कोविड19-विपक्ष की मांग, संसदीय समितियों की वर्चुअल बैठक हो ! संसद के पीठासीन अधिकारियों ने कहा संविधान में नहीं हैं कोई प्रावधान !

 

ज्ञानेन्द्र पाण्डेय: लोकसभा के अध्यक्ष और राज्य सभा के सभापति ( देश के उपराष्ट्रपति भी ) ने अपने – अपने सदनों के पीठासीन अधिकारियों  की हैसियत से दोनों सदनों के नेता विपक्ष को यह बता दिया है कि संविधान प्रदत्त कोई प्रावधान न होने की वजह से संसदीय समितियों की वर्चुअल बैठक नहीं की जा सकती।

 

राज्य सभा सचिवालय ने कुछ दिन पहले ही उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति के कार्यालय से जारी इस आशय की जानकारी से संसद के उच्च  सदन में नेता विपक्ष की भूमिका का निर्वाह कर रहे कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडगे को सूचित कर दिया है। इसी तरह की सूचना से लोकसभा सचिवालय ने भी सदन में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका का निर्वाह कर रही कांग्रेस पार्टी के नेता अधीर रंजन चौधरी  को भी अवगत करा दिया है। पीठासीन अधिकारियों  के इस फैसले का मतलब यही हुआ कि जब तक दोनों सदन संसद सत्र के दौरान होने वाली खुली बैठकों में अपने – अपने हिस्से की सदनीय नियमावली में इस आशय का संशोधन कर नए नियम का प्रावधान नहीं कर लेते  तब तक संसद की  किसी भी समिति की वर्चुअल बैठक नहीं हो सकती।ऐसा तब तक नहीं हो सकता जब तक राष्ट्रपति की तरफ से संसद के सत्र का आह्वान न किया जाए और संसद सत्र में इस आशय का कोई संविधान संशोधन विधेयक पारित न कर दिया जाए। ऐसा करना इसलिए जरूरी होगा क्योंकि हमारे संविधान में आपात स्थिति में संसद के किसी सदन अथवा संसद की किसी भी समिति की वर्चुअल  या डिजिटल बैठक कराने का कोई प्रावधान नहीं है।

 

