ज्ञानेन्द्र पाण्डेय: आठ चरणों में होने वाले पश्चिम बंगाल विधान सभा के चुनाव में इस बार अजीबोगरीब परिणाम देखने को मिल सकते हैं। इस बार तृणमूल कांग्रेस के मुकाबले पर वाममोर्चा या कांग्रेस नहीं बल्कि केंद्र और देश के आधे से ज्यादा राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा है। भाजपा इस बार किसी भी कीमत में बंगाल फतह करना चाहती है। अगर भाजपा नेता अपने इरादों में सफल हो गए तो देश के पूर्वी और पूर्वोत्तर के इलाकों में उनकी पार्टी अपनी पकड़ मजबूत बना सकेगी। पूर्वोत्तर के असम समेत कई राज्यों में भाजपा अथवा सहयोगी दलों की सरकारें पहले से ही वजूद में हैं। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाए रखने के लिए असम के साथ ही बंगाल पर भी भाजपा काबिज होना चाहती है। बंगाल महज चुनाव की दृष्टि से ही नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी देश का एक महत्वपूर्ण राज्य है। ब्रिटिश शासन के समय से ही इस राज्य का राजनीतिक महत्त्व बना हुआ है। इसके एतिहासिक और राजनीतिक महत्त्व के चलते ही अंग्रेजों के समय में बीसवीं सदी के तीन दशक तक कोलकाता ही देश की राजधानी थी। गौरतलब है कि ब्रिटिश हूकूमत ने 1911 में ही कोलकाता के स्थान पर दिल्ली को देश की राजधानी बनाने का फैसला ले लिया था लेकिन राजधानी के लिए आधारभूत ढांचा खड़ा करने में लगने वाले समय के चलते इसके बीस साल बाद साल 1931 में कोलकाता के स्थान पर देश की राजधानी विधिवत दिल्ली देश स्थानांतरित कर दी गई थी। इतने महत्वपूर्ण राज्य में भाजपा अपनी स्थापना के चार दशक के कार्यकाल में कुछ ख़ास नहीं कर पाई थी लेकिन इस बार भाजपा एक ही बार में सब कुछ पा लेना चाहती है। इसीलिए इस चुनाव के लिए जारी पार्टी के घोषणा पत्र में वो तमाम वायदे भी किये गए हैं जिनकी पहले कभी कल्पना भी नहीं की गई थी। भाजपा अपना मुख्य मुकाबला तृणमूल कांग्रेस से ही मानती है।
सत्तारूढ़ तरीन मूल पहले ही अपना घोषणा पत्र जारी कर चुकी है लिहाजा कहा जा सकता है कि बंगाल में तृणमूल कांग्रेस बनाम भाजपा की चुनावी लड़ाई तेज हो गई है ।
