क़ानून बनाने से हल नहीं होगी भारत की जनसंख्या विस्फोट की समस्या

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ  ने रविवार  11 जुलाई 2021 को जनसंख्या दिवस के मौके पर राज्य सरकार की नई जनसंख्या नीति( 2021 – 30 ) की घोषणा कर एक अच्छा सन्देश दिया है। देश में सभी लोगों को उचित शिक्षा , भर पेट भोजन , रहने को मकान ओढ़ने – बिछाने – पहनने को कपड़े , रोगों से बचाव के लिए अच्छे और अस्पताल और ऐसी ही तमाम बुनियादी सुविधाएं समय से और पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों , इसके लिए  जनसंख्या पर नियंत्रण सबसे पहले जरूरी है। देश की आबादी जितनी कम होगी , देश के लोगों को  उतनी ही अधिक सुविधाएं मिल पाएंगी और हम प्राकृतिक संसाधनों का मौजूदा पीढ़ी के लिए अधिक से अधिक मात्रा में उपयोग करने के साथ ही आने वाली पीढ़ीयों के लिए भी प्राकृतिक संसाधनों का भण्डार  पर्याप्त मात्रा में छोड़ कर जा सकते हैं।

अगली पीढ़ी के लिए  प्राकृतिक संसाधनों का कोई अभाव
न हो इसके लिए प्राकृतिक संसाधनों के वैज्ञानिक तरीके
से दोहन और उपयोग करने के अलावा जनसँख्या पर नियंत्रण भी बहुत जरूरी है। इस पृष्ठभूमि में देखें और विचार करें तो कोई भी सरकार जो आबादी में रोक के ऐसे क़ानून बनाती है , उन कानूनों का स्वागत किया जाना चाहिए और आइसे क़ानून बनाने वाले मंत्री – मुख्यमंत्री के प्रति आभार भी व्यक्त किया जाना चाहिए।
ऐसी कोशिशों को किसी भी तरीके के धार्मिक , साम्प्रदायिक अथवा राजनीतिक नजरिये से न देख कर राष्ट्रीय विकास के नजरिये से देखा जाना चाहिए। मुख्यमंत्री योगी की इस कोशिश को  इसी नजरिये से देखा भी गया है। यही कारण है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री शरद पवार समेत देश के कमोबेस सभी बड़े नेताओं ने इस पहल का स्वागत करते हुए मुख्यमंत्री योगी का समर्थन भी किया है। जनसंख्या का विस्फोट विकास में बाधक है तथा इससे समाज का कोई भी तबका अछूता नहीं रह सकता चाहे वो हिन्दू हो , मुसलमान या फिर किसी भी अन्य  धर्म का  ही मानने वाला क्यों न हो। इसलिए यह कहना तो बहुत बचकानी और बेवकूफी भरी बात होगी कि जनसंख्या को नियंत्रित करने के संदर्भ में इस देश में लाया गया कोई भी कानूनी प्रावधान किसी एक धर्म विशेष के लोगों को नजर में रख कर लाया गया है।
आज से कई दशक पहले हिंदी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार  हरिशंकर परसाई का एक लेख किसी हिंदी पत्रिका में प्रकाशित हुआ
था। जिसमें उन्होंने हिंदुत्व का डंका पीटने वाले कुछ संगठनों
की इस असत्य दलील पर प्रहार किया था कि मुस्लिम परिवारों
में एक से अधिक स्त्रियों के साथ विवाह करने की परंपरा से हिन्दुओं की आबादी का अनुपात कम हो रहा है और उसी अनुपात में मुस्लिम आबादी में इजाफा हो रहा है। व्यंग्य के माध्यम से ही सही पहले तो श्री परसाई ने हिन्दू – मुस्लिम आबादी के इस बेतुके और घटते – बढ़ते अनुपात पर चोट करते हुए स्पष्ट किया था कि देश की  आजादी के बाद के तीन दशक में ऐसा कोई आंकड़ा भारत सरकार की तरफ से अधिकृत रूप से जारी नहीं किया गया जिसमें आबादी को लेकर ऐसी कोई बात कही गई हो।
