“सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है”
कहने को राहत इंदौरी साहब ने काफी कुछ कह दिया लेकिन देश की राजनीति और धुरी को हमेशा हिंदुस्तान अपने अब्बा की जागीर ही लगी इसलिए पूर्वोत्तर के नागरिकों को कभी रंग भेद तो कभी नस्लीय छींटाकशी और कटाक्ष का सामना करते देखा गया है। इस बार मामला सर्फ कटाक्ष का नहीं बल्कि एक सैनिक के बेटे का हिंसक तरीके से मार दिए जाने का हैं।
एक युवा जिसके आंखों में भविष्य के सपने थे जज़्बा था जीने का, उसे दिनदहाड़े ना सिर्फ मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया बल्कि हिंसक तरीके से हमला करके मरने के लिए छोड़ दिया गया। 17 दिनों तक जिंदगी और मौत की जंग लड़ते हुये अपने आखिरी सांस में अपने शब्दों में भी युवा एंजल ये साबित करने में लगा था, “मैं गर्वित भारतीय हूं !!! कोई घुसपैठिया नहीं। मृतक एंजल के आखिरी शब्द दिल को चीर देने वाले है।
ये देश के लोकतंत्र का मजाक उड़ाता हुआ लम्हा था। जहाँ संविधान ने हर नागरिकों को अधिकार और सुरक्षा बिना किसी भेदभाव के प्रदान की हुई है। लेकिन राजनीति की गंदी गलियों से निकली जाति, हिंसा और नफरत ने लोगों के दिमाग को अपंग बना दिया बल्कि अगर ऐसा कहे कि अपराधी बनाये जा रहे है तो कुछ गलत नहीं होगा। देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध उत्तराखंड में मासूम एंजल की हिंसक मौत ने फिर एक बार पूरे देश के सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए है।
उत्तराखंड के देहरादून के सेलाकुई थाना क्षेत्र के बाज़ार में निजी यूनिवर्सिटी के MBBS फाइनल वर्ष के छात्र एंजल चकमा और उनके भाई माइकल चकमा पर 9 दिसंबर को नस्लीय टिप्पणियों के बाद हमला किया गया था। ये टिप्पणियां थी , चीनी, चिंकी, चिकना और भी बहुत कुछ ऐसा जो लिखा नहीं जा सकता। लेकिन दोनों भाइयों ने इसे झेला है शायद अपने भाई को खोने के बाद माइकल जिनकी उम्र महज 21 साल है अपनी आगे की जिंदगी भी में इसे भूल ना पाये। इसका जिम्मेदार कौन है ??
त्रिपुरा के अगरतला स्थित नंदनगर के रहने वाले एंजल के पिता BSF हेड कांस्टेबल के पद पर है। बिना किसी भेदभाव के देश के लिए अपनी सेवाएं दे रहे है। लेकिन एक फौजी के परिवार को जब खुद को भारतीय साबित करना पड़े इससे ज्यादा दुखद और क्या होगा।
खासकर तब जब देश में 2014 को सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा नार्थ ईस्ट के विकास के नाम पर भारी बजट के साथ एक मंत्रालय का गठन भी हुआ नाम रखा गया (मिनिस्ट्री फॉर डेवलमेंट ऑफ नार्थ ईस्ट रीजन ) DoNER. इनका उद्देश्य पूर्वोत्तर को देश की मुख्य धारा में लाना था। लेकिन शायद एंजल जैसे असमय काल की गोद मे समा जाने वाले युवा इस मिनिस्ट्री के विकास की गति में नहीं आते। इसलिए एक तरफ चीन की सीमा अतिक्रमण पर चुप्पी साध लेने वाले दूसरे राज्यों में एकदम बबर शेर बनकर हत्या करने से भी गुरेज नहीं करते।
