एक साल का हो गया है पर्यावरण दिवस पर लाया गया काला कृषि कानून अध्यादेश-ज्ञानेन्द्र पाण्डेय

 

दिवस जात नहीं लागहिं बारा, मतलब ! समय कब और कैसे निकल जाता है पता ही नहीं चलता . यही वजह है कि देखते ही देखते किसानों पर लगाम लगाने के लिए लाया गया राष्ट्रपति का वो अध्यादेश भी एक साल पुराना हो गया जिसे  साल 2020 को  विश्व पर्यावरण  दिवस ( 6 जून } के दिन केंद्र सरकार ने अमल में लाना शुरू किया था और बाद में संवैधानिक जरूरत के अनुरूप सितम्बर के महीने में संसद के दोनों सदनों से इसके स्थान पर लाये गए विधेयक पारित कर राष्ट्रपति की  स्वीकृति से इसे देश के एक अधिकृत क़ानून का दर्जा दे दिया गया था ।

 

पिछले साल यह अध्यादेश लागू होने के साथ ही पंजाब , हरियाणा और कई अन्य राज्यों के किसानों ने स्थानीय स्तर पर इसके खिलाफ आन्दोलन शुरू कर दिया था और जैसे ही सितम्बर में इस आशय के विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित कर दिए गए थे, तब किसानों का गुस्सा अपने राज्यों से बाहर निकल कर देश की राजधानी दिल्ली और इसके आसपास के दूसरे  राज्यों तक भी सुनाई और दिखाई और सुनाई भी देने लगा था। किसान विरोध का यह राष्ट्रव्यापी सिलसिला ही था कि पंजाब , हरियाणा और उत्तर प्रदेश से लगी दिल्ली के बॉर्डर्स पर  किसानों को इन  कानूनों के खिलाफ धरना देते हुए 6 महीने से भी ज्यादा का समय हो गया है लेकिन किसान मांग पूरी न होने तक धरने पर डटे  रहने को अडिग हैं।

 यही कारण है कि पिछले दिनों  जब उनके जन्म दिन के मौके पर  किसान नेता राकेश टिकैत से यह पूछा गया कि किसानों को  आन्दोलन  करते हुए 6 महीने तो हो गए , यह आन्दोलन अब और कितनी देर तक चलेगा तो उनका यह दो टूक जवाब था , “2024 तक जारी रहेगा किसान आन्दोलन , कृषि कानूनों को हटा कर ही घर वापस लोटेंगे किसान “.दरअसल किसान और सरकार एक दूसरे की बात न मामने के लिए अड़ गए हैं।

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किसानों की जायज मांगों को न माँगना सरकार अपना हक समझ बैठी है और रोज इसी जुगाड़ में लगी रहती है कि कैसे उनका धरना हटाया जाए . उधर किसानों का साफ़ मनाही है कि जब तक किसान विरोधी काले क़ानून वापस नहीं ले लिए जाते उनका धरना ख़त्म नहीं होगा। किसानों की मांगे इसलिए जायज़ कही जा सकती हैं, क्योंकि सरकार की तमाम सदिच्छा के बादजूद नए किसान कानूनों से किसानों का नुकसान हो रहा है और देश के चंद थैलीशाहों  की थैलियाँ भर – भर के मोटी ही होती जा रही हैं।

 

सरकार के अड़ियल रुख के बावजूद किसान नेताओं को भरोसा है कि एक दिन सरकार को किसानों के पक्ष में फैसला देना ही होगा। किसान नेता राकेश टिकैत की माने तो किसानों को भी धरना अधबीच छोड़ कर घर जाने की कोई जल्दबाजी नहीं है क्योंकि किसानी – खेती के निराई , गोड़ाई , बिजाई , सिंचाई , सफाई , कटाई , उड़ाई  और छिजाई जैसे सभी काम समय पर हो रहे हैं और इसी के समान्तर धरने में भी बारी – बारी से अलग – अलग गाँव के किसान आ रहे रहे हैं , थोड़ी बहुत दिक्कत जरूर है लेकिन 6 महीने में किसानों घर और धरना स्थल के कामकाज बहुत तरीके से संभाल लिए हैं व्यवस्था कुछ ऐसी बन गई है कि अन्नंत काल तक भी धरने को जारी रखा जा सकता है।

 

 