गौरतलब है कि कोरोना संक्रमण की वजह से पिछले साल मार्च के महीने से लेकर इस साल मई के इतने दिनों के बीच की करीब सवा साल की अवधि में संसद की स्थायी समितियों की एक भी बैठक नहीं हो सकी है। संसद के दोनों सदनों के विपक्षी नेताओं ने केंद्र सरकार के साथ ही लोकसभा अध्यक्ष और राज्य सभा के सभापति से संसदीय समितियों की वर्चुअल बैठक कराने का अनुरोध करीब एक महीने पहले किया था। उसी के जवाब में  लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति के कार्यालयों से यह जानकारी दोनों सदनों के विपक्षी नेताओं को उपलब्ध कराई गई है ..प्रसंगवश एक उल्लेखनीय बात यह भी है कि लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने तो यह कह कर पल्ला झाड लिया कि संविधान में इस तरह से संसदीय समिति की बैठक कराने का कोई प्रावधान नहीं है इसलिए जब तक इसके लिए नियमों में बदलाव नहीं किया जाता तब तक ऐसा करना संभव नहीं होगा। इसके साथ ही दोनों पीठासीन अधिकारियों ने गोपनीयता के नियमों का सहारा लेते हुए भी संसदीय समितियों की वर्चुअल बैठक कराने में असमर्थता व्यक्त की है। इस समबन्ध में दो बातों पर गौर करने की जरूरत है .पहली बात यह है कि जब देश के संविधान का निर्माण हो रहा था तब ऐसी असंख्य मान्यताओं को इसका हिस्सा नहीं बनाया जा सका था क्योंकि तब संविधान निर्माताओं को नहीं लगता था कि इनकी कभी भविष्य में जरूरत हो भी सकती है।
मसलन हमारे संविधान में तब यह व्यवस्था भी नहीं की गई थी, कि लोकसभा में विश्वास मत प्रस्ताव के साथ ही कभी अविश्वास मत लाने की जरूरत भी पड़ सकती है इसलिए संसदीय नियमों में यह व्यवस्था नहीं की जा सकी कि अविश्वासमत प्रस्ताव पर लोकसभा में किस नियम के तहत चर्चा की जा सकती है। इसी तरह कश्मीर को लेकर भी संविधान सभा की बैठकों में कई बातों पर चर्चा नहीं हो सकी थी इसलिए कई बातें छूट भी गई और इन सभी पहलूओं को संशोधन के जरिये या फिर संविधान में  राष्ट्रपति को प्राप्त अधिकारों के आधार पर इनमें समय समय पर बदलाव किए जाते रहे हैं। समय के हिसाब से पड़ने वाली जरूरतों को पूरा करने की गरज से ही भारतीय संविधान में उसको लागू करने के बाद से लेकर अब तक के पचास साल की अवधि में  सैकड़ों संशोधन किये जा चुके हैं। संविधान संशोधन का यह सिलसिला अभी तक थमा नहीं है और हर लोकसभा के कार्यकाल में औसतन पांच से लेकर दस तक संविधान संशोधन होते ही हैं। संसदीय समिति की वर्चुअल बैठक का मसला भी इसी तरह संविधान  संशोधन के जरिये सुलझाया जा सकता था क्योंकि कोरोना के मसले पर संसद की आपात बैठकों का आयोजन तो हुआ लेकिन इस मसले पर कोई बात नहीं हो सकी।इस सम्बन्ध में दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि संसदीय समितियों की बैठक में गोपनीयता भंग होने का खतरा इसलिए भी नहीं संभव नहीं है क्योंकि संसदीय समितियों की वर्चुअल  बैठक को  सार्वजनिक करने की बात  किसी ने भी और कहीं भी नहीं की  है।
संसदीय समितियों की बैठकों का आयोजन इसलिए जरूरी है, क्योंकि इन्हीं  समितियों की बैठकों में संसदीय कामकाज किसी भी तरह के हंगामे तथा पक्ष – प्रतिपक्ष के बीच किसी तरह के गैर जरूरी वाद – विवाद के बिना आम सहमति से और शांतिपूर्वक संपन्न हो जाता है। संसदीय लोकतंत्र में संसद की स्थायी समितियां कामकाज की दृष्टि से कितनी महत्वपूर्ण होती हैं, इसका अंदाजा इस एक बात से लगाया जाता है कि जब हर साल बजट पर चर्चा के लिए संसद के बजट सत्र के दौरान लगभग एक माह के लिए संसद के दोनों सदनों की कार्रवाई अस्थायी रूप से स्थगित रहती है तब अलग – अलग मंत्रालयों से सम्बंधित संसदीय स्थायी समितियों की बैठकों  में उस मंत्रालय के बजटीय प्रावधानों पर चर्चा होती है। स्थाई समितियों की बैठकों में सीमित संख्या में सदस्य भाग लेते हैं इसलिए हर मुद्दे पर चर्चा हो जाती है और आपत्ति के बिदुओं पर आम सहमति भी बन जाती है। इन बैठकों में सदस्य पार्टी हित से उपर उठ कर भाग लेते हैं इसलिए आपसी विवाद की कोई गुंजाइश भी नहीं रहती। समितियों में सभी पार्टियों का समानुपातिक योगदान होता है इसलिए इसे मिनी संसद की कार्रवाई भी कहा जाता है। हमारे देश में स्थाई समितियों की शुरुआत दसवीं लोकसभा से हुई थी जब शिवराज पाटिल लोकसभा के अध्यक्ष थे। तत्कालीन लोकसभा के एक पत्रकार सांसद इन्द्रजीत ने सबसे पहले संसद की स्थायी समितियों का मसला संसद में उठाया था। अभी हमारे यहाँ 22  स्थाई समितियां है। इनमें 15 के अध्यक्ष लोकसभा के सांसद हैं और 7 के अध्यक्ष राज्य सभा के सांसद हैं।

 

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