एंजल के भाई का साफ कहना है कि हमें नस्लीय टिप्पणियों से निशाना बनाया गया, और विरोध करने पर मेरे भाई की पिटाई की गई जिसके कारण 17 दिन तक मौत से जंग लड़ने के बाद भी उसे बचाया नहीं जा सका। त्रिपुरा से दिल्ली, मुंबई, उत्तराखंड, बेंगलुरु बड़ी जमात में लोग आते है। लेकिन हमारे साथ भेदभाव किया जाता है। रंग और व्यक्तित्व के आधार पर…
इस घटना के बाद पुलिस की कारवाई भी संदिग्ध रही है। ऐसा कहना है मृतक के पिता का साथ ही उनका ये भी कहना है पुलिस पहले FIR से ही मना कर रही थीं। अपने आकाओं को खुश करने के लिए या शायद दबाव में रहने के कारण इस घटना को छात्रों के दो गुटों के झगड़ा बताने में जुटी थीं। मानवाधिकार संगठनों और लोगों के गुस्से के कारण बाद में FIR दर्ज हुई लेकिन उसमें हत्या जैसी धाराओं से परहेज किया गया। घटना में शामिल युवकों के बारे में नेपाल भाग जाने की जानकारी सामने आई है।
देहरादून में सक्रिय यूनीफाइड त्रिपुरा स्टूडेंट एसोसिएशन जो छात्र-छात्राओं के लिए सक्रिय है का कहना है कि एंजल के कॉलेज (जिज्ञासा) ने भी इस मुद्दे पर कोई सहयोग नहीं किया उसके प्रिंसिपल ने कॉल तक रिसीव नहीं किया। ये दुखद है यहाँ पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता दहसत में हैं।
इस मुद्दे पर विपक्ष ने भी मुख्यमंत्री पुष्कर धामी पर निशाना साधा है। पहले ही अंकित भंडारी हत्याकांड में सरकार की मुश्किलें बढ़ी हुई थीं, अब एंजल चकमा का मामला कई सारे सवालों के साथ हाजिर है। रील बनाने वाली सरकार से उम्मीद क्या की जाये। देश के कानूनों पर भी सवाल उठ रहे है और संसोधन की मांग जारी है।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप प्रकाश अवस्थी ने इस संवेदनशील मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका (PIL ) दाखिल करके हुये पूर्वोत्तर भारत के नागरिकों के साथ बढ़ रही नस्लीय हिंसा और भेदभाव के मुद्दे पर लोगों का ध्यान खींचा है। इस जनहित याचिका का आधार चकमा है जो हो सकता है कल आने वाले युवाओं के लिये कानूनी रोड मैप बन जाये। अवस्थी की मांग है, इसे गंभीर और भविष्य के लिए देखते हुये अब समय आ गया है कि न्यायिक संसोधन किये जायें और नागरिकों की सुरक्षा के लिए कोर्ट हस्तक्षेप करें। क्योंकि संविधान खतरे में है। लोगों के मूल अधिकार खतरे में हैं।
अनूप कहते है “हम भारतीय हैं… हमें यह साबित करने के लिए कौन-सा सर्टिफिकेट दिखाना होगा ??