कृषि कानूनों को लेकर चल रही तकरार के बीच किसानों का यह आन्दोलन इतना व्यवस्थित और घरेलू सा लाहने लगा है कि अब किसान नेता अपना और अपने निकट सम्बन्धियों का जन्म दिन ही नहीं बल्कि , लोहड़ी , होली दिवाली जैसे त्यौहार भी धरना स्थल पर ही मनाने लगे हैं। उनके लिए धरना स्थल दूसरा घर ही हो गया है। इसीलिए तमाम किसान नेता यह कहने लगे हैं कि अगर उन्हें लोकसभा के अगले चुनाव 2024 तक भी यहाँ बैठना पड़े तो चिंता की कोई बात नहीं है किसान नेता राकेश टिकैत ने विगत शुक्रवार 4 जून को धरना स्थल पर ही अपना जन्म दिन मनाते हुए जब आन्दोलन के 2024 तक चलने की बात की थी तब किसी को आश्चर्य नहीं हुआ था। क्योंकि अब आन्दोलनकारी ताकतें और सरकार दोनों ही पक्ष इसे एक नियति ही मान चुके हैं।

 

फिर भी एक उम्मीद आन्दोलनकारियों को है कि लोकसभा के  चुनाव .से पहले सरकार किसानों की मांग मान लेगी और किसान अपने घर चले जाएँगे। इस आशावादिता की एक बड़ी वजह तो यह भी हो सकती है कि आम चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी को हो सकने वाले नुकसान से बचने के लिए सरकार क़ानून वापस ले ले। इसके पीछे एक वजह यह भी बताई जा रही है कि जब यही सरकार एक समय इन्ही कानूनों को डेढ़ साल के लिए निलंबित रखने पर सहमत थी तो फिर राजनीतिक लाभ के लिए उस सरकार को उसे वापस लेने में भी कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। कम से कम किसान नेता राकेश टिकैत को तो ऐसा ही लगता है। उनको ऐसा इसलिए भी लगता है क्योंकि जनता ने किसान कानूनों को लेकर अब पक्का मन बना लिया है।

 

जनता इन्हें वापस लिए बगैर मानेगी नहीं। गौरतलब है कि विगत 5  जून 2021 को ” कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य संवर्धन और सुविधा अध्यादेश – 2020 को लागू हुए एक साल का समय पूरा हो गया। अध्यादेश की अवधि समाप्त होने से पहले ही संसद के दोनों सदनों की स्वीकृति मिलने के बाद  27 सितंबर 2020 को यह कानून बना और नवंबर से तीनों कृषि कानून के खिलाफ आंदोलन शुरू हो गया।

 

 25 नवंबर के बाद से आंदोलन उग्र हो गया। 26 मई को इस आन्दोलन ने  छह माह  पूरे कर लिए। इस हिसाब से यह  यह अब तक का सबसे बड़ा किसान आंदोलन है।इस बाबत लाये गए विधेयक को लोकसभा ने 17 सितम्बर 2020 को और राज्यसभा ने 20 सितंबर को राज्यसभा  ने पास किया था। इसी विधेयक के विरोध में शिरोमणि अकाली दल ने केंद्र की राजग सरकार और गठबंधन से भी अलग होने का फैसला लिया था।  संसद के दोनों सदनों से पास होने के बाद  तीनों कृषि विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद  27 सितंबर को क़ानून बन गए थे।

 

 

तभी से देश भर में किसान आन्दोलन जारी है जिसकी शुरुआत पंजाब और  हरियाणा से हुई थी। इस दौरान किसान संगठन और मोदी सरकार के बीच 11 बार बातचीत हुई, लेकिन वो भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंची। आंदोलन के छह महीने पूरे होने पर किसान संगठनों ने विगत  26 मई को काला दिवस भी मनाया था। किसान आन्दोलन के इस दौर में सरकार ने पहली बार एक दिसंबर को केंद्र सरकार ने किसानों को बातचीत के लिए बुलाया, जो बेनतीजा रही।

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इससे पहले पंजाब में विरोध के दौरान ही 14 अक्तूबर, 2020 को किसानों और सरकार की पहली बार वार्ता हुई थी। तीसरी बैठक तीन दिसंबर को हुई, लेकिन बेनतीजा रही. इसके बाद पांच दिसंबर, से लेकर 22 जनवरी तक कई दौर की बातचीत किसानों के साथ हुई लेकिन सभी बातचीत बेनतीजा ही रहीं।

 

