक संसद की किसी भी समिति की वर्चुअल बैठक नहीं हो सकती।ऐसा तब तक नहीं हो सकता जब तक राष्ट्रपति की तरफ से संसद के सत्र का आह्वान न किया जाए और संसद सत्र में इस आशय का कोई संविधान संशोधन विधेयक पारित न कर दिया जाए। ऐसा करना इसलिए जरूरी होगा क्योंकि हमारे संविधान में आपात स्थिति में संसद के किसी सदन अथवा संसद की किसी भी समिति की वर्चुअल या डिजिटल बैठक कराने का कोई प्रावधान नहीं है।
मसलन हमारे संविधान में तब यह व्यवस्था भी नहीं की गई थी, कि लोकसभा में विश्वास मत प्रस्ताव के साथ ही कभी अविश्वास मत लाने की जरूरत भी पड़ सकती है इसलिए संसदीय नियमों में यह व्यवस्था नहीं की जा सकी कि अविश्वासमत प्रस्ताव पर लोकसभा में किस नियम के तहत चर्चा की जा सकती है। इसी तरह कश्मीर को लेकर भी संविधान सभा की बैठकों में कई बातों पर चर्चा नहीं हो सकी थी इसलिए कई बातें छूट भी गई और इन सभी पहलूओं को संशोधन के जरिये या फिर संविधान में राष्ट्रपति को प्राप्त अधिकारों के आधार पर इनमें समय समय पर बदलाव किए जाते रहे हैं। समय के हिसाब से पड़ने वाली जरूरतों को पूरा करने की गरज से ही भारतीय संविधान में उसको लागू करने के बाद से लेकर अब तक के पचास साल की अवधि में सैकड़ों संशोधन किये जा चुके हैं। संविधान संशोधन का यह सिलसिला अभी तक थमा नहीं है और हर लोकसभा के कार्यकाल में औसतन पांच से लेकर दस तक संविधान संशोधन होते ही हैं। संसदीय समिति की वर्चुअल बैठक का मसला भी इसी तरह संविधान संशोधन के जरिये सुलझाया जा सकता था क्योंकि कोरोना के मसले पर संसद की आपात बैठकों का आयोजन तो हुआ लेकिन इस मसले पर कोई बात नहीं हो सकी।इस सम्बन्ध में दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि संसदीय समितियों की बैठक में गोपनीयता भंग होने का खतरा इसलिए भी नहीं संभव नहीं है क्योंकि संसदीय समितियों की वर्चुअल बैठक को सार्वजनिक करने की बात किसी ने भी और कहीं भी नहीं की है।