जब किसी भारतीय नागरिक को, मरने से ठीक पहले, अपनी राष्ट्रीयता को हिंसा के खिलाफ ढाल की तरह इस्तेमाल करना पड़े, तो यह केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं होती—यह संविधान की आत्मा पर आघात होता है।
एंजल का सवाल व्यक्तिगत नहीं था। यह उन लाखों भारतीयों का सवाल है, जो पूर्वोत्तर राज्यों त्रिपुरा, मणिपुर, नागालैंड, मिज़ोरम, मेघालय, असम, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम या लद्दाख जैसे सीमांत क्षेत्रों से आते हैं और जिनकी शारीरिक बनावट उन्हें “अलग” बना देती है।
कानूनी विशेषज्ञ इसे “नागरिकता का प्रदर्शन” (performance of citizenship) कहते हैं—जो भारतीय संविधान की मूल भावना के विपरीत है।
नस्लीय हिंसा: का एक पैटर्न होता है-
एंजल चकमा की हत्या कोई अपवाद नहीं है। इससे पहले 2014 में दिल्ली में अरुणाचल प्रदेश के नीडो तानियाम की मौत, गुरुग्राम और बेंगलुरु में पूर्वोत्तर छात्रों पर हमले, और कोविड-19 के दौरान “चीनी वायरस” के नाम पर की गई नस्लीय बदसलूकी ये सभी घटनाएँ एक ही पैटर्न की ओर इशारा करती हैं।
यह पैटर्न अक्सर चार चरणों में सामने आता है:
1. नस्लीय टिप्पणियाँ और अपमान
2. भारतीय पहचान पर सवाल
3. शारीरिक हिंसा
4. संस्थागत उदासीनता या देर से प्रतिक्रिया एंजल का मामला भी इसी क्रम का हिस्सा था।
सरकार को पहले से पता था-
यह तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि भारत सरकार इस समस्या से अनजान नहीं हैं। मार्च 2017 में लोकसभा में पूछे गए सवालों के जवाब में गृह मंत्रालय ने आधिकारिक रूप से स्वीकार किया था कि पूर्वोत्तर के नागरिकों के खिलाफ नस्लीय हमले देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे हैं।
इन जवाबों में दिल्ली जैसे महानगरों में सैकड़ों मामलों का ज़िक्र था। सरकार ने यह भी माना था कि मौजूदा दंड कानून ऐसे अपराधों से निपटने के लिए अपर्याप्त हैं।
लेकिन इसी अवधि में सरकार ने यह भी कहा कि नस्लीय या हेट क्राइम से निपटने के लिए कोई विशेष नोडल एजेंसी या समर्पित तंत्र बनाने का कोई प्रस्ताव नहीं है।
यही विरोधाभास आज सवालों के घेरे में है।
कानून है, लेकिन पहचान नहीं-
2023 में लागू हुई भारतीय न्याय संहिता (BNS) में समूह-आधारित हिंसा और नस्ल के आधार पर अपराध के लिए कुछ प्रावधान हैं। लेकिन समस्या कानून की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि उसकी पहचान और क्रियान्वयन की है।
पुलिस रिकॉर्ड में अक्सर “चिंकी” जैसे शब्दों को गंभीर नस्लीय संकेत के बजाय “साधारण गाली” मान लिया जाता है। नतीजा यह होता है कि अपराध को सामान्य मारपीट या हत्या के रूप में दर्ज किया जाता है उसकी नस्लीय प्रकृति अदृश्य रह जाती है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक नस्लीय मंशा को अपराध का केंद्रीय तत्व नहीं माना जाएगा, तब तक कड़े प्रावधान भी काग़ज़ी रहेंगे।
तटस्थता या उदासीनता?
भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली खुद को “तटस्थ” मानती है लेकिन आलोचकों का कहना है कि नस्लीय हिंसा के मामलों में यह तटस्थता दरअसल उदासीनता बन जाती है।
नस्लीय हिंसा केवल व्यक्ति पर हमला नहीं होती। यह पूरे समुदाय को संदेश देती है कि उनकी उपस्थिति असुरक्षित है, उनकी नागरिकता संदिग्ध है। इसका असर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, आवागमन की स्वतंत्रता और शिक्षा-रोज़गार के अवसरों पर पड़ता है।
भाईचारा: संविधान की भूली हुई आत्मा?
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में “बंधुत्व” (Fraternity) को न्याय, स्वतंत्रता और समानता के साथ रखा गया है। लेकिन व्यावहारिक रूप से यह मूल्य सबसे अधिक उपेक्षित रहा है।
जब किसी भारतीय को उसकी शक्ल के कारण “विदेशी” कहा जाता है, तो यह केवल अपमान नहीं होता यह बंधुत्व का इनकार होता है।
एंजल की मौत के बाद देशभर में छात्र संगठनों, नागरिक समूहों और संवैधानिक विशेषज्ञों ने मांग की है कि:
नस्लीय हिंसा को अलग श्रेणी के अपराध के रूप में पहचाना जाए
एफआईआर में नस्लीय मंशा दर्ज करना अनिवार्य हो
राज्यों में नोडल अधिकारी नियुक्त हों
पुलिस और अभियोजकों के लिए विशेष दिशा-निर्देश बनाए जाएँ