 केंद्र की मोदी सरकार के साथ 11 दौर की वार्ता के सफल न होने पर किसान संगठन ने 26 जनवरी को दिल्ली में ट्रैक्टर रैली निकालने की चेतावनी दी। गणतंत्र दिवस के दिन बड़ी संख्या में ट्रैक्टर-ट्रॉली पर पहुंचकर किसानों ने विरोध जताया, जिसे कभी नहीं भूला जा सकता। जब पूरी दिल्ली में किसानों के हजारों ट्रैक्टर दौड़े थे। इससे पहले भी दिसंबर और जनवरी में किसानों की भीड़ हजारों की संख्या में यूपी गेट पर जमी रही। किसान संगठनों ने दिल्ली में 26 जनवरी की ट्रैक्टर रैली के लिए पुलिस से इजाजत मांगी।

 

दिल्ली पुलिस और किसान संगठनों के बीच हुई वार्ता में आउटर रिंग रोड पर रैली निकालने की अनुमति मिली। पुलिस ने टैक्ट्रर रैली के लिए बाहरी दिल्ली के रूट तय किए, लेकिन आंदोलनकारियों में से कुछ लोग उग्र हो गए। दिल्ली के आईटीओ, लालकिला, नांगलोई समेत दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में हुई हिंसा और उपद्रव हुआ। इस दौरान लाल किले पर धार्मिक झंडा भी फहराया गया, जिसे लेकर काफी विवाद हुआ।

 

इसके बाद  26 जनवरी की घटना के बाद किसान आंदोलन में यू-टर्न आया. उपद्रवियों के खिलाफ मामले दर्ज होने के बाद गिरफ्तारियां भी हुईं। 26 जनवरी को हुए उपद्रव के बाद दिल्ली पुलिस ने 59 मामले दर्ज, 158 किसान गिरफ्तार किए गए। घटना के बाद आंदोलन से कई किसान संगठनों ने 27 जनवरी को अपने आपको अलग कर लिया, जिसमें किसान नेता वीएम सिंह भी शामिल थे। एक बार तो ऐसा लगने लगा था कि कहीं  भारतीय किसान यूनियन  भी आन्दोलन से किनारा न कर ले  लेकिन 28 जनवरी की शाम होते-होते पूरा माहौल ही बदल गया। राकेश टिकैत की आंख से निकले आंसुओं ने आंदोलन को दोबारा से जिंदा कर दिया।

 

 

 इसके बाद किसान आंदोलन ने दिल्ली की सीमा तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि तमाम राज्यों में पहुंच गया। यही नहीं यह  आंदोलन देश में  ही नहीं बल्कि दुनिया भर के लोगों के आकर्षण का केंद्र भी बना। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई नामचीन हस्तियां किसान आंदोलन के  समर्थन में खुल कर सामने आ गयी थीं, पार्यावरण की चिंताओं को लेकर जागरूक रहने वाली बाल सामाजिक कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने किसान आंदोलन के पक्ष में ट्वीट कर वैश्विक बिरादरी का ध्यान इस तरफ खींचा। ग्रेटा की इस पहल में टूलकिट नाम का एक डॉक्यूमेंट शेयर हो गया था। टूलकिट को लेकर देश में बहस छिड़ गई कि यह सब भारत के लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए किया जा रहा है।

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अजीबोगरीब बात यह है कि पिछले 6 महीनों के दौरान किये गए बातचीत के  बेनतीजा दौर के बाद आखिरकार मामला देश की सुप्रीम अदालत तक पहुंचा और अदालत ने 11 जनवरी को कृषि कानूनों पर रोक लगाने के आदेश दिए थे। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 12 जनवरी को बातचीत से समाधान निकालने के लिए चार सदस्यीय कमेटी बनाई, जिससे किसान नेता भूपिंदर सिंह मान ने इससे खुद को अलग कर लिया था। इस तरह से कमेटी में कृषि विशेषज्ञ अशोक गुलाटी, डॉ. प्रमोद कुमार जोशी और अनिल धनवत शामिल रहे.इस तीन सदस्यीय  एक बंद लिफ़ाफ़े में अपनी गुप्त रिपोर्ट  कमेटी ने इस बाबत करीब 85 किसान संगठनों के साथ बातचीत के बाद तैयार अपनी रिपोर्ट मार्च 2021 को ही सुप्रीम कोर्ट में जमा कर दी थी। कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के चलते चलते इस मामले में 5 अप्रैल को होने वाली  सुनवाई नहीं हो सकी है. फिलहाल मामला अभी लंबित ही  है ।

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