श्री परसाई ने अपने उस व्यंग्य लेख में  इसके साथ ही एक बात यह भी कही थी कि मान भी लें कि ऐसा हुआ है फिर भी हिन्दुओं की संख्या में कमी की बात इसलिए भी नहीं की जा सकती क्योंकि इतिहास में जब कभी हिन्दू – मुस्लिम दंगों का जिक्र हुआ है उसमें एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य यह है कि जब कभी भी ऐसे हादसों में नुकसान उठाने की बात आई है नुकसान हिन्दू समाज के दलित और पिछड़े ताबको का ही हुआ है।
इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि हिन्दुओं का साधन संपन्न सवर्ण ब्राहमण और ठाकुर ताआआब्क तो खुद को आइसे किसी सामाजिक संघर्ष से दूर राखता है लेकिन अपने हितों की पूर्ती के लिए पाने ही धर्म के दलित , पिछड़े और कमजोर तबकों के लोगों को संघर्ष में फंसा देता हैं। ऐसे में अगर हिन्दू आबादी के नुकसान के नाम पर समाज के जिस तबके को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है वो तबका और कोई नहीं बल्कि दलित और पिछड़ा हिन्दू ही है जिसके साथ उसके अपने ही धर्म के सवर्ण लोग इंसान जैसा व्यवहार तक नहीं करते  प्रसंगवश यह जानकारी भी बहुत महत्वपूर्ण है कि ज्यादातर दलित और पिछड़ा हिदू सवर्ण ठाकुर और ब्राह्मण की हिंसा का ही शिकार होता किसी मुस्लिम या आन्या धर्म की अनुयायी का नहीं। इसलिए यह कहना कुछ ठीक नहीं लगता कि जनसंख्या के अनियंत्रित रहने से हिन्दू घाटे में रहेंगे ..
केंद्र और देश के अनेक राज्यों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने  अपने शासन के उत्तरप्रदेश और असम जैसे कई राज्यों में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर क़ानून बनाए हैं और अन्य राज्यों में इस तरह का क़ानून बनाने की तैयारियां भी चल रही हैं इसी तरह की कोशिश भाजपा के कुछ सांसद राज्यसभा में जनसँख्या नियंत्रण मामले में निजी विधेयक लागू करने की तैयारी कर
रहे हैं। संसद का मॉनसून सत्र 19 जुलाई से शुरू होने वाला है। भाजपा के राकेश सिन्हा समेत अनेक भाजपा सांसदों ने इस मामले को लेकर अलग – अलग निजी विधेयक तैयार का उनका प्रारूप राज्यसभा सचिवालय के पास भेजा है।
बहुत उम्मीद है कि मानसून सत्र शुरू होने के बाद पहले ही शुक्रवार की कारवाई में ये निजी संसद के उच्च सदन में पेश किये जा सकते हैं। निजी विधेयक संसद के किसी सदन से पास तो नहीं होता लेकिन विधेयक के स्वरूप को लेकर सदन में आपसी सहमति हो तो ऐसे किसी विधेयक को पेश करने वाले सांसद द्वारा वापस लेने के बाद सरकार की तरफ से पेश किया जाता जाता है और पर्याप्त चर्चा के बाद इसे पारित भी कर दिया जाता है। सांसदों के निजी विधेयक को संसद से पारित करने की यही व्यवस्था दोनों सदनों में एक समान तरीके लागू होती है।
हमारे संसदीय इतिहास में अभी तक ऐसे 14 निजी विधेयक क़ानून बने हैं  कहने का मतलाब यह है कि धार्मिक नजरिये से एक निश्चित लक्ष्य निर्धारित कर केंद्र और कई  राज्यों की सरकारें जनसँख्या को नियंत्रित करने की गराज से क़ानून बनाने की कोशिश में लगी हुई हैं लेकिन एक सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है कि क्या क़ानून बनाने से जनसँख्या की समस्या हाल हो जायेगी . . दिलचस्प बात यह भी है कि 1970 के बाद से संसद ने ऐसा कोई निजी विधेयक पारित नहीं किया है। हमारी संसद ने ऐसा पहला विधेयक कांग्रेस के पूर्व सांसद स्वर्गीय फिरोज गांधी प्रेस बिल के रूप में अपनी ही सरकार के विरोध में लाये थे जिसे सरकार ने बाद में अपने बिल के रूप में पेश कर संसद से पास करवाया था।

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