सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को चुनाव आयोग को सभी मतदान केंद्रों पर मतदान प्रतिशत पर अंतिम डेटा प्रकाशित करने का निर्देश देने की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि मामले की सुनवाई लोकसभा चुनाव के बाद होनी चाहिए। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की अवकाश पीठ ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया के बीच में एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।
पीठ ने कहा, “कल छठे चरण का चुनाव है। हमारा मानना है कि इस मामले की सुनवाई चुनाव के बाद होनी चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट गैर सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें मतदान के 48 घंटों के भीतर लोकसभा चुनाव में डाले गए वोटों की संख्या सहित सभी मतदान केंद्रों पर मतदान का अंतिम और प्रमाणित डेटा प्रकाशित करने की मांग की गई थी।
इसके लिए फॉर्म 17सी को सार्वजनिक करने के निर्देश देने की मांग की गई थी। 17सी वो फॉर्म है, जिसमें एक पोलिंग बूथ पर डाले गए वोटों की संख्या दी होती है।
इस मामले में दो दिन पहले चुनाव आयोग ने कहा था कि वेबसाइट पर हर मतदान केंद्र के वोटिंग प्रतिशत का डेटा सार्वजनिक करने से चुनाव मशीनरी में गड़बड़ी हो जाएगी। ये मशीनरी पहले ही लोकसभा चुनावों के लिए काम कर रही है। आयोग ने कहा था कि “पूरी जानकारी देना” और फॉर्म17सी को सार्वजनिक करना वैधानिक फ्रेमवर्क का हिस्सा नहीं है। इससे पूरे चुनावी क्षेत्र में गड़बड़ी हो सकती है। इन डेटा की तस्वीरों को मॉर्फ़ किया जा सकता है।
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील दुष्यंत दवे से पूछा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद यह याचिका दायर क्यों की गई? हम बहुत तरह की जनहित याचिकाएं देखते हैं कुछ पब्लिक इंटरेस्ट में होती हैं कुछ पैसे इंटरेस्ट में होती हैं! लेकिन हम आपको ये कह सकते हैं कि आपने यह याचिका सही समय और उचित मांग के साथ दायर नहीं किया है।
चुनाव आयोग ने कहा, “याचिका केवल संदेह और आशंका पर आधारित है। चुनाव कराना एक कठिन काम है, इसमें ऐसे निहित स्वार्थों को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।”
आयोग के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह याचिका सुनवाई के योग्य नहीं है। चुनाव आयोग की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील मनिंदर सिंह ने कहा कि लोकसभा चुनाव के दौरान लगातार आयोग को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। जबकि एडीआर की तरफ से दवे कहा कि 2019 की याचिका और मौजूदा अर्जी में बहुत अंतर है। जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम देखेंगे।
चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि आशंकाओं के आधार पर फर्जी आरोप लगाए जा रहे हैं। जबकि हाल ही सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला दिया था जिसमें तमाम पहलू स्पष्ट हुए थे। आयोग ने याचिकाकर्ता पर आरोप लगाया कि कहा कि सुबह फैसला आता है और शाम को वही लॉबी नया मुद्दा लेकर आयोग को बदनाम करने में जुट जाती है। इस अर्जी को भारी जुर्माने के साथ खारिज किया जाना चाहिए।
आयोग ने कहा कि नियम के मुताबिक फॉर्म 17C को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। 26 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले से पहले सुनवाई के दौरान सभी पहलू चर्चा में आए थे। आयोग ने कहा कि बारंबार यह लॉबी आयोग की छवि खराब करने और चुनावी प्रक्रिया को लेकर भ्रम फैलाने में जुटी है। जबकि 329B अनुच्छेद में साफ है कि चुनाव के दौरान ऐसी अर्जी पर सुनवाई नही हो सकती है।
चुनाव आयोग ने अपने प्रेस नोट में चुनावी प्रक्रिया में आशंकाओं और भ्रम फैलाने को लेकर स्थितियों को स्पष्ट किया था। आयोग ने कहा था कि फॉर्म 17C को स्ट्रॉन्ग रूम में रखा जाता है। 5 से 6 प्रतिशत का फाइनल डेटा में फर्क है।आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि लोकसभा चुनाव के दौरान ऐसी अर्जी सुनवाई योग्य नहीं है। लगातार कुछ लोगों द्वारा चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाया जा रहा है। लोगों को भ्रमित किया जा रहा है।
आयोग ने कोर्ट से कहा कि यह याचिकाएं इस कारण भी हो सकती हैं कि हाल ही में मतदान प्रतिशत में गिरावट आई है, क्योंकि ये केवल भ्रम पैदा करते हैं। चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की ओर से प्रक्रिया की निगरानी के लिए लगभग 8 लाख लोग इस प्रक्रिया में भाग ले रहे हैं।
जस्टिस दत्ता ने कहा कि यहां 2019 की याचिका में अलग अर्जी में नई मांग की गई है। यह कैसे हो सकता है? फिर आपके आवेदन चुनाव आयोग के प्रेस नोटों पर आधारित हैं। आज यदि कोई मुकदमा दायर किया जाता है और मुकदमे के लंबित रहने के दौरान बाद के घटनाक्रम होते हैं, तो यदि अदालत कार्यवाही की बहुलता से बचना चाहती है तो अदालत को मुकदमे में और क्या कदम उठाने चाहिए। इसके बाद क्या अदालत अंतरिम में कुछ आदेश दे सकती है, जो एक अन्य याचिका में अंतिम मांग है। आगे आपने यह अर्जी क्यों दायर की। 2019 और 2024 की मांग के बीच क्या समानता है और यदि आप कहते हैं कि समानता है तो याचिका में संशोधन किया जाना चाहिए था।
आयोग ने कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा कहा जाता है कि आयोग ने घटिया जवाबी हलफनामा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया है। बेंच ने सुप्रीम कोर्ट से पूर्व के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव के दौरान प्रक्रिया में बेजा दखल नहीं दिया जाना चाहिए।
एडीआर की तरफ से सिंघवी ने अप्रत्याशित परिस्थितियों के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी मांग की जा सकती है। दवे ने कहा कि राजनीति में अपराधीकरण आदि को एडीआर द्वारा ही सामने लाया गया।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमने यह भी नोट किया था। हमने केवल यह कहा कि उस एक याचिका की प्रामाणिकता संदेह में है।
याचिका के अनुसार, लोकसभा चुनाव के पहले दो चरणों के मतदान के आंकड़े क्रमशः मतदान के 11 और 14 दिनों के बाद प्रकाशित किए गए थे।
याचिका में कहा गया कि अंतिम मतदान प्रतिशत डेटा जारी करने में इस “अत्यधिक” देरी के साथ-साथ पांच प्रतिशत से अधिक के असामान्य रूप से उच्च संशोधन ने उक्त डेटा की शुद्धता के बारे में चिंताएं और सार्वजनिक संदेह बढ़ा दिया है।
इसमें कहा गया, “डेटा की आसान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए, निर्वाचन क्षेत्र और मतदान केंद्र के अनुसार पूर्ण संख्या और प्रतिशत में मतदान के आंकड़ों का एक सारणीबद्धकरण भी किया जाना चाहिए।”
इससे पहले 17 मई को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को मतदान प्रतिशत डेटा जारी करने में देरी के खिलाफ एक याचिका पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया था।
