केरल से उत्तराखंड तक बारिश की आपदा का आतंकी सफ़र

सागर और पर्वत दो अलग – अलग तरीके से महानता के प्रतीक बनते हैं . एक की महानता उसकी गहराई से नापी जा सकती है और दूसरे की महानता उसकी विराट उंचाई से। सागर गहरा होता है और पर्वत ऊँचा और विराट। ” क्षमा बड़न को चाहिए ” जैसे सूत्रवाक्य को चरितार्थ करते हुए ये दोनों ही अपनी गहराई और उंचाई की महानता के चलते दुनिया की सारी बुराइयों को आत्मसात कर उन्हें अच्छाइयों में बदल कर इस दुनिया को वापस कर देते हैं।

पर्वत से नदियाँ निकलती हैं जो हजारों किलोमीटर का सफ़र तय करते हुए सागर में समा जाती हैं। अपनी इस विराट यात्रा में नदिया तमाम तरह की गन्दगी अपने में समा लेती हैं। सागर का पानी धुप की गर्मी से मानसून के बादल के रूप में पहाड़ों से टकराकर बारिश का पानी बनता है और इसी पानी के पहाड़ पर जम जाने से बर्फ बनती है और बर्फ का यही पानी गर्मी में पिघल कर नदियों के रास्ते फिर सागर में पहुँचता है।
पर्वत और सागर के बीच प्रकृति का यह चक्र अनवरत चलता रहता है। बिन पानी सब सून की कहावत पर ध्यान दें तो कह सकते हैं कि इंसान ही नहीं तमाम प्राणी जगत के जीवन के लिए जरूरी पानी के दो मुख्य स्रोत सागर और पर्वत ही हैं नदियाँ इनके बीच की ही कड़ी हैं। इस पृष्ठभूमि में सागर और पर्वत को उनकी गहराई और उंचाई की वजह से महान माना जाता है। इसीलिए जब समुद्र के तटवर्ती इलाके में रहने वाले से पूछा जाता है की किसकी तरह महान बनना चाहता है तो उसका जवाब होता है कि सागर की गहराइयों जितना महान बनना चाहता है।
इसी तरह पर्वतीय क्षेत्र का निवासी कोई भी व्यक्ति हिमालय की तरह महान बननाचाहता है। सागर सब कुछ अपने में समेत लेने की ताकत रखता है लेकिन किसी से कोई शिकायत नहीं करता। उसी तरह पर्वत हर तरह के थपेड़े सहता है लेकिन उसे भी किसी से कोई शिकायत नहीं होती। जाहिर है इन दोनों से ज्यादा महान कोई नहीं हो सकता। मौजूदा सन्दर्भ में केरल सागर का और उत्तराखण्ड  पर्वत का प्रतिनिधित्व करता है।
विचित्र विडंबना है कि विगत कुछ वर्षों से भारत के ये दोनों राज्य  मूसलाधार बारिश , भूस्खलन और इस जैसी अलग – अलग तरह की प्राकृतिक विपदाओं का सामना लगातार कर रहे हैं। अभी दो – तीन साल पहले ही केरल में भयानक बारिश आपदा के रूप में प्रकट हुई थी। कुछ – कुछ वैसा ही इस साल एक बार फिर हुआ है। इसी तरह उत्तराखण्ड केदारनाथ इलाके में 2012- 13 में विनाशाक जल आपदा आइ थी जिसमें बड़े पैमाने पर जान और माल का नुक्सान हुआ था। इसके कुछ साल बाद 2020 में ही चमोली जिले के तपोभूमि इलाके में प्राकृतिक आपदा ने भारी नुक्सान किया था, और अब इस साल अक्टूबर के महीने की बेमौसम बारिश ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया। प्रकृति की यह विनाश लीला देश के उन दो राज्यों में हो रही है।
जिन्हें अलग – अलग सन्दर्भों में  देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है। देवताओं की भूमि में इस तरह के कहर का मतलब यह हुआ कि देवता इस इलाके के लोगों से नाराज हैं। उनकी नाराजगी की वजह जाननी बहुत जरूरी है। विशेषज्ञों की माने तो देवता अपने इलाके के पहाड़ , नदी ,जल , जंगल और जमीन  जैसी अलग अलग प्राकृतिक संपदा के अवैध और अवैज्ञानिक तरीके से अंधाधुंध दोहन से नाराज हैं और कई बार की चेतावनी के बाद भी जब इंसान जागा नहीं तो प्रकृति का कहर इस तरह की आपदाओं के रूप में सामने आ रह़ा है। विकास की  विनाशकारी गतिविधियों के चलते केरल और उत्तराखण्ड  राज्यों को प्राकृतिक विनाश का यह रूप देखना पड़ रहा है। इस विपदा के बाद मौसम विभाग ने उत्तराखंड में अगले 48 घंटे का अलर्ट भी जारी किया था। उधर, केरल में भी मूसलाधार बारिश ने प्रदेश में भीषण तबाही मचाई । इसी बारिश ने साल 2021 के  सितंबर महीने में महाराष्ट्रगुजरातउप्रबिहार और असम  समेत देश के कई राज्यों में भी कहर बरपाया था। मुंबई में बारिश का आंकड़ा  3,000 मिमी के पार बारिश का पहुंच गया।
 कोरोना की मार से अभी केरल उबरा भी नहीं था कि भीषण बारिश के चलते आई बाढ़ ने इसकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।

केरल में बारिश के साथ ही भूस्खलन की वजह से इस तबाही को बढ़ाने में और मदद मिली है। केरल के कोट्टायम और इड्डुक्की आदि जिलों के पहाड़ी इलाकों में वर्ष 2018 की विनाशकारी बाढ़ जैसे हालात बने हैं। नदियां खतरे के निशान को पार कर गई हैं। हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। हालांकि संकट की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने हाईअलर्ट जारी कर दिया है। राज्य सरकार के अनुसार तो अभी तक 36 लोगों की ही मौत हुई हैलेकिन कहा जा रहा है कि वहां मरने वालों की तादाद इससे कहीं अधिक हो सकती है। वहीं लापता लोगों की संख्या अभी तक स्पष्ट नहीं है। कोट्टायम के कोट्टिकल इलाके में मरने वालों की तादाद सबसे ज्यादा है।असल में केरल और उत्तराखंड में अचानक आई इस बाढ़ को वैज्ञानिक बादल फटने की घटना से जोड़कर देख रहे हैं।कोचीन स्थित विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने भी इस बात की पुष्टि की है कि इसके पीछे छोटे बादलों का फटना अहम वजह है।  समाचार एजेंसी पीटीआई  के मुताबिक केरल के पश्चिमी घाट का ऊंचाई वाला पहाड़ी इलाका भूस्खलन की दृष्टि से अति संवेदनशील है। कोट्टायम और इड्डुक्की जिले के सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में केवल दो घंटे के भीतर ही पांच सेमी से अधिक बारिश हुई है। मौसम विभाग की भी मानें तो एक छोटी सी अवधि में पांच से 10 सेमी की बारिश छोटे बादलों के फटना से ही होती है।

 

 

भारी बारिश के चलते कोट्टायमइड्डुक्कीत्रिशूर आदि जिलों में रेड अलर्ट और तिरुवनंतपुरमकोल्लमकोङिाकोड और वायनाड में आरेंज अलर्ट जारी किया गया है। 

 

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