प्रयागराज की राजनीति में आधी आबादी का दम

प्रयागराज: समय ने सच में करवट बदली है और महिलाओं ने राजनीति के क्षेत्र में तेजी से कदम आगे बढ़ाया है। बल्कि यूं कहें कि महिलाएं अब राजनीति में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कदमताल कर रही हैं तो गलत नहीं होगा। हालांकि महिला सशक्तीकरण के दावे अभी जमीन पर उतने नहीं दिखाई देते जितना मंच पर गोष्ठियों, सेमिनारों और सभाओं में भाषणों में दिखाई देते हैं ‌‌।ऐसा नहीं है कि महिलाओं की जमीन पुरुषों ने तैयार की है,वरन हर क्षेत्र में महिलाओं ने ही अपनी जमीन खुद तैयार की है। महिलाओं को जब भी मौका मिला है उन्होंने पूरे जज्बे से अपना कमाल दिखाया है। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी के नारे बेटी हूं लड़ सकती हूं का इस बार उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में असर दिखने की सम्भावना है। एक तरह से कांग्रेस ने चालिस प्रतिशत महिलाओं को टिकट दे कर एक राजनैतिक दांव चला है। प्रयागराज मंडल में भी कांग्रेस ने महिलाओं को कई टिकट दिया है। प्रयागराज मंडल की राजनीति में महिलाओं की खासी दखल है। यहां से महिलाओं ने संसद से लेकर विधानसभा और महापौर तक अपना दबदबा बनाया है। केंद्र में मोदी सरकार में मंत्री अनुप्रिया पटेल का भी प्रयागराज से गहरा नाता है।
लेकिन बसपा ने अपने मंडल में जो 11 उम्मीदवार घोषित किए हैं उसमें एक भी महिला प्रत्याशी नही है। जबकि बसपा प्रमुख मायावती खुद महिला है और बराबर महिलाओं की वकालत भी करती हैं। महिला सशक्तीकरण की भी बात करती है।ऐसे में उनकी नीति पर सवाल उठ रहे हैं। वह राजनीति में महिला आरक्षण की भी बात करती है। ऐसे में ये दावे बेमानी से लगते हैं।तो आईए हम प्रयागराज मंडल की महिला राजनीति पर गौर करें। ‌
काबिले गौर है कि बहुजन समाज पार्टी ने 2007 और 2012 के चुनाव में शहर पश्चिमी से महिला प्रत्याशी पूजा पाल पर दांव लगाया था और वह चुनाव जीती भी थीं। 2007 में उन्हें सर्वाधिक 56198 और 2012 के विधानसभा चुनाव में 71114 वोट मिले थे। अपने पति राजू पाल की हत्या से उन्हें सहानुभूति तो मिली ही थी, महिला होने के नाते उनके पक्ष में क्षेत्र की महिलाएं भी आ गई थीं। कुछ इसी तरह से 2017 के विधानसभा चुनाव में सोरांव विधानसभा सीट से गीता पासी को पार्टी ने प्रत्याशी बनाया तो उन्होंने भी 60079 वोट खींचे। यह बात अलग रही कि गीता चुनाव जीत नहीं सकीं लेकिन वह दूसरे नंबर तक पहुंच गई थीं। अब 2022 के चुनाव में कहीं से भी महिलाओं को प्रत्याशी न बनाए जाने से बसपा की किरकिरी भी होने लगी है।
प्रयागराज मंडल के चुनावी आंकड़े बताते हैं कि यहां राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं की अच्छी खासी दखल है। इसकी जुबानी विधानसभा के आंकड़े भी कह रहे हैं। 2012 और 2017 के चुनाव में प्रयागराज में महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत पुरुषों की तुलना अधिक है। वहीं 2017 के चुनाव में नीलम करवरिया प्रयागराज की मेजा विधानसभा से विधायक हुईं। विजमा यादव, प्रमिला त्रिपाठी, गीता पासी, ऋचा सिंह, पूजा पाल समेत लगभग डेढ़ दर्जन महिलाओं ने चुनाव में अपना भाग्य आजमाया था। 2019 के लोकसभा चुनाव में पहली बार इलाहाबाद और फूलपुर सीट से महिला सांसद हुईं थी। अभिलाषा गुप्ता नंदी लगातार दो बार से महापौर हैं। रेखा सिंह कई बार जिला पंचायत की कुर्सी पर काबिज हो चुकी हैं। इससे पूर्व में भी महापौर, जिला पंचायत अध्यक्ष, विधायक और सांसद पद का मान महिलाएं बढ़ा चुकी हैं।
आंकड़े बताते हैं कि  2007 के चुनाव में पुरुषों का मतदान महिलाओं से अधिक था। अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बार महिलाएं मतदान प्रतिशत में आगे रहने की हैट्रिक लगा सकती हैं।आज सारी पार्टियां महिलाओं को अपने पाले में लाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही हैं।मतदान प्रतिशत को बढ़ाने के लिए चुनाव आयोग इस बार भी कड़ी मेहनत कर रहा है।